जींद के रण – चुप वोटरों ने बढ़ाई प्रत्याशियों की मुश्किलें- अविनाश सैनी

अविनाश सैनी

प्रचार खत्म होते-होते जींद का घमासान काफी विकट हो चला है। पिछले कुछ दिनों में जींद के रण में इतने समीकरण बने हैं कि राजनीतिक पंडितों के लिए भी हार-जीत का अंदाज़ा लगाना कठिन हो गया है।

लगभग 1 लाख 70 हज़ार मतदाताओं वाले इस विधानसभा क्षेत्र में प्रत्याशी अभी तक आवाम के मूड की अबूझ पहेली को सुलझाने में नाकाम नज़र आ रहे हैं।
पहली बात तो यह कि बाहरी लोगों की बहुत ज़्यादा संख्या के चलते किसी के लिए भी असली मतदाताओं की मनःस्थिति को भांप पाना आसान नहीं है। दूसरी बड़ी बात यह है कि पार्टियों के समर्थकों के अलावा मतदाताओं का बहुत बड़ा तबका अभी तक “चुप्पी” साधे हुए है और किसी के भी सामने अपने मन की बात कहने से बच रहा है।

जींद विधानसभा क्षेत्र में 35 गाँव और शहर के 31 वार्ड पड़ते हैं। यहां शहरी मतदाताओं की तादाद एक लाख से अधिक तथा ग्रामीण वोटरों की संख्या 65 हज़ार के करीब है। ज़ाहिर है कि जींद के विधायक का फैसला शहरी मतदाता ही करते रहे हैं और इस चुनाव में भी शहर को अपने पक्ष में करने वाले प्रत्याशी के सिर ही विधायक का ताज सजने की संभावना है।

जातिगत आंकड़ों की बात करें तो यहाँ जाट मतदाताओं का बाहुल्य है, जिनकी संख्या लगभग 47 हज़ार है।इसके बावजूद यहाँ जाट समुदाय से जुड़ा उम्मीदवार केवल एक बार ही विधायक बन पाया है। इस चुनाव में जजपा के दिग्विजय चौटाला, कांग्रेस के रणदीप सुरजेवाला और इनेलो के उमेद रेढू उर्फ़ बेदू ठेकेदार जाट समुदाय से हैं तथा तीनों ही जीत का दावा कर रहे हैं। जाट वोटर भी अपने-अपने प्रत्याशी का खुलकर समर्थन कर उनका हौसला बढ़ा रहे हैं। जाट वोट तीनों में बटेंगे लेकिन अभी तक के आकलनों से लगता है कि दिग्विजय को जाटों का ज़्यादा समर्थन मिलेगा। हालाँकि चौटाला परिवार की कलह जिस मुकाम पर पहुँच गई है, उससे उन्हें कुछ नुकसान भी उठाना पड़ सकता है।

भाजपा और राजकुमार सैनी की एलएसपी ने गैर-जाट उम्मीदवारों पर दाव लगाया है। जहाँ तक भाजपा की बात है, वह पंजाबी उम्मीदवार, गैर-जाट मतों के ध्रुवीकरण और ग्रुप-डी की भर्ती के सहारे दलित-पिछड़ों के समर्थन हासिल करने की रणनीति अपनाकर अपनी जीत सुनिश्चित करना चाहती है। मेयर चुनावों में भी भाजपा की जीत का मूलमंत्र पंजाबी कार्ड खेलना और गैर-जाट वोटों को अपने पक्ष में मोड़ना ही रहा था। लगता है कि फरवरी 2016 में हुई आरक्षण-हिंसा के बाद भाजपा ने अपनी राजनीति को पूरी तरह से 35 -1 के फार्मूले पर केंद्रित कर लिया है।

