हरियाणा का इतिहास-सतनामियों का विद्रोह

बुद्ध प्रकाश

यद्यपि अकबर (1556-1605), जहांगीर (1605-1627) तथा शाहजहां (1627-1658) के राज्यकाल में हरियाणा में शांति रही और यहां पर सड़कों, सरायों, कोशमीनारों तथा कुओं का निर्माण किया गया, तथापि कृषकों की स्थिति में पर्याप्त सुधार नहीं हुआ। देश के अन्य भागों में भी कृषकों की स्थिति दीन-हीन थी, उनकी उपज का अधिकांश भाग सरकार तथा इसके कर्मचारी वर्ग करों तथा अन्य लगानों के रूप में ले जाते थे। अतः अकाल आदि प्राकृतिक आपदाओं का सामना करने के लिए उनके पास साधन तथा शक्ति नहीं थी और वे भारी संख्या में मृत्यु का ग्रास बन गए। 1554-6 के अकाल, दिल्ली प्रांत भी जिसकी लपेट में आ गया था, इतनी भारी संख्या में लोगों की मृत्यु हुई कि मृतकों को कब्र या कफ़न, कुछ भी नहीं दिया जा सका। देहात का अधिकांश वीरान हो गया था तथा ग्राम उजाड़ दिखाई देते थे। 1572-73 में सरहिन्द में और इसके आसपास एक अन्य अकाल में असंख्य लोगों की मृत्यु हो गई। 1596 में अनावृष्टि के कारण कीमतें बहुत ज्यादा बढ़ गईं और सम्राट को प्रत्येक शहर में मुफ्त भोजनालय खोलने पड़े। 1615-16 में अनावृष्टि के पश्चात् गिल्टीदार प्लेग फैल गई, जिससे पंजाब से सरहिन्द तथा दिल्ली के प्रदेश में भारी क्षति हुई। 1636-37 में पंजाब में अकाल पड़ा तथा 1646 में मिली रिपार्टों के अनुसार लोगों को पेट भरने के लिए अपने बच्चों तक को बेचना पड़ा। 1650 में भारत के किसी भी भाग में वर्षा नहीं हुई तथा 1658 में घोर अनावृष्टि के कारण लोगों को अकथनीय विपत्तियों का सामना करना पड़ा। इन रोज़मर्रा की विपत्तियों ने लोगों को परेशान एवं अशांत कर दिया तथा वे विद्रोह करने पर उतारू हो गए। सतनामियों के विद्रोह ने इस आंदोलन को हरियाणा में ओर भी तेज कर दिया।

सतनामी सम्प्रदाय भक्ति आंदोलन की एक शाखा थी। इसका प्रवर्तक नारनौल परगने के बिजासर गांव का बीरभान था। उसके अनुयायी साधु या मुण्डी कहलाते थे। दबिस्तान-ए-मजाहिब के लेखक जुल्फिकार अर्दिस्तानी मोबेड के अनुसार-‘सुनार, बढ़ई, मोची तथा छोटे पेशे वाले अन्य लोग उनमें सम्मिलित थे।’ उनमें प्रव्रज्या तथा युद्धप्रियता, कट्टरता तथा व्यवसाय का अद्भुत संयोग था जो खफ़ी खां की ‘मुन्तखाब-अल-लुबाब’ के निम्नलिखित वर्णन से स्पष्ट हो जाता है: यद्यपि वे फकीरों की सी वेशभुषा पहनते थे, परन्तु उनमें से अधिकतर लोग खेतीबाड़ी करते थे या फिर थोड़ी-बहुत पूंजी से कोई व्यवसाय करते थे। अपनी निष्ठा के पथ पर चलते हुए वे प्रतिष्ठापूर्वक जीवन जीना चाहते थे। उन्होंने बेईमानी या अवैध उपायों से धनोपार्जन करने का कभी प्रयत्न नहीं किया, किंतु यदि कोई दूसरा उन्हें तंग करने का प्रयत्न करता, तो वे इसे सहन नहीं कर सकते थे। प्रायः लोग सशस्त्र होते थे।’ उनकी एक धार्मिक पुस्तक ‘सतनाम सहाय’ (पोथी ज्ञान वाणी साध सतनामी) में जाति भेद, भिक्षावृत्ति, गुप्त संचय तथा धनिक वर्ग की दासता की भतर्सना की गई । निर्धन को तंग न करो, अन्यायी राजा तथा बेईमान धनी पुरुष की संगति से दूर रहो, उनसे या राजाओं से कोई उपहार स्वीकार न करो-ये इसके क्रांतिकारी आदेश थे (इरफन हबीब, एग्रेरियन सिस्टम आफ मुगल इण्डिया, पृ. 342)। 1820-30 में छत्तीसगढ़ के घासीदास चमार द्वारा संस्थापित सतनामी सम्प्रदाय के सात उपदेश, जो कि मूल सम्प्रदाय के सिद्धांतों पर आधारित थे, ये थे-मांस, शराब तथा लाल रंग की कुछ सब्जियों (रक्त वर्ण से समानता के कारण) से परहेज, मूर्ति पूजा निषेध, कृषि के लिए गायों के प्रयोग का निषेध तथा समाज के सभी वर्गों में समानता भाव, परन्तु फिर भी गुरु परिवार के लिए उच्चतर प्रतिष्ठा का निदेश था। रसेल के कथनानुसार, सतनामी आन्दोलन वस्तुतः समाज में तुच्छ समझे जाने वाले चमारों तथा चर्मशोधकों की ओर से किया गया सामाजिक विद्रोह है। घासी दास के धर्म का मूल सिद्धांत जाति-भेद तथा इसके साथ-साथ ब्राह्मणों की प्रभुता को समाप्त करना है। इसी कारण पुरोहितों में कटु विद्वेष की भावना जागृत हो गई। दोनों वर्गों में कटु एवं स्थायी मतभेद हैं और चमार कृषक अपने हिन्दू भूस्वामियों को भूमि-कर देने से इन्कार कर इस विद्रोह को व्यक्त करते हैं। (के.बी. रसल, ट्राइब्ज एण्ड कास्ट्स आफ सैन्ड्रल प्रोविसिंज आफ इण्डिया, खण्ड-1, पृ. 307-315)।

अतः स्पष्ट है कि सतनामी सम्प्रदाय सत्ता तथा विशेषाधिकार के विरुद्ध एक सुधारवादी, कट्टरवादी तथा क्रांतिकारी आंदोलन था। इस सम्प्रदाय ने जाति, धर्म तथा प्रदेश की सीमाओं से ऊपर उठकर जन सामान्य, अधिकांशतः कृषकों तथा दस्तकारों को एक भाईचारे के रूप में संगठित किया। इस प्रकार स्वभावतः शासक वर्ग से इसका विरोध हो गया। 1672 में एक छोटी सी घटना से इसकी गति ओर भी तेज हो गई। नारनौल के एक सतनामी कृषक का एक सिपाही (पियादा), जिसकी पहरेदार की ड्यूटी थी, से झगड़ा हो गया। सिपाही ने कृषक को अपनी बेंत से पीटा। कृषक जोर-जोर से चीखा-चिल्लाया, जिससे बहुत से सतनामी इक्ट्ठे हो गए और उन्होंने सिपाही को पीटा। इस पर नारनौल के शिकदार ने दोषियों को गिरफ्तार करने के लिए आदमी भेजे। परन्तु उन्होंने उन सिपाहियों को भी पीटा और उनके शस्त्र छीन लिए। इसके पश्चात् जो भी हुआ, उसका उल्लेख भी जदुनाथ सरकार इन शब्दों से करते हैं-‘इस झगड़े ने शीघ्र ही धार्मिक झगड़े का रूप धारण कर लिया और औरंगजेब पर हमला करके हिन्दुओं को आजाद करवाने के लिए युद्ध ठन गया। उनकी एक वृद्ध भविष्यदर्शिका ने घोषणा की कि वह अपने मंत्रों से रात के समय एक अदृष्ट सेना तैयार कर सकती है तथा उसकी ध्वजा के नीचे लड़ते हुए सतनामी अपने शत्रु के शस्त्रों से मारे नहीं जाएंगे, यदि उनमें से कोई एक मारा भी जाएगा, तो उसके स्थान पर 80 अन्य पैदा हो जाएंगे’ (जे.एन. सरकार, हिस्ट्री आफ औरंगजेब, भाग-3, पृ. 299)। इससे विद्रोहियों में साहस का संचार हुआ तथा उनकी संख्या में अत्यधिक वृद्धि हो गई। आन्दोलन की गति मासिर-ए-आलमगीर (पृ. 115) की इस टिप्पणी से स्पष्ट हो जाती है कि ‘वे अकस्मात् ही पृथ्वी से पंतगों की तरह पैदा हो गए और टिड्डियों की भांति आकाश से गिर पड़े।’ शीघ्र ही उन्होंने नारनौल के फौजदार, ताहिर खां की फौजों को एक करारी हार दी, उन्हें भारी क्षति पहुंचाई तथा मारा भगाया और नगर पर कब्जा कर लिया। नारनौल तथा बैरात के कब्जे से सतनामियों को युद्ध के लिए सुरक्षित आधार स्थल प्राप्त हो गए।

