बोलना सीख – चौधरी छोटू राम

चौधरी छोटू राम, अनुवाद-हरि सिंह

जब मैंने यह सिलसिला शुरू किया तो इसको चारों ही लेखों पर समाप्त करने का इरादा था, लेकिन मुझे विश्वास दिलाया गया कि किसानों में यह खास तौर पर और उन क्षेत्रों में आमतौर पर जिन किसानों के साथ सहानुभूति की भावना मौजूद है इस सिलसिले को बड़ी लोकप्रियता प्राप्त हुई है। इसीलिए मेरे अनेक मित्रों ने यह इच्छा प्रकट की कि मैं इस सिलसिले में दो तीन लेख और जोड़ दूं। चुनांचि इस इच्छा की पूर्ति में मैं इस सिलसिले की ओर पुनः अग्रसर होता हूं।

किसान के दुख असंख्य हैं और बड़े गंभीर हैं। कुदरती तौर पर इन दुखों की कहानी भी बहुत लंबी है। इसलिए इस सिलसिले के अंदर दो चार लेखों का बढ़ना कोई कठिन काम नहीं है। मेरे लिए तो यह बात संतोषजनक है कि अंततः किसानों के दुख की कहानी सुनने का शौक तो पैदा हुआ, अन्यथा इन्होंने तो कुछ ऐसी अनछनी भांग पी हुई थी कि कभी इधर ध्यान होता ही न था।

किसान गजब का इंसान है। एक बड़ी दुखभरी कहानी का केंद्र है। परन्तु यह किसी को अपना दुख बताके राजी नहीं। शिकवा-शिकायत करने का आदी नहीं। गिला-गुजारी में विश्वास नहीं। हमारी सरकार समझती है कि किसान खुश है, आराम से है। अपना समय अच्छी तरह गुजार रहा है। इसका कोई कष्ट होता तो जरूर चिल्लाता! आखिर सरकार की प्रजा में और वर्ग भी तो हैं। जब इनका कोई दुख होता है तो वे तुरंत चिल्ला उठते हैं और फिर सरकार उनकी सुनवाई करती है। ठीक है। परन्तु जमींदार तो दुख-दर्द की शिकायत के मामले में एक अनोखी प्रकार की चीज है। किसान अपनी जबान पर शिकायत का शब्द लाना नहीं जानता। वह इसे अपनी शान के खिलाफ समझता है। मगर इससे यह समझ लेना कि किसान को कोई दुःख नहीं है बड़ी नासमझी की बात है। असल में देखा जाए तो किसान क्या है? एक चलता-फिरता दुख है। बेकसी का नमूना है। दर्द की मूर्ति है। मुसीबत की जीती-जागती तस्वीर है। दुखों की पोट है। इसका दिल दुख-दर्द के घावों से छलनी बना हुआ है।  लेकिन इसके घावों के मुंह नहीं और यदि मुंह हैं तो मुंह में जबान नहीं। जिस दिन इन घावों के मुंह पैदा हो गया और मुंह में जबान हो गई, इस दिन किसान के आह व पुकार से जमीन लरजने लगेगी। आसमान कांप उठेगा। आकाश के अंदर एक भयानक हलचल मच जाएगी। जो सरकार इस समय अपने अज्ञान की वजह से सुख की नींद सोई हुई है, उसकी नींद हराम हो जाएगी। और जो खुशामदी या चापलूस या नादान और कृतघ्न सरकारी कर्मचारी अपनी गलत रिपोर्टों से सरकार को सुला देने वाले नुस्खे प्रयोग करते है। वह गद्दारी, मक्कारी, रियाकारी, नग्न दुराचार और दुर्भावना का रूप होंगे।