इसके बावजूद जींद में भाजपा प्रत्याशी कड़े मुकाबले में फसे हैं और अंदरखाने सरकार को भी उनकी जीत पर संदेह के बादल मंडराते नज़र आ रहे हैं। इसलिए भाजपा ने अपनी पूरी सरकार को जींद के रण में उतार दिया है। साथ ही विरोधियों को तोड़ने-लालच देने का खुला खेल भी खेल जा रहा है। राजकुमार सैनी की पार्टी के पदाधिकारियों को तोड़ने के साथ-साथ उनके प्रत्याशी के चुनाव मैदान से हट जाने की खबर वायरल करना ‘पार्टी’ की इसी रणनीति का हिस्सा था। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा पर सी बी आई की रेड भी राजनीतिक पंडित जींद चुनाव से जोड़कर देख रहे हैं। लोगों का मानना है कि यह सब हुड्डा को चुनाव-प्रचार से दूर रखने के लिए किया गया है। इन सबका भाजपा प्रत्याशी को कितना फायदा मिलेगा, यह तो कहना कठिन है अलबत्ता कांग्रेस और एलएसपी इसे सत्ता के दुरुपयोग और भाजपा की तानाशाही के रूप में प्रचारित करके सहानुभूति जुटाने के प्रयास में अवश्य जुट गई हैं।

राजकुमार सैनी इस वक़्त भाजपा के गले की हड्डी बने हुए हैं। अभी तक किसी गिनती में न गिने जाने वाले उनके प्रत्याशी विनोद आश्री पिछले एक हफ्ते में तेज़ी से आगे बढ़े हैं। विशेष तौर पर जब बीजेपी द्वारा एलएसपी को तोड़ने का प्रयास किया गया तो सैनी ने आक्रामक रुख अपनाते हुए बीजेपी पर रिश्वत देने का आरोप जड़ दिया। उन्होंने बाकायदा प्रेसवार्ता करके कहा कि चुनाव मैदान से हटने की एवज में भाजपा ने उन्हें 500 करोड़ तथा विनोद आश्री को 50 करोड़ रुपये देने की पेशकश की थी। भाजपा के किसी बड़े नेता ने इसका खंडन नहीं किया। इससे एलएसपी समर्थकों और शुभचिंतकों में नई ऊर्जा का संचार हुआ और उन्होंने शहरी मतदाताओं को अपने पक्ष में लाने की रणनीति के तहत जुलूस की शक्ल में वोट मांगने का अभियान छेड़ दिया। सैनी का 25 जनवरी का रोड शो भी भाजपा की नींद उड़ाने के लिए काफी था। स्थानीय लोगों का मानना है कि जितने लोग रोड शो में थे, उससे आधे भी अगर विनोद आश्री को वोट दे देते हैं तो नतीज़ा बेहद अप्रत्याशित और चौकाने वाला रहेगा।

दलित वोटरों को रिझाने की दिशा में बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर के पौत्र प्रकाशराव अम्बेडकर को अपने समर्थन में लाकर सैनी ने एक और मास्टरस्ट्रोक खेला है। विनोद आश्री को वोट देने की प्रकाश राव अम्बेडकर की अपील का कितना असर दलित मतदाताओं पर पड़ेगा, यह तो समय ही बताएगा पर यह ‘चुप’ वोटरों को प्रभावित करने के लिए काफी कारगर हो सकता है।

कुल मिलाकर देखें तो चुनाव बुरी तरह फँस गया है। शुरुआत में जहाँ जजपा के दिग्विजय चौटाला की एकतरफा जीत के अनुमान लगाए जा रहे थे, वहीँ एक समय ऐसा भी आया जब भाजपा के डॉ. कृष्ण मिड्ढा बढ़त की स्थिति में नज़र आने लगे। चौटाला परिवार में कलह बढ़ने से एक बार दिग्विजय का ग्राफ गिरा परन्तु 26 जनवरी की रैली और उसमें दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की उपस्थिति ने उन्हें पुनः मुख्य मुकाबले में ला दिया है। इधर राजकुमार सैनी का प्रभाव बढ़ने से बीजेपी के लिए खतरा बढ़ गया है। उमेद रेढू की सारी उम्मीद चौधरी ओमप्रकाश चौटाला के आने पर टिकी थी। इसलिए उनकी फरलो का रद्द होना इनेलो प्रत्याशी के लिए बड़ा झटका कहा जा सकता है। रणदीप के लिए नरवाना और कैथल के उनके समर्थक काफ़ी ज़ोर लगा हैं, पर उनका भविष्य भी इसी बात पर टिका है कि वे दलित-पिछड़े तथा शहरी वोटों में कितनी सेंध लगा पाते हैं।

सम्पर्क : 941623992

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