हरियाणा का इतिहास-राजकीय वैभव के पथ पर

बुद्ध प्रकाश 

गुप्त युग में शांतिकाल के दौरान हरियाणा का भौतिक एवं आर्थिक विकास हुआ। यहां के लोग देश के अन्य भागों में फैल गए, जहां वे अपने क्षेत्र का नाम ले गए। गुजरात में बसे लोगों ने मैत्रक सम्राट ध्रुवसेन प्रथम (519-549 ईसवी) के गनेसगद मुद्रणपट्टों में वर्णित बस्ती का नाम हरियाणा रखा, अन्य लोग मत्तमयूर का नाम मध्यप्रदेश तक ले गए। कुछ लोग दूरस्थ कम्बोडिया भी गए तथा वहां उन्होंने कुरुक्षेत्र की स्थापना की, जैसा कि यहां बाद में हुई। संभवतः आर्थिक विकास तथा जनसंख्या में वृद्धि के कारण ही लोग दूसरे भागों में चले गए, जैसा कि स्कन्द पुराण की इस उक्ति से स्पष्ट होता है कि हरियाणा में, जिसको हरियाला कहा जाता था, 5 लाख गांव थे (ए0बी0एल0 अवस्थी, स्ट्डीज इन स्कन्द पुराण जिल्द 1, पृ. 36)। गुप्त साम्राज्य के अंत में इस सम्पन्न काल में पुष्पभूति वंश ने आधिपत्य जमा लिया। इन्होंने हूणों के आक्रमण के दौरान शक्ति प्राप्त की। संभव है कि इस वंश के संस्थापकों का भारत में हुणों के विरुद्ध अभियान के संचालक मालवा के वर्धन शासकों से भी कोई संबंध रहा हो। इस वंश के तृतीय शासक आदित्यवर्धन ने संभवतः पूर्वी मालवा में सत्तारूढ़ उत्तरवर्ती गुप्त वंश के महासेन गुप्त की बहन से विवाह करके अपनी शक्ति को बढ़ाया, परन्तु चौथे शासक प्रभाकरवर्धन के काल में ही इस वंश का राजकीय महत्व बढ़ा। इसके शासनकाल के दौरान उसकी राजधानी थानेसर उत्तरी भारतीय राजनीति का केंद्र बनी। आरंभ में उसने उत्तरकालीन गुप्त सम्राटों के शत्रु कन्नौज के मौखरी वंश से मित्रता करने का साहस किया और संभवतः मौखरी राज कुमार ग्रहवर्मन से अपनी बेटी राज्यश्री का विवाह करके संबंध भी स्थापित किया। इस चाल द्वारा उसने हूण-विरोधी मोर्चा बना लिया तथा इस प्रकार वह भयंकर आक्रमणकर्ताओं को बुरी तरह परास्त कर पंजाब, गंधार और राजस्थान के भागों पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने में सफल हो गया। उसके शासन के अंतिम दिनों में हूणों ने एक बार फिर उसके राज्य की शांति भंग करने की चेष्टा की, परन्तु उसके वीर सुपुत्र राज्यवर्धन ने इस आक्रमण को पुनः छिन्न-भिन्न कर दिया, यद्यपि उसके भी इस मुठभेड़ में अनेकों घाव हो गए।

अपने चरमोत्कर्ष के समय गुप्त साम्राज्य राजधानी पाटलिपुत्र

उत्तरी भारत में पुष्पभूति वंश की परमशक्ति सुनिश्चित करने वाली हूणों पर निश्चित विजय के समय प्रभाकरवर्धन की मृत्यु हो गई। उसी समय यह समाचार मिला कि उत्तरकालीन गुप्त वंश के मालव सम्राट ने कन्नौज पर आक्रमण करके मौखरी सम्राट ग्रहवर्मन का वध करके उसकी राजमहिषी राज्यश्री को बंदी बना लिया। प्रतीत होता है कि हूणों पर विजय प्राप्त करके उत्तर पश्चिम में स्थिति सुदृढ़ कर लेने के पश्चात् पुष्पभूति-मौखरी गुट के साम्राज्यवादी अभियान को रोकने के लिए ही गौड़-मालव सन्धि की गई थी। योजना अनुसार उत्तरकालीन गुप्त सम्राट ने मालवा से प्रस्थान किया और गौड़ सम्राट शशांक पूर्व से कन्नौज की ओर बढ़ चला। योजना का प्रथम भाग सफल रहा और कुछ समय के लिए मौखरियों को घेर लिया गया और कन्नौज मित्र राज्यों के हाथ में आ गया। किन्तु शीघ्र ही राज्यवर्धन ने कन्नौज राज्य हस्तगत करने वालों पर विद्युत गति से आक्रमण करके उत्तरकालीन गुप्त सम्राट को परास्त कर दिया। यह देखते हुए गौड़ राज्य के धूर्त सम्राट ने छद्म नीति से हरियाणवी विजेता के लिए अधीनता और मित्रता ढोंग रचा कर, उसके साथ अपनी पुत्री के विवाह का प्रस्ताव रखा और उसे भोज तथा उत्सव में आमंत्रित किया और जब वह अकेला, निःशस्त्र और असावधान था तो धोखे से उसकी हत्या कर दी। इस अधम विश्वासघात ने पुष्पभूति के राज कुमार हर्षवर्धन को विचलित कर दिया और उसने अत्यधिक क्रोधित होकर शशांक जैसे दुष्ट से पृथ्वी को मुक्त करने का दृढ़ संकल्प कर लिया। बड़ी भारी सेना के साथ कन्नौज पर चढ़ाई की, गौड़ सेना पीठ दिखा गई और उसने कन्नौज पर अधिकार कर लिया, किंतु शशांक का पीछा करने की अपेक्षा उसने अपनी दुःखी बहन राज्यश्री को, जो अत्यधिक दुखी होकर कन्नौज से चली गई थी, ढूंढने तथा बचाने के लिए विन्धया वन में प्रवेश किया। सौभाग्यवश वह ठीक उस समय उसके पास पहुंच गया, जब वह स्वयं को चिता को अर्पण करने वाली थी। वह उसे समझा-बुझा कर अपने साथ लौटा लाया। फिर अपने मंत्रियों के परामर्श से वह कन्नौज की राजगद्दी पर बैठने के लिए सहमत हो गया तथा अपनी स्थिति सुदृढ़ करने के पश्चात् गौड़ राजा को दण्ड देने तथा समस्त उत्तरी भारत को जीतने के लिए निकल पड़ा। इस प्रकार हरियाणा का शासक उत्तरी भारत का सम्राट बन गया।

