अवसरवादी मुस्टंडा

महावीर शर्मा

एक नन्हा सा अवसरवादी मुस्टंडा

जो मेरे जन्म के वक़्त

किसी काली सुरंग से

भीतर घुस आया था

जवान हो गया है

एक जहरीले नाग की तरह ।

जब वह मचलता है

तो फुंकारता है

उसकी चिरी हुई जीभ

मेरे नथुनों में लपलपाती है

मेरा सांस लेना दूभर हो जाता है

और एक कंपकंपी दौड़ जाती है

मेरे जिस्म के रोएं रोएं में ।

जब वह सड़क पे आते हुए

आदमीनुमा हड्डियों के ढांचे को देखता है

जिसे लीर लीर हुए कपड़ों ने

कुछ छिपा रखा है कुछ दिखा रखा है

तब इस मुस्टंडे के माथे पर

बल पड़ जाते हैं

और वह दनदना उठता है

किसी बावर्दी थानेदार की भाँति

जिसे मुफ़्त की शराब ने गरमा रखा हो ।

उसे सख़्त नफ़रत है छोटे छोटे लोगों से

क्योंकि इन लोगों को

सिवाय भीड़ बनने के

और कोई काम नहीं

कभी बन जाते हैं ये खाली बोतलें

कहीं हो जाते हैं ये खाली कनस्तर

राशन की बोरियों के आगे

कभी उबलने लगते हैं नारे बनकर

फैक्टरी के गेट के सामने।

कभी लम्बी लाइन बन जाते हैं

बीमारी की या बेकारी की

अब तो ये दिल्ली के बोट क्लब पे भी

मंडराने लगे हैं

कभी मजदूर बन कर

कभी किसान हो कर

और आपस में

मांगों के बोझ से झुके कंधे अड़ा कर

ट्रैफिक ब्लॉक कर देते हैं

वहां उनकी जीभें उग आती हैं

वृक्षों की टहनियों की तरह

और नारे पक्षी बन कर

सभी ओर फड़फड़ाने लगते हैं

लेकिन

कितना खुशकिस्मत है वह गोल गुम्बद

जो इस भीड़ से कमजकम

एक किलोमीटर दूर रहता है

मेरी आंखों में

हालांकि मैंने उनपर

इम्पोर्टेड अमरीकन रंगीन चश्मा भी चढ़ा रखा है

भीड़ का कोई न कोई टुकड़ा

फंसा ही रहता है।

इच्छा रहती है इस मुस्टंडे की

गहरी छन जाए किसी अला अफ़सर से

रिश्ता जुड़ जाए किसी बड़े दफ़्तर से

या चिपक जाए फिर

किसी चलते पुर्जे मिनिस्टर से

जो उसके बेटे को

किसी ओहदे पर बिठा सकते हैं

या लगा सकते हैं

किसी अच्छे विभाग में इंस्पेक्टर

जहां तनख़्वाह मामूली होते हुए भी

कोठियां खड़ी होती हैं

और बैंक बैलेंस बढ़ता है ।

लेकिन अब ये मुस्टंडा

कुछ डरने लगा है

क्योंकि उसी की नस्ल के

और बहुत मुस्टंडे चक्कर लगाने लगे हैं

कोठियों दफ्तरों और रेस्ट हाउसों के

उनकी पतंगे आपस ही में

उलझने लगी हैं

हर एक ने अपनी अपनी डोरी को

तेज़ शीशे वाला मांजा बना लिया है

ये डोरें आपस ही में कटती हैं

एक पतंग सरसराती है

तो दूसरी दर्जनों गिरती हैं

इसी लिए यह मुस्टंडा

भीड़ की तरफ़ भी देखता है

डरा डरा सा

कि क्या होगा तब

जब बड़ों ने धक्का दे दिया

और भीड़ ने भी पनाह न दी ?

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.