किसान भाईयो! जरा कलेजा थामकर सुनना। तुम्हारे दुख की कहानी शुरू करता हूं। किसान की भलाई का दावा करने वालो, मेरी दर्दभरी कहानी को शांति, प्रेम और ध्यान के साथ सुनना। आज्ञा दीजिए कि इस कहानी को कहां से शुरू करूं? यदि आज्ञा हो तो इस कहानी का आरंभ इस चीज से करूं जिसके संबंध में किसान कहलाता है यदि जमीन और जमीन के स्वामित्व से। स्वयं बहुत से किसानों को पता नहीं कि सरकार के कानून के अनुसार इस प्रांत बल्कि भारत में किसानों की भूमि के साथ कानूनी लगाव क्या है। हम अपने-आपको जमीन का मालिक समझते हैं, किसान कहलाते हैं। बिस्वेदार की उपाधि देते हैं। मगर क्या किसानों ने कभी इस बात का ख्याल किया कि ज बवे किसी शामलात देह से या खुद अपनी जमीन से कंकर निकालना चाहते हैं तो उनको अफसर माल की इजाजत से हममें से चाहे-जिस जमीन में से कंकड़ खुदवा सकता है। उसको हमारी इजाजत की जरूरत नहीं। यह क्यों? यह इसलिए कि सरकार इस बात की दावेदार है कि जमीन की असल मालिक सरकार है जो लोग किसन कहलाते हैं, वे या तो एक प्रकार के पक्के मुजारे हैं या वे एक बड़े मालिक के नीचे एक छोटे मालिक की हैसियत रखते हैं। या यह कहिए कि किसानों को विशेष शर्तों के नीचे सरकार ने एक सीमित प्रकार के स्वामित्व के अधिकार दिए हुए हैं और स्वयं अपने अंतिम स्वामित्व के अधिकार सुरक्षित कर लिए हैं। भूमि और मामला भूमि के बारे में हमारी सारी मुसीबतों का स्रोत यही बेहूदा क्रूर कानून है, जिसके बल पर सरकार यह दावा करती है कि सारी भूमि की असल और अंतिम मालिक सरकार है और यद्यपि किसान भूमि पर काबिज रहें और जब तक वे खास-खास शर्तें जमीन के मामले का देना आदि पूरी करते रहें, वह अपना कब्जा बरकरार रखने के भी अधिकारी हैं। लेकिन अपनी कब्जे की जमीन का गैर मौरूस पूरा मालिक नहीं। जमीन के अंदर जो कंकड़ पत्थर और अन्य धातुएं हें, वे भी जमीन की भांति सरकारी सम्पति हैं और ये चीजें सरकार की ही हैं। गोया किसान एक प्रकार के पक्के गुजारे हैं जिनको सरकार इस समय तक बेदखल नहीं कर सकती, जब तक बन्दोबस्त में तजबीज किया गया मामला जमीन अदा करते हैं। किसान ने एक कब्जा किसान को दे दिाय है। लेकिन चूंकि धातुओं के स्वामित्व का अधिकार सरकार ने सुरक्षित रख लिया है इसलिए इस अधिकार को बरतने के लिए स्वयं सरकार की आज्ञा से ठेकेदार किसान की इजाजत के बिना इन कब्जे में देखल देने का हक रखते हैं।

जमीन के स्वामित्व का जो मामला ऊपर दर्ज किया गया है, वह किसानों की अक्सर मुसीबतों की जड़ है। यह मामला पूर्णतः अन्यायपूर्ण है। सरकार कहती है कि मुसलमान बादशाहों के समय में भी यह मामला लागू था और चूंकि अंग्रेजी सरकार ने हुकूमत या तो मुसलमान बादशाहों से जीती है या हिन्दू राजाओं से इसलिए राजाओं को वे सब अधिकार हासिल हैं, जो मुसलमान बादशाहों और राजाओं को हासिल थे।

लेकिन अंग्रेजी सरकार का यह फरमाना बिल्कुल गलत है कि मुसलमान बादशाओं ने या हिन्दू राजाओं ने कभी यह दावा किया हो कि जमीन का असली मालिक बादशाह या राजा है और किसानों को जो अधिकार जमीन से मिला हुआ है, वह राजा या बादशाह या हुकूमत का दिया हुआ है। यह दावा सिद्धांत और ऐतिहासिक दृष्टि से गलत है। मैंने जिला रोहतक में सैंकड़ों देहात का इतिहास जो स्वयं सरकारी अफसरों ने लिखा है देखा है। इनमें से प्रत्येक गांव के इतिहास में यह लिखा हुआ है कि इस गांव में फलां कौम आबाद थी और इसको फलां कौम ने खून बहाकर गांव से निकाल कर स्वयं कब्जा कर लिया था।

