हरियाणा का इतिहास-प्रतिहारों तथा तोमरों का शासन

बुद्ध प्रकाश

हर्ष के पश्चात् उत्तरी भारत इतना कमजोर हो गया कि उस पर कोई भी कब्जा कर सकता था। चीन-तिब्बती आक्रमण से स्थिति अनिश्चित हो गई। कन्नौज के यशोवर्मन के उत्थान से कुछ शक्ति तथा व्यवस्था स्थापित हुई। पूर्वी तथा दक्षिणी भारत पर विजय प्राप्त करने के पश्चात् उसने हूणों तथा तुर्कों के आक्रमणों को रोकने के लिए श्रीकण्ठ, मरुदेश तथा कुरुक्षेत्र में विजय अभियान चलाया। (वाक्पतिराज कृत गौड़वाही, पद 434)। वहां से उसने पंजाब पर आक्रमण किया और उत्तर पश्चिम में पहुंच कर उतीची-पति (उत्तरी क्षेत्र का संरक्षक) की नियुक्ति की कुछ समय तक उसने तुर्कों और तिब्बतियों का सफलतापूर्वक सामना किया। किंतु काश्मीर नरेश ललितादित्य मुक्तपिदा उसके प्रभुत्व को सहन न कर सका। अतः उसने पंजाब तथा हरियाणा पर आक्रमण करके यमुना से लेकर कालिका तक के क्षेत्र को अपने प्रासाद-प्रांगण जैसा बना डाला (राजतंरगिणी पृ-145)। किन्तु शीघ्र ही ललितादित्य के शासन का भी अंत हो गया तथा हरियाणा में पुनः राजनीतिक अराजकता का दौर शुरू हो गया।

आठवीं शताब्दी के उत्तरार्ध अथवा नवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में बंगाल के पाल नरेश धर्मपाल (670-810 शताब्दी) द्वारा इंद्रयुद्ध के स्थान पर अपने व्यक्ति चक्रयुद्ध के अभिषेक के अवसर पर कन्नौज में दरबार लगाने और अन्य राजाओं के साथ-साथ कुरु नरेश को भी उसमें आमंत्रित किए जाने का उल्लेख मिलता है। इससे विदित होता है कि उस समय कुरु देश या हरियाणा का अपना शासक था और पाल नरेश ने उत्तरी भारत पर अपना आधिपत्य दर्शाने के लिए उसे अपने पक्ष में करने का प्रयत्न किया। किन्तु शीघ्र ही पाल वंश का साम्राज्यिक स्वप्न छिन्न-भिन्न हो गया और नरेश नागभट्ट द्वितीय (795-833 शता0) ने चक्रयुद्ध से कन्नौज छीन कर उसके आश्रयदाता धर्मपाल को पराजित करके अनार्ता, मालवा, किरात, तुरुश्क, मत्स्य आदि राज्यों पर अधिकार कर लिया और यह अंत तक प्रतिहारों के साम्राज्य में ही बना रहा।

882 ईसवी का पेहोवा शिलालेख हरियाणा में प्रतिहार शासन पर भी कुछ प्रकाश डालता है। इसमें अश्वपणिता परिषद् द्वारा कुछ धार्मिक भेंट दिये जाने का उल्लेख है। अश्वों का प्रमुख क्रेता प्रतिहार राज्य था। प्रतीत होता है कि प्रतिहार वंशज भोज नरेश सशक्त अश्व सेना तैयार करना चाहता था और इसलिए उसने खुले बाजार से घोड़ों की थोक खरीद की। देश-विदेश के व्यापारी अपने घोड़े प्रतिहारों को बेचने के लिए यहां आया करते थे। इस प्रकार हरियाणा में पेहोवा महत्वपूर्ण अश्व विपणता केंद्र, नव अश्वागार तथा अश्वपणिताओं के दान से अनुरक्षित देवालय स्थल बन गया।

पेहोवा के एक अन्य शिलालेख से स्पष्ट होता है कि प्रतिहारों ने हरियाणा पर राज्य करने के लिए तोमर नामक परिवार को जागीर दी। इस परिवार के पूर्णराज, देवराज तथा गोगा नामक तीन जागीरदारों ने प्रतिहारों के अधीन कार्य किया तथा शक्तिशाली शासन परम्परा चलाई। प्रतिहार-साम्राज्य के विघटन के समय ये स्वाधीन हो गए। इनमें से एक राजा अनंगपाल ने दिल्ली शहर की नींव रखी तथा इसे हरियाणा की राजधानी बनाया। इसके उत्तराधिकारी तेजपाल, मदनपाल, कृतपाल, लखनपाल तथा पृथ्वीपाल सुविख्यात सम्राट थे। इनमें से अनंगपाल, मदनपाल, पृथ्वीपाल तथा चहदपाल ने अपनी मुद्रा चलाई, जिन पर उनके नाम थे तथ ये अलाऊद्दीन खिलजी के समय तक चलते रहे, जैसा कि ठाकुर फेरु की ‘द्रव्यपरीक्षा’ से पता चलता है। रत्न परीक्षादि-सप्त-ग्रंथ-संग्रह (राजस्थान ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट, जोधपुर, पृ. 31)।

साभार-बुद्ध प्रकाश, हरियाणा का इतिहास, हरियाणा साहित्य अकादमी पंचकूला, पृ. 23

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