हरियाणा का इतिहास-चौहान तथा गौरी वंश के प्रमुख युद्ध-स्थल

बुद्ध प्रकाश

बारहवीं शताब्दी में चौहान (चाहमन) शासक अर्णोराजा (1133-51) ने हरियाणा या अपने अजमेर अजायबघर शिलालेख में उल्लिखित हरितनक प्रदेश पर आक्रमण करके तोमरो को परास्त किया। परन्तु दिल्ली तथा हरियाणा पर अंतिम विजय लगभग 1156 में बीसलदेव या विग्रहराजा-6 ने प्राप्त की। उसने हरियाणा के लोगों भदनकों को परास्त करके तोमरो से दिल्ली और हांसी छीन लिए। संभव है कि तोमर अपने राज्य के कुछ भागों पर चौहानों के सामन्तों के रूप में राज्य करते रहे हों। इस विजय ने चौहानों को भारत की सर्वोच्च शक्ति बना दिया, क्योंकि तोमरों के अधीन दिल्ली तथा हरियाणा पर अधिकार अखिल भारतीय प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गया था। इस विरोध तथा अन्तर्विरोध की स्थिति में उस प्रदेश को जीतने के लिए उत्तर-पश्चिम से आक्रमणकारियों ने अनेकों बार हमले किए, परन्तु चौहानों ने उन सभी को पीछे धकेल दिया, जैसा कि हमें दिल्ली-शिवालिक शिलालेख से मालूम होता है।

बीसलदेव के उत्तराधिकारी अमरगांगेय या अपर गांगेय की उसके चचेरे भाई पृथ्वीभट द्वारा हत्या कर दी गई और वह पृथ्वीराज-।। के नाम से गद्दी पर बैठा। उसका एक शिलालेख हांसी से प्राप्त हुआ है, जिससे पता चलता है कि उसने दुर्गों को सुदृढ़ किया और अपने मामा किल्हन को इसका राज्यपाल नियुक्त कर दिया। उसने कालका के निकट पंकपुर (पिंजौर) नरेश को भी परास्त किया।

इस वंश का अगला प्रसिद्ध शासक सोमेश्वर का पुत्र पृथ्वीराज-।।। था। अपने शासन के प्रारंभिक वर्षों में उसे भदनकों से लड़ना तथा उन्हें पराजित करना पड़ा, जिससे पता लगता है कि उसे हरियाणा में कुछ कष्टमय समय बिताना पड़ा। संभवतः पृथ्वीराज-।। की मृत्यु के बाद विद्रोहों के दौरान, कुछ लोगों ने इस खलबली से लाभ उठाना चाहा और उनका दमन करना पड़ा। दिल्ली तथा हरियाणा पर सुदृढ़ अधिकार होने से पृथ्वीराज समस्त भारत के एक छत्र साम्राज्य के स्वप्न लेने लगा तथा विजय अभियान प्रारंभ कर दिया। यद्यपि वह महत्त्वकांक्षी तथा उद्यमी था परन्तु आवेगशील तथा निरंकुश होने के साथ-साथ उसमें धैर्यपूर्ण कूटनीति तथा प्रभावोत्पादक गुणों का अभाव था। उसने चंदेलों, गाहड वालों, चालुक्यों तथा अन्य राज्यों पर आक्रमण करके उन्हें शत्रु बना लिया, जबकि वह शिहाबुद्दीन के नेतृत्व में दुर्जेय गोरियों के विरुद्ध जो बार-बार उसके राज्य पर आक्रमण करके लूट-खसोट रचा रहे थे, समझा-बुझा कर उनकी सहायता प्राप्त कर सकता था।