इसके अतिरिक्त राजा और राज, बादशाह और बादशाहत, हाकिम और हुकूमत सृष्टि रचने के बहुत पीछे वजूद में आए। जमीन और किसान राजा, बादशाह और हाकिम से बहुत पहले वजूद में आ चुके थे। हिन्दू आस्थानुसार चैथे मनु के जमाने में यानी सृष्टि की रचना के लाखों वर्षों बाद राज की संस्था वजूद में आई। इसलिए यह कहना कि किसान को भूमि के बारे में जो अधिका है, वे सरकार ने दिए थे, एक झूठी बात है। इससे आगे, जब सरकार अंग्रेजी यह दावा करती है कि राजाओं और बादशाहों का जमाना जहालत और तारीकी, अज्ञान और अंधकार का जमाना था और अंग्रेजों ने सभ्यता और रोशनी का दौर इस देश में चलाया तो फिर क्या कारण है कि गरीब किसानों पर अंधेरे और अज्ञान के युग की रस्में और नियम लागू रहें। जहां सरकार ने बहुत सी बातों को असभ्य काल की यादगार समझ कर छोड़ दिया है। इसी प्रकार के मामले को भी गुजरे हुए जमाने में दफन कर देना चाहिए। आखिर इस तहजीब वे नूर के जमाने में ऐसी निराधार बातों का कानून माल की सजावट बनाना या बनाए रखना कौन सी नीति या न्याय के सिद्धांत के आधार पर जारी रखा जा सकता है?

अब आगे चलिए। टैक्सों का जो भार किसानों के कंधे पर है, वह इनके लिए असहनीय है और पूर्णतः गलत सिद्धांतों पर लगा हुआ है। किसी सरकार का प्रबंध करों के बिना नहीं चल सकता है। सरकार चाहे स्वदेशी हो, चाहे विदेशी हो, एक व्यक्ति की हो या लोकतांत्रिक हो या नौकरशाही हो, बिना रुपए के अपना प्रबंध नहीं चला सकती इसलिए प्रत्येक सरकार को प्रजा पर कर लगाने पड़ते हैं।

परन्तु टैक्स लगाने के दो बड़े-सीधे सिद्धांत हैं। एक यह कि सरकार का प्रबंध चलाने के लिए जितना कम से कम टैक्स जो आवश्यक हो वही लगाया जाए। दूसरा यह कि करों का भार तक्सीम करने में यह बात विशेष तौर पर सामने रखी जाए कि कौन व्यकित कितना बोझ उठा सकता है। आज प्रत्येक भारतवासी इस बात को मानता है कि सरकार अंग्रेजी ने सामूहिक तौर पर हिन्दुस्तान पर जरूरत से ज्यादा टैक्स लगा रखा है। परन्तु यह प्रश्न मेरे विषय से गहरा संबंध रखता है। करों के भार की तकसीम में सरकार अंग्रेी ने दूसरे सिद्धांतों का खुल्लम-खुल्ला उल्लंघन किया है और इस बात का सबसे बुरा प्रभाव किसान पर पड़ा है।

