कागजी हकूमत – चौधरी छोटू राम

चौधरी छोटू राम, अनुवाद-हरि सिंह

जी चाहता है कि शिमला की ऊंची पहाड़ियों पर रहने वाले सरकारी अफसरों को और लाहौर की ठंडी सड़क और सुंदर पार्कों और बागों में मटर गश्ती व सैर-सपाटा करने वाले शहरी हजरात को किसी तरह यह विश्वास दिलाऊं कि आबादी का एक वर्ग ऐसा भी है, जिसको नाने-शबीना (एक वक्त की रोटी) भी नहीं मिलती है। जो तुम्हारे लिए विलासिता का सामान जुटाता है, वह स्वयं तंग-दस्त और फाका-मस्त है। बेचारा किसान निढाल है, खस्ताहाल है। इसकी गरीबी की यह हालत है कि इसको सरकारी तकाजों को भी पूरा करना दूभर हो जाता है। मगर इसकी बेकसी का सही ज्ञान बहुत कम लोगों को है। हमारी सरकार ने अभी हाल में जिले के अफसरों से चंद सवालात पूछे थे। इनमें से एक सवाल यह था कि क्या सचमुच किसान के सब साधन जवाब दे चुके हैं? हमारी कैसी नन्ही-मुन्नी भोली सरकार है, जिसको अब तक यह पता नहीं कि किसान के आर्थिक जीवन के सब चश्मे सूख चुके हैं!

मगर पता भी कैसे लगे? कागजी हुकूमत है। कागजी घोड़े दौड़ते हैं। कागज का पेट भर दिया जाता है। बस सरकार की तसल्ली हो जाती है। प्रजा का पेट भरा है या नहीं, कागजी घुड़दौड़ में किसी को ध्यान ही नहीं आता। सरकारी अफसरों को केवल कागजों में दर्ज हुई बातों का ही पता होता है। रियाया पर क्या गुजरती है, प्रजा खुशहाल है या बदहाल है, इसका हाल केवल देहात वालों को ही मालूम है। पटवारी को भी मालूम है, लेकिन यह कहने से डरता है। ज्यों-ज्यों ऊपर जाओ, हालात की सही जानकारी कम होती जाती है। यहां तक कि सरकार के बड़े-बड़े दफ्तरों तक पहुंचते-पहुंचते केवल कागजी इंदराजात और कागजी औसत पर ही निर्भर किया जाता है। सच तो यह है कि बड़े अफसरों को सही हालात मालूम होने बड़े कठिन हैं। जो बड़े-बड़े अफसर हैं, उनको तो पुलिस की रिपोर्टों और प्राइवेट चुगलखोरों की बातें सुनने से फुरसत नहीं मिलती। इनका अधिक समय राजनैतिक स्थिति का अध्ययन करने और उनसे संबंधित रिपोर्ट भेजने में खर्च हो जाता है। इलाकों में दौरा करने, प्रजा से मिलने-जुलने, सही जानकारी देने और अपनी आंख से सब चीजों को देखने का इनको मौका ही नहीं मिलता।

जरा किसानों के दुर्भाग्य को देखिए। मोटरें चल गई। अब कौन अफसर घोड़ा रखता है? मोटर पर बैठे, पचास-साठ मील प्रतिघंटा यात्रा की। जिले के सदर से चले और एक दूसरे कोने में पहुंच गए। वहां से सायंकाल पुनः सदर में लौट आए। यदि एक दिन टैनिस न खेलें तो बस समझिए कि सारा मनोरंजन समाप्त हो गया। यदि एक रात को ब्रिज न खेल सके, तो फिर खाना हजम नहीं होता। परिणाम यह हुआ कि घोड़े के जाने से पक्की सड़क से दूर गांवों के दौरे खत्म हो गए। मोटरकारों के आने से तथा टैनिस व ब्रिज के जादू से दौरे का असली उद्देश्य खत्म हो गया।

इसके अतिरिक्त डिप्टी कमीश्वर के सिवाए और कोई अफसर ऐसा नहीं, जो प्रजा की आम भलाई के लिए कोई जिम्मेदारी समझता हो। विभागीय भावना आम है। कप्तान पुलिस समझता है कि यदि अपराधों की संख्या में कमी है और विद्रोही आंदोलनों में भाग लेने वालों का काफी पीछा किया गया है, तो प्रजा के प्रति इनका और कोई कर्तव्य बाकी नहीं रह जाता। सिंचाई विभाग के अफसर समझते हैं कि यदि वे सेर भर पानी देकर दो सेर के दाम वसूल कर लेते हैं तो वे अपनी तमाम जिम्मेदारियों से छूट जाते हैं। लोकनिर्माण विभाग के अधिकारियों का यह ख्याल है कि यदि सड़क और सरकारी भवन संतोषजनक हालत में हैं और उनके हाथ से चंद ठेकेदार पल गए हैं तो प्रजा के प्रति इनका और कोई कर्तव्य नहीं रह जाता,  जिसे पूरा करने की वे चिंता करें। सिविल सर्जन साहब ने एक आध डिस्पैंसरी का निरीक्षण किया, दफ्तर के चंद कागजात पर हस्ताक्षर कर दिए और एक बार सदर अस्पताल के बरामदों और रोगियों के कमरों को एक सरसरी निगाह से देख लिया तो बस दिन भर के लिए फुर्सत पाई। यदि कोई पोस्टमार्टम कर दिया तो समझिए सरकार पर, जिले और प्रजा पर बड़ा भारी अहसान कर डाला। इस बात का निचोड़ यह है कि किसी भी विभाग के जिम्मेदार अफसरों को लीजिए, इनको प्रजा के साथ कोई प्यार नहीं। इनके दिलों मंे न्याय की लेशमात्र इच्छा नहीं। ये अफसर अपने-अपने विभाग के चंद रस्मी फरायज को पूरा करने के अतिरिक्त प्रजा के कल्याण की कोई जिम्मेदारी अपने ऊपर नहीं समझते और जो काम करते हैं, वे भी भाड़े के टट्टू की तरह करते हैं।

अब रह गया एक बेचारा डिप्टी कमीश्नर। जिले के अन्य अफसरों से इसको कोई विशेष सहयोग नहीं मिलता, हां स्थानीय क्लब की संरक्षता इसके जिम्मे है। इसलिए दूसरे अफसर टैनिस और ब्रिज की लाग को इसके जिम्मे लगाकर इसके कुछ टाइम के ग्राहक बन जाते हैं। कुछ कचहड़ी का काम इनके जिम्मे होता है। इसके अलावा बिल्कुल बेमतलब अनावश्यक और कई बार बेहुदा कागजात के थब्बे के थब्बे इसके सामने हस्ताक्षर के लिए या सदर आदेशों के लिए पेश होते हैं। इनसे जो समय बचता है वह उपाधियां चाहने वाले, सनदें मांगने वाले और खुशामदी या चुगलखोरों की बेया जमायत की भेंट हो जाता है। आजाद विचारों से आदमी डिप्टी कमीशनर के पास बहुत कम जाते हैं। आज डिप्टी कमीश्नर साफ-साफ बात कहने वाले आदमियों के साथ बातचीत करना अपनी शान से नीचा समझते हैं। ऐसी हालत में किसान की तकदीर का फैसला पटवारी और महकमा माल के अधीन कर्मचारियों के हाथ मंे रहता है। ये जो कुछ करते हैं, सरकार से डरकर गलत-सलत करते हैं और डिप्टी कमीशनर इन पर मोहर लगा देता है। जब एक बार डिप्टी कमीशनर की मोहर किसी रिपोर्ट पर लग गई तो फिर इसको आयत हदीश अैर वेद-मंत्र का दर्जा प्राप्त हो जाता है। इस वेद वाणी को अब बदले कौन?

जेठ-आषाढ़ की धूप में तपने वाले, सावन-भादों की घुमस में ईख, बाजरा, बाड़ी, मकई और जुवार के खेतों के अंदर नलाई (गोड़ी) का काम करने वाले, माह-पोह की सर्दी के अंदर नहर के दहानों (खालों) से डाल के जरिए सिंचाई करने वाले, चरसा या रहट चलाकर खेतों में पानी देने वाले गरीब किसानों की हालत को कौन जानता है? अगर कोई इनकी तरफ से आवाज उठाता है, तो सरकारी अफसर और शहरी आबादी इसको आधा पागल समझने लग जाते हैं। जिसको प्रातः पलंग से उठने से पहले बिस्तर की चाय, फिर साढ़े नौ बजे के करीब चाय-टोस्ट, दोपहर को एक बजहे लंच (दोपहर का खाना), चार बजे सायं फिर चाय, रात को नौ बजे डिनर (रात का खाना) मिलता हो, वह भूख के बारे में क्या जाने? फिर खाने की चीजों में अंडा, मक्खन, रोटी, चाय, कहवाव, मिठाई, गोश्त, फल, मेवा, गैसदार पानी (सोडावाटर) आदि। और दिल को आकर्षित करने वाली और होश डुबो देने वाली शराब आदि प्रयोग होती है। ऐसी विलासिता में जीवन व्यतीत करने वालों को किस प्रकार विश्वास हो कि किसान सूखे टुकड़ों को भी तरसता है?