1173 में शिहाबुद्दीन को गजनी का राज्यपाल नियुक्त किया गया। उसने 1175 में भारत में अपने प्रथम अभियान का नेतृत्व किया तथा मुलतान और उच्च पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार एक चौकी बना लेने के पश्चात् वह 1178 में किराडु तथा नाडोल के रास्ते गुजरात की तरफ बढ़ा। परन्तु पृथ्वीराज और उसका मंत्री, कदम्बवास अपने विरोधी चालुक्यों की पराजय की संभावना से हर्षित हो रहे थे। तथापि, चालुक्यों ने कासदा की लड़ाई में अकेले ही गोरियों को परास्त किया था, परन्तु शीघ्र ही चौहान अपनी नीति के चक्कर में स्वयं भी आ गए। शिहाबुद्दीन ने 1181 में स्यालकोट पर अधिकार कर लिया और पांच वर्षों के पश्चात् अंतिम गजनवी शासक खुसरो मलिक से लाहौर छीन लिया। वहां से उसने हरियाणा में चौहानों के राज्य क्षेत्र में अपने आक्रमण तथा लूटमार आरंभ की। किंवदंती के अनुसार उसने चौहानों पर आठ बार आक्रमण किया। सात लड़ाइयों में पृथ्वीराज ने गौरी आक्रमणकारियों को परास्त किया (अबुल फजल, आइने-अकबरी अनु. फ्रांसिस ग्लैडविनी, पृ. 384)। सातवीं लड़ाई बहुत महत्वपूर्ण थी, क्योंकि इसमें चौहानों ने शिहाबुद्दीन को बुरी तरह घायल किया और गोबिन्दराय ने उसके कंधे से बरछी घोंप कर उसे मरणासन्न कर दिया, परन्तु पृथ्वीराज आक्रमणकारियों का प्रभावी ढंग से पीछा नहीं कर सका और न ही पूर्वी पंजाब में अपना क्षेत्र जीत सका। बल्कि उसने इस संबंध में सभी कुछ भूल कर अपने राज्य के सरदारों को मर्मान्तक पीड़ा पहुंचाना आरंभ कर दिया, उनमें से उसका सर्वाधिक अनाचारी कार्य था, कन्नौज के राजा जयचन्द गाहडवाला द्वारा आयोजित स्वयंवर में से उसकी पुत्री संयोगिता का अपहरण। उस परम सुंदरी राजकुमारी के साहचर्य ने उसे उत्तर-पश्चिम में मंडरा रहे भारी संत्रास के प्रति असावधान एवं शिथिल कर दिया। अतः 1192 में जब शिहाबुद्दीन 120,000 सशस्त्र घुड़सवारों सहित सीमाओं पर आया, तो पृथ्वीराज दावतों तथा विलासोत्सवों में मग्न था तथा इसी धोखे में था कि उसकी विजय तो पूर्व निश्चित है। दूसरी ओर शिहाबुद्दीन ने कूटनीति से काम लेते हुए सन्धिवार्ताएं प्रारंभ कर दीं और इस शर्त पर अपने प्रदेश लौट जाने के लिए तैयार हो गया कि वह भटिंडा और पंजाब गौरियों को समर्पित कर दिए, जिससे उसमें व्यवहार कुशलता का नितांत अभाव तथा तुर्कों की युद्धनीति के दांवपेचों के प्रति अनभिज्ञता लीक्षित होती है। उसने सबसे बड़ी गलती यह की कि जब सन्धिवार्ता चल रही थी, तो उसने केवल यह सोचते हुए कि शिहाबुद्दीन की पूर्व पराजय उसे प्रस्ताव के प्रति गंभीर बना देगी, वह चौकन्ना व सावधान नहीं रहा। अतः शीतकाल की एक प्रातः को जब राजपूत सैनिक शौच एवं स्नान के लिए जा रहे थे, उन्होंने अभी प्रातःकालीन अल्पाहार भी नहीं लिया था, शिहाबुद्दीन ने बिल्कुल गुप्त ढंग से रात भर सावधानीपूर्ण तैयारी करके अकस्मात ही हमला कर दिया। उसकी सेना की दस-दस हजार सैनिकों की चार टुकड़ियां, दाएं-दाएं, अग्रभाग तथा इल्तमिश (पश्चभाग या आरक्षित), बारी-बारी से कुछ फासले से गोली चलाकर राजपूतों पर आक्रमण करती रहीं और उन पर दूसरी ओर से भीषण आक्रमण होने पर पीछे हटती रहीं। आगे बढ़ने और पीछे हटने की इस युद्धकला से राजपूत सेना अनुमान से ही इधर-उधर भागती रही। दोपहर के बाद लगभग तीन बजे, जब राजपूत थकावट और भूख से व्याकुल थे, शिहाबुद्दीन ने अपने 12 हजार सैनिकों को आरक्षित दल को दूसरी ओर से धावा बोलने का आदेश दिया। इस प्रकार पलभर में ही राजपूत अस्तव्यस्त हो गए तथा थानेसर के निकट तरावड़ी का युद्ध क्षेत्र उनके क्षत-विक्षत शरीरों तथा खून से भर गया। उनके सभी प्रमुख सरदार तथा पृथ्वीराज इस नरसंहार में मारे गए, यद्यपि बाद की कथाओं में उसके बाद भी उसके महान साहसिक कार्यों का वर्णन किया गया है। हरियाणा तथा दिल्ली तुर्कों के अधिकार में थे तथा हांसी, सरस्वती, समाना तथा कोहराम के किले उनके पास थे। उस समय हरियाणा के इतिहास ने एक नया मोड़ लिया।

साभार-बुद्ध प्रकाश, हरियाणा का इतिहास, हरियाणा साहित्य अकादमी पंचकूला, पृ. 33

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