यदि एक वर्ग के रूप में एक किसान के हितों का ख्याल रखा जाए तो भी टैक्सों के भार की तकसीम में किसान के साथ अन्याय बरता जाता है और खुद इस वर्ग के अंदर यदि प्रत्येक किसान की भलाई का ख्याल किया जाए तो व्यक्तिगत तौर पर भी किसान के साथ अन्याय का व्यवहार किया गया है। कोई धंधा ऐसा नहीं, जिसमें कुछ न कुछ आय टैक्स से बरी न रखी गई हो और तमाम धंधों में पिछले वर्ष से पहले दो हजार रुपए तक की आय कर मुक्त थी। अब कर से छूट की सीमा एक हजार रुपया वार्षिक आय है। यह आय एक गृहस्थी के कुटुम्ब के गुजारे के लिए जरूरी समझी गई है और इसको पेट की रोटी समझकर टैक्स से माफ कर दिया है, परन्तु भूमि की कोई आय कर मुक्त नहीं है। किसान की जमीन के एक-एक बिसवे पर टैक्स लगा हुआ है। किसान की रोटी पर भी टैक्स है। मालूम नहीं, हमारी भोली सरकार यह क्यों समझती है कि किसान को भूख नहीं लगती और इसका कुटुम्ब हवा खाकर जीवित रह सकता है या सरकार को यह ख्याल है कि किसान इसकी प्रजा का एक बेबस और असहाय हिस्सा है। इसलिए इसको माफी देना जरूरी नहीं इसका पेट काटा जाए तो भी इसको शिकायत न होगी। परन्तु शिकायत कुछ भी हो, सच्ची बात यह है कि जो सुविधा साहूकार को है, वकील को है, डाक्टर को है, दुकानदार को है, सरकारी कर्मचारी को है, वह रियायत किसान को नहीं। लोग हैरान होंगे कि यह अन्याय क्यों? सरकार ऐसे अन्याय के जवाब में क्या दलील पेश करती है? इस दोष के उत्तर में सरकार यही तर्क देती है, जिसका जिक्र मैंने ऊपर किया है अथवा यह कि जमीन की असल मालिक सरकार है। किसान तो एक प्रकार का स्थायी मुजारा है। मामला जमीन-टैक्स नहीं, बल्कि एक प्रकार का लगान है, किराया है, भाड़ा है। जितनी जमीन किसान सरकार से लेता है, थोड़ा किराया देता है, अधिक जमीन लेता है, तो अधिक किराया देता है। किराया कभी माफ नहीं हुआ करता है। यदि कोई किराएदार इस किराए को ज्यादा समझता है या अपने ऊपर एक बोझ समझता है तो इसका छुटकारा हासिल करना इसके अपने हाथ में है, यानी वह जमीन को छोड़ दे। तब सरकार किराया न मांगेगी। जो जमीन सरकार से हजारों-लाखों वर्ष पहले अस्तित्व में आई, उसका किराया मांगा जाता है। जो किसान राजा से हजारों लाखों वर्ष पहले अस्तित्व मंे आया, उसको राजा का किरायादार बताया जाता है। जिस भूमि को हमारे बुजुर्गों ने बाहूबल से जीता, उसको सरकार की सम्पति बताया जाता है और ढीठपन तो देखिए। साथ ही यह कहा जाता है कि यदि इस किराए से छुटकारा चाहते हो, तो जमीन को छोड़ दो। किसान कहते हैं कि जमीन हमारी और हमारे बाप-दादा की। यह जमीन हमें न किसी राजा ने दी, न किसी बादशाह ने दी और न किसी अंग्रेजी सरकार ने दी। टैक्स लगाने के साधारण सिद्धांतों से इन्कार करके हम पर जो बोझ डाला जाता है, वह अन्याय है। इस अन्याय से हमें मुक्ति मिलनी चाहिए, परन्तु किसन की सुनवाई नहीं होती।

किसान यह सुनकर शायद और भी हैरान होंगे कि जो बात मैंने ऊपर बयान की है, वह न केवल सरकार की ओर से कही जाती है, बल्कि हमारे वे भाई भी कहते हैं जोकि प्लेटफार्म और प्रैस से किसानों की सहानुभूति का दम भरते-भरते नहीं थकते। पंजाब की कोंसिल में यह एक बार से अधिक विचाराधीन आ चुका है और हिन्दू पार्टी के बड़े-बड़े सदस्यों ने वही तर्क पेश किए हैं, जो सरकार की तरफ से पेश हुए हैं कि जमीन का मामला एक ऐसा मुतालबा है जैसा कि इनके हमपेशा भाइयों के जिम्मे बाजार की दुकान का किराया। और अगर किराया नहीं, तो दुकान भी नहीं। गैर-जमींदार समझते हैं कि किसानों का बोझ कम हुआ तो वही बोझ गैर-जमींदारों के जिम्मे डाल दिया जाएगा। इसलिए वे अपने कंधे को हल्का रखने के लिए सरकार की हां में हां मिला देते हैं। जो दोष है वह सरासर किसानों का है। ये संगठन रहित क्यों है? ये कमजोर क्यों है? राजनीतिक संसार में कमजोर होना पाप है। दूर क्यों जाते हो? खुद इलाका हरियाणा में कहावत है ‘हीणे की बहू सबकी भाभी’ अथवा कमजोर की बहू को हर एक आदमी अपनी भावज समझता है और उसके साथ भावज वाला परम्परागत सलूक करता है।

ऐ जमींदार, तू शेर होता हुआ अपने-आप को गीदड़ समझता है। अपनी असली खूबी और अपने असली गुणों को न भूल। अपने असली गुण को न छोड़। तू जो वास्तव में है, वही बन जा। फिर तुझे किसी से डरने की जरूरत नहीं।

फारिग अज अन्देशा अगयार शो।

कव्वते खाबीजा बेदार शो।।

(तू तो एक सोई हुई शक्ति है। जाग उठ। फिर देख तुझे किसी पराए से कोई खतरा भी रहता है) अन्य के भय से मुक्त हो जा। ऐ सोई हुई शक्ति, सचेत हो जा।

सर छोटू राम

सर छोटू राम

जन्म: 24 नवम्बर 1881, दिल्ली-रोहतक मार्ग पर गांव गढ़ी-सांपला, रोहतक (हरियाणा-तत्कालीन पंजाब सूबा) में       चौधरी सुखीराम एवं श्रीमती सिरयां देवी के घर। 1893 में झज्जर के गांव खेड़ी जट में चौधरी नान्हा राम की सुपुत्राी ज्ञानो देवी से 5 जून को बाल विवाह। शिक्षा: प्राइमरी सांपला से 1895 में झज्जर से 1899 में, मैट्रिक, एफए, बीए सेन्ट स्टीफेन कॉलेज दिल्ली से 1899-1905। कालाकांकर में राजा के पास नौकरी 1905-1909। आगरा से वकालत 1911, जाट स्कूल रोहतक की स्थापना 1913, जाट गजहट (उर्दू साप्ताहिक) 1916, रोहतक जिला कांग्र्रेस कमेटी के प्रथम अध्यक्ष 1916-1920, सर फजले हुसैन के साथ नेशनल यूनियनिस्ट पार्टी (जमींदार लोग) की स्थापना 1923, डायरकी में मंत्राी 1924-1926, लेजिस्लेटिव काउंसिल में विरोधी दल के नेता 1926-1935 व अध्यक्ष 1936, सर की उपाधि 1937, प्रोविन्सियल अटॉनमी में मंत्री 1937-1945, किसानों द्वारा रहबरे आजम की उपाधि से 6 अप्रैल 1944 को विभूषित, भाखड़ा बांध योजना पर हस्ताक्षर 8 जनवरी 1945। निधन: शक्ति भवन (निवास), लाहौर-9 जनवरी 1945। 1923 से 1944 के बीच किसानों के हित में कर्जा बिल, मंडी बिल, बेनामी एक्ट आदि सुनहरे कानूनों के बनाने में प्रमुख भूमिका। 1944 में मोहम्मद अली जिन्ना की पंजाब में साम्प्रदायिक घुसपैठ से भरपूर टक्कर। एक मार्च 1942 को अपनी हीरक जयंती पर उन्होंने घोषणा की-‘मैं मजहब को राजनीति से दूर करके शोषित किसान वर्ग और उपेक्षित ग्रामीण समाज कीसेवा में अपना जीवन खपा रहा हूं।’ भारत विभाजन के घोर विरोधी रहे। 15 अगस्त 1944 को विभाजन के राजाजी फॉर्मुले के खिलाफ गांधी जी को ऐतिहासिक पत्र लिखा।

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