पुष्पभूति वंश के अधीन हरियाणा ने एक अत्यधिक वैभवशाली युग के दर्शन किए। यह आर्थिक सम्पन्नता, संस्कृति और ज्ञान तथा अत्युत्कृष्ट शक्तियों का केंद्र बन गया था। हर्ष के दरबारी कवि बाण ने इस प्रदेश के रंग-बिरंगे जीवन का सजीव तथा मनोरम वर्णन प्रस्तुत किया है। उसके अनुसार यह समस्त क्षेत्र हल चलाने की ध्वनि से गुंजित था, कुंओं और रहटों से फसलों को पानी दिया जाता था और खेत फसल के बड़े-बड़े अम्बारों से परिपूर्ण थे, गेहूं, धान, मूंग, माश और गन्ने के लहलहाते खेत अम्बरांत को स्पर्श करते प्रतीत होते थे। फलोद्यान तथा पुष्पवन नेत्रों को लुभाते थे और छायादार, फलदार वृक्ष राजमार्ग के दोनों ओर लगे हुए थे, पशु असंख्य थे, लोग प्रसन्नचित्त तथा सुशील कर्तव्य-परायण तथा आतिथ्य सत्कार करने वाले थे तथा रोग, महामारी अथवा अकाल मृत्यु से अनभिज्ञ थे। राजधानी स्थानीश्वर समाज के सभी वर्गों, मनीषियों, व्यापारियों, योद्धाओं, छात्रों, कलाकारों, वैज्ञानिकों, मत्स्य पालकों, पर्यटकों तथा गीतकारों का आश्रय-स्थल थी। भीड़-भरे बाजार सुसज्जित एम्पोरियम, भव्य देव स्थान, प्रासाद, कला-मन्दिर, शिल्पशास्त्रियों की कर्मशालाएं, विद्यालय तथा विश्वविद्यालय, सामाजिक उत्सव, धार्मिक सम्मेलन तथा संगीतगोष्ठियां इस नगर की प्रमुख विशेषताएं थीं। (हर्षचरित् सम्पादक जीवनन्द, पृ. 268-69)।

सातवीं शती में इस प्रदेश का भ्रमण करने वाले चीनी यात्री ह्यूनसांग ने इसका वर्णन इस प्रकार किया है:-

यह क्षेत्र 7 हजार ली (3 ली-1 मील) से अधिक की परिधि में था तथा स्पष्टतः उसी नाम की राजधानी (सा-ता-नी-स्फे-लो या स्थानीश्वर) 20 ली से अधिक परिधि में थी। इसकी भूमि उर्वर तथा उपजाऊ थी तथा यहां पर फसलें बहुत अधिक मात्रा में होती थी। यहां की जलवायु गर्म, लोगों का आचरण तथा रीति-रिवाज बहुत संकुचित थे। (इस शब्द से उसका आशय बौद्धइतर से है,) समृद्ध परिवारों में अपव्यय करने में होड़ लगी हुई थी। लोगों की मन्त्रयासेग कला में बहुत निष्ठा थी तथा वे विदेशी शिष्टाचार को उत्तम समझते थे, अधिक लोग व्यापार तथा कुछ लोग कृषि करते थे (यात्री का अनुभव केवल नगर तक ही सीमित था)। अन्य देशों की दुर्लभ वस्तुएं इस देश में संगृहीत थीं। राजधानी में 3 बौद्ध मठ थे, जिनमें 700 से अधिक हीनयान बौद्ध भिक्षु थे। 100 से अधिक देव मंदिर भी थे तथा बौद्ध धर्म से भिन्न धर्म मानने वालों की संख्या बहुत अधिक थी। राजधानी 200 ली तक ‘धार्मिक शांतिप्रद’ प्रदेश द्वारा घिरी हुई थी। (टामस वाटर्ज़, आन-यू चंग’ज ट्रैवल्ज इन इंडