हरियाणा का इतिहास-आर्थिक समृद्धि तथा सांस्कृतिक विकास

बुद्ध प्रकाश

प्रतिहारों तथा तोमरों के शासन के दौरान हरियाणा में व्यापार, कला तथा संस्कृति सर्वोच्च शिखर पर पहुंच गई, जिसका आभास हमें दशवीं शताब्दी में लिखित सोमदेव के ‘यशस्तिकलकचम्पू’ से मिलता है। उसका कथन है कि यौधेय देश, अर्थात् हरियाणा प्रदेश पृथ्वी को सुशोभित करता था तथा सुख-समृद्धियों से परिपूर्ण था। यहां के लोग धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति के लिए आवश्यक सर्वगुण सम्पन्न थे और स्वर्गमय जीवन यापन करते थे। यहां के गांव पशुधन, सुसिंचित खेतों, लहलहाती फसलों एवं फलोद्यानों से भरपूर थे। फसल इतनी अधिक होती थी कि कृषक भली-भांति उसकी छटाई आदि नहीं कर पाते थे। लोग सामान्यतः श्रमजीवी, शिल्पकार एवं कृषक थी जो सत्कारशील तथा उदास हृदय थे। वे अपने इष्ट देव कार्तिकेय तथा अपने शासकों के प्रति निष्ठावान थे और बिना किसी आपत्ति के अधिक कर देते थे। महिलाएं सुगठित एवं सुंदर, आभूषणों से लदी हुई तथा चुस्त परिधान पहन कर खेतों-खलिहानों में कार्य करती हुई आने-जाने वालों का ध्यान आकर्षित करती थीं। लोगों का शांतिमय एवं संतोषप्रद जीवन इस बात का प्रमाण है कि सामाजिक संघर्ष प्रायः नहीं होता था और जात-पात तथा व्यवसाय की प्रथा कायम थी तथा लोग वर्णाश्रम धर्म के प्रति श्रद्धावान थे। प्रमुख नगर राजपुरा में, जो संभवतः अम्बाला के समीप आजकल का राजपुरा ही है, फव्वारों तथा तालाबों सहित विशाल प्रासाद तथा भव्य मन्दिर निरंतर आनन्दोत्सव से गुंजित होते रहते थे। (‘यशस्तिलकचम्पू’, सं0 सुंदर लाल शास्त्री, वाराणसी, पृ. 8-12)। इस वर्णन की पुष्टि इस काल की श्रेष्ठ मूर्तिकला, विशेषतः ब्रह्मा, सरस्वती, शिव और पार्वती की प्रतिमाओं तथा तत्कालीन मानव की, अभिरूचि और संस्कृति से हो जाती है (बुद्ध प्रकाश, ग्लम्पसिज आफ हरियाणा, पू. 21-22)।

साभार-बुद्ध प्रकाश, हरियाणा का इतिहास, हरियाणा साहित्य अकादमी पंचकूला, पृ. 29

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