सतनामी विद्रोह धार्मिक विद्रोह होने के बावजूद केवल हिन्दू आंदोलन नहीं था। यदि ऐसा होता तो कुछ मुसलमान जनरल उनके साथ लड़ने से इन्कार न करते और न ही कुछ राजपूत सेनाध्यक्ष ऐसा करने के लिए सहमत ही होते। जो कुछ भी हो, इसने उग्र रूप धारण कर लिया और इस संबंधी अनेकों किस्से-कहानियां प्रचलित हो गईं  कि यह किसी जादुई तथा दैवी शक्ति द्वारा सुरक्षित है। निकोरालो माजुकी के शब्दों में ‘औरंगजेब ने इसको अपने जीवनकाल का सबसे बड़ा खतरा समझा’ (स्टोरिया डू मोगर अनु. विलियम इरविन, खंड-2, पृ. 157)। जब विद्रोही दिल्ली के निकट पहुंच रहे थे और खाद्य-सामग्री की सप्लाई काट दी गई थी, तो उसने उन्हें दबाने के लिए भारी सेना भेजी, परन्तु रिवाड़ी पहुंचने पर इसकी हिम्मत टूट गई और यह भाग खड़ी हुई। इस पर उसने शहजादा मुहम्मद अकबर के नेतृत्व में रदन्दाज खां, यहिया खां, दबी खां, कमालुद्दीन, इस्कन्दिर बख्शी जैसे अनुभवी जरनैलों के अधीन एक भारी सशक्त सेना भेजी तथा इसके मनोबल को बढ़ाने के लिए उसने अपने हाथ से सूक्त लिखे तथा जादुई आकृतियां बनाई और उन्हें सेना की ध्वजाओं पर लगवाया। नारनौल के स्थान पर सतनामियों के साथ घोर युद्ध हुआ। अल्प साधनों तथा मामूली प्रशिक्षण के बावजूद, सतनामियों ने महाभारत के महायुद्ध के दृश्यों की याद ताजा कर दी। यद्यपि वे हार रहे थे, फिर भी उन्होंने पीठ नहीं दिखाई और युद्ध भूमि में लड़ते हुए धराशायी हो गए। मुगल सेना के सैनिक भारी संख्या में हताहत हुए और बहुत से शाही अमीरों तथा सिपाहियों को जीवन से हाथ धोना पड़ा। इस प्रकार तात्कालिक शासन के विरुद्ध इस विशाल तथा व्यापक विद्रोह का अन्त हुआ। आम तथा सामयिक सीमित महत्व के विद्रोहों की भांति, इसका नेतृत्व करने के लिए कोई उत्तराधिकारी सामने नहीं आया, जो इस विनाश के पश्चात् इसे संभाल सकता। इसका स्थान जाट-जमींदारों के उच्च उद्देश्यपूर्ण विद्रोह ने ले लिया और वे दीर्घकाल तक मुगलों से निरन्तर विद्रोह करते रहे। (विद्रोहों के इस वर्गीकरण के लिए देखिए-मैक्स वैबर, बेसिक कन्सैप्ट्स इन सोशियोलौजी अनु. एच.पी. सैकर, न्यूयार्क, 1964, पृ. 59-62)।

साभार-बुद्ध प्रकाश, हरियाणा का इतिहास, हरियाणा साहित्य अकादमी पंचकूला, पृः 50

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