गरीब किसान ने शिमले को नहीं देखा है। हां इनमें से कोई मुकदमेंबाजी के सिलसिले में लाहौर जरूर देख आया होगा। अनारकली की दुकानों की शान, जिंदगी की चहल-पहल, माल रोड की दोरोया शानदार इमारतें, मैकलौड रोड के सिनेमा घर और कहवा-खाने, स्त्रियों के कीमती आभूषण, इनकी नफीश पोशाकें, इनके चेहरों की सजावट, इनके बालों का संवार। बिजली की रोशनी, बिजली के पंखे, शानदार कारों के दृश्य! चंद घंटों के लिए तो किसान भौंचक्का होकर यह भूल जाता होगा कि गरीब नाम की चीज यहां कहां। रुपए की झंकार, धन की अधिकता, मौज, विलासिता की वस्तुओं का भंडार कदम-कदम पर इनको कुबेर के खजानों की याद दिलाते होंगे।

लाहौर के जिन भागों का वर्णन ऊपर किया गया है, इनका दृश्य देखकर अब अजनबी किसान को गरीबी की याद केवल उस समय आती होगी, जब कोई चीज खरीदने का विचार उसके दिल में चुटकी ले। नगरों के निवासी, नगरों के समाचार पत्रों के लेखक और हमारी सरकार के बड़े-बड़े अफसर जो चारों ओर से चकाचौंध करने वाली वस्तुओं से घिरे हुए हैं, जिनका जिक्र अभी किया गया है, किस तरह से समझें कि किसान को तन ढांपने को कपड़ा और पेट भरने को टुकड़ा मिलना कठिन हो रहा है।

जमींदार तेरा अल्लाह ही बेली है, भगवान ही रक्षक है। सरकार तो अभी तक यह समझती है कि जब तू कंगाली का जिक्र जबान पर लाता है, तब तू अपना मगरापन ही दिखाता है। तेरी आवाज उठाने वाला, तेरी दुहाई देने वाला कोई अखबार नहीं। हां तेरे सच्चे सेवकों और तेरी जमीन के रक्षक इन्तकाल अराजी को कोसने वाले अखबार बहुत हैं। तेरी बिरादरी कुंभकर्ण की नींद सोयी हुई है। तेरा कुनबा तितर-बितर है। तुम बिखरे पड़े हो। अनेक कुरीतियों का शिकार हो, यदि इस बावले कुनबे को कोई जगाने की कोशिश करता है तो मौलवियों, पंडितों और ग्रंथियों के कुनबे में खलबली मच जाती है। जरा जागृति के चिन्ह नजर आए और इन मजहब के दुश्मनों ने मजहब के नाम से क्लोरोफार्म के फोहे सुंघाने शुरू किए! सावधान!

सर छोटू राम

सर छोटू राम

जन्म: 24 नवम्बर 1881, दिल्ली-रोहतक मार्ग पर गांव गढ़ी-सांपला, रोहतक (हरियाणा-तत्कालीन पंजाब सूबा) में       चौधरी सुखीराम एवं श्रीमती सिरयां देवी के घर। 1893 में झज्जर के गांव खेड़ी जट में चौधरी नान्हा राम की सुपुत्राी ज्ञानो देवी से 5 जून को बाल विवाह। शिक्षा: प्राइमरी सांपला से 1895 में झज्जर से 1899 में, मैट्रिक, एफए, बीए सेन्ट स्टीफेन कॉलेज दिल्ली से 1899-1905। कालाकांकर में राजा के पास नौकरी 1905-1909। आगरा से वकालत 1911, जाट स्कूल रोहतक की स्थापना 1913, जाट गजहट (उर्दू साप्ताहिक) 1916, रोहतक जिला कांग्र्रेस कमेटी के प्रथम अध्यक्ष 1916-1920, सर फजले हुसैन के साथ नेशनल यूनियनिस्ट पार्टी (जमींदार लोग) की स्थापना 1923, डायरकी में मंत्राी 1924-1926, लेजिस्लेटिव काउंसिल में विरोधी दल के नेता 1926-1935 व अध्यक्ष 1936, सर की उपाधि 1937, प्रोविन्सियल अटॉनमी में मंत्री 1937-1945, किसानों द्वारा रहबरे आजम की उपाधि से 6 अप्रैल 1944 को विभूषित, भाखड़ा बांध योजना पर हस्ताक्षर 8 जनवरी 1945। निधन: शक्ति भवन (निवास), लाहौर-9 जनवरी 1945। 1923 से 1944 के बीच किसानों के हित में कर्जा बिल, मंडी बिल, बेनामी एक्ट आदि सुनहरे कानूनों के बनाने में प्रमुख भूमिका। 1944 में मोहम्मद अली जिन्ना की पंजाब में साम्प्रदायिक घुसपैठ से भरपूर टक्कर। एक मार्च 1942 को अपनी हीरक जयंती पर उन्होंने घोषणा की-‘मैं मजहब को राजनीति से दूर करके शोषित किसान वर्ग और उपेक्षित ग्रामीण समाज कीसेवा में अपना जीवन खपा रहा हूं।’ भारत विभाजन के घोर विरोधी रहे। 15 अगस्त 1944 को विभाजन के राजाजी फॉर्मुले के खिलाफ गांधी जी को ऐतिहासिक पत्र लिखा।

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