हरियाणा का इतिहास-गज़नी तथा काश्मीर से आक्रमण

बुद्ध प्रकाश

ग्यारहवीं शती में, तोमर यद्यपि प्रतिहारों से स्वतंत्र हो गए थे, तथापि उन्हें गजनवी-तुर्कों के आक्रमणों का सामना करना पड़ा। 1014 में महमूद गजनवी ने थानेसर पर आक्रमण करके चक्रतीर्थस्वामिन की प्रतिमा को नष्ट करते हुए मंदिरों को भ्रष्ट कर दिया। तोमर शासक ने गज़नवियों को भगाने के लिए भारतीय शासकों से सहायता की अभ्यर्थना की, ताकि उत्तरी भारत को विध्वंस होने से बचाया जा सके, किंतु कोई भी उसकी सहायतार्थ आगे नहीं आया। आनंदपाल का देहांत हो जाने पर उसका पुत्र त्रिलोचनपाल महमूद के विरुद्ध मैदान में आया और उसने काश्मीर नरेश की सहायता ली। तौशी, आजकल की टोही, नदी के तट पर हुए युद्ध में सेनापति तुंग की असावधानी के कारण त्रिलोचनपाल को पराजय का मुंह देखना पड़ा। इस पराजय के बाद भी नरेश ने साहस न छोड़ा और सियार हिन्द में अपनी सेना को संगठित किया। तथापि दुर्भाग्यवश सर्सावा शासक चान्द राय ने यमुना के तट पर उसके साथ युद्ध किया और इस प्रकार उसका पर्याप्त समय तथा शक्ति नष्ट हो गई। अतः 1018 में त्रिलोचनपाल को वह प्रदेश छोड़ कर मालवा में शरण लेनी पड़ी, जिससे महमूद के लिए हरियाणा और दोआबा पर आधिपत्य जमाना सुलभ हो गया।

1018-19 में महमूद ने बुलंदशहर, मथुरा और कुंजपुरा पर आक्रमण करके लूटमार करते हुए इस प्रदेश में से प्रस्थान किया। अगले वर्ष पुनः उस प्रदेश पर आक्रमण करके वह प्रतिहार दुर्गबारी तक पहुंच गया तथा चन्देलों की राजधानी पर भी उसने सहसा आक्रमण कर दिया। अगले वर्ष पुनः उसने उत्तरी भारत पर आक्रमण कर दिया और ग्वालियर तथा कलंजर पर चढ़ाई की।

1031 में महमूद की मृत्यु के पश्चात् उसके उत्तराधिकारियों ने हरियाणा पर अनेक आक्रमण किए। 1034 में नियालितिजिन हरियाणा के रास्ते गंगा को पार करते हुए बनारस पहुंचा तथा आधा दिन वहां लूटमार की। दो वर्ष पश्चात् 1036 में सुलतान मसूद ने हांसी पर आक्रमण करके घमासान युद्ध के पश्चात् उस पर कब्जा कर लिया। वहां से उसने सोनीपत की ओर प्रस्थान किया और उसके शासक दिपालहर को पराजित किया। इसी आक्रमण के परिणामस्वरूप हरियाणा में गजनवी वंश का शासन हो गया और हांसी उनका मुख्य दुर्ग था। हांसी से सिन्ध तक के विशाल भू-भाग के शासक मसूद के पुत्र मजदूद की राजधानी हांसी थी। जब उसका पुत्र मोदजूद गजनी के सिंहासन पर आरूढ़ हुआ, उसने उसके प्रति राजभक्त होने से इन्कार कर दिया। अतः मोदूद ने उसे दण्ड देने के लिए सेना भेजी। आक्रमणकारी सेना का मुकाबला करने के लिए वह भी हांसी से चल पड़ा। परन्तु लाहौर में रहस्यमयी परिस्थितियों में, संभवतः विष दिए जने के कारण, 1040 में उसकी मृत्यु हो गई, मोदूद ने यू मजदूद के क्षेत्र पर कब्जा कर लिया और हरियाणा भर में हांसी, थानेसर और अन्य स्थानों पर अपने व्यक्ति तैनात कर दिए।

इस प्रकार घिर जाने पर तोमर ने उत्तरी भारत के कुछ प्रमुख नरेशों से मैत्री की। अब तक उत्तरी भारत के नरेश तोमर राजा के पूर्व अनुरोध को न मानने के परिणामों को लक्ष्य कर चुके थे। अतः वे तुरंत तोमर राजा, संभवतः महीपाल, से मिल गए और गजनवी वंश से हरियाणा पुनः प्राप्त करने के लिए आगे बढ़े। तोमर नरेश द्वारा भोज परमार, कर्ण कलचुरी, शकम्भरी के दुर्लभ राजा-3 जैसे सुप्रसिद्ध शासकों को मिला लिया जाना उसकी राजनयिक कुशलता तथा राजनीतिज्ञता का प्रत्यक्ष प्रमाण है। इन मित्र राज्यों ने मौदूद के अधिकारियों से हांसी, थानेसर तथा अन्य स्थान छीन लिए और नगरकोट पर कब्जा करके लाहौर की ओर प्रस्थान किया तथा सात मास तक उस पर घेरा डाले रखा। परन्तु सहसा एक दिन इसकी रक्षा करने वाली मुसलमान सेना ने आक्रमण करके भारतीय सेना को विध्वंस कर दिया। तथापि, लाहौर के पूर्व का प्रदेश उनके कब्जे में आ गया।

1049 में मौदूद की मृत्यु के पश्चात् सिंहासन के लिए हाने वाले झगड़ों से पूर्वी पंजाब और हरियाणा के भारतीयों को कुछ आराम मिला। परन्तु 1059 में मसूद 1 के शक्तिशाली पुत्र इब्राहिम ने सिंहासनारूढ़ होते ही भारत में पुनः आक्रमणकारी नीति को अपनाया। अनेक युद्धों में उसने जालंधर, अजुधन, सरहिन्द और रोपड़ को जीत कर बूरिया के समीप यमुना तक धावा बोल दिया और इस प्रकार हरियाणा के पर्याप्त भाग पर कब्जा कर लिया। उसका पुत्र महमूद 1075 में पंजाब का राज्यपाल नियुक्त किया गया। उसने यमुना पार करके दोआबा में प्रवेश किया, आगरा पर विजय प्राप्त की, कन्नौज पर आक्रमण किया, कालंजर को घेर लिया तथा उज्जैन पर आक्रमण कर दिया।

गजनवी वंश जब हरियाणा पर प्रचण्ड प्रहार कर रहा था, काश्मीर के लोहार नरेश इससे लाभ उठा रहे थे। काश्मीर के इतिहास कल्हण के कथन से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि लोहार नरेश अनन्त (1028-1063) ने अपना प्रभाव कन्नौज तक फैला लिया था (राजतरंगिनी V11, 235-237)। उसके पुत्र कलश ने भी हरियाणा पर चढ़ाई की, कुरुक्षेत्र पर आक्रमण किया और यमुना तक धावा बोल दिया, जिसका ज्ञान हमें कवि बिलहन के ‘विक्रमकदेवचरित’ ( VIII, 6263) से मिलता है, जिसकी और मैंने सर्वप्रथम अभी ध्यान आकृष्ट किया है। इससे स्पष्ट होता है कि 1075 में जब गजनवी के आक्रमण से हरियाणा में खलबली मची हुई थी, कलश ने भी सहसा आक्रमण कर दिया और कुरुक्षेत्र में मुकाबला करने वालों पर विजय प्राप्त की और यमुना तक के क्षेत्र पर कब्जा कर लिया। इस भीषण विपत्ति के कारण तोमर गजनवियों से सन्धि करने पर विवश हो गए, जैसा कि श्रीवर के ‘पाश्वनाथचरित’ के एक प्रसंग से ध्वनित होता है,  जिस ओर प्रो. दशरथ शर्मा ने अपनी हाल ही की खोज में ध्यानाकृष्ट किया है। उस समय से कश्मीर नरेश अपने ही राजवंशीय विवादों में फंस गए, जिसके परिणामस्वरूप उनकी हरियाणा की विजय निष्प्रयोजन सिद्ध हुई तथा गजनवी भी अनेक शताब्दियों तक गांगेय दोआब में केवल 1099 में हजीब तुगतिजिन के नेतृत्व में ही आक्रमण कर पाए।

अतः ग्यारहवीं शताब्दी में हरियाणा के तोमर शासकों को गजनवी वंश, कश्मीर के लोहार नरेशों तथा राजस्थान के चाहमान नरेशों के घोर विरोध का सामना करना पड़ा। बारहवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में प्रथम दो आक्रमणकारी समाप्त हो गए, परन्तु  तीसरे का विरोध अधिक उग्र रूप धारण कर गया, जिसके परिणामस्वरूप हरियाणा से तोमर शासन विस्थापित हो गया और चाहवान शासन की स्थापना हुई। परन्तु इसका वर्णन करने से पूर्व प्रतिहार तथा तोमर शासन के समय में हरियाणा के आर्थिक तथा सांस्कृतिक विकास के संबंध में कुछ बताना अपेक्षित होगा।

साभार-बुद्ध प्रकाश, हरियाणा का इतिहास, हरियाणा साहित्य अकादमी पंचकूला, पृ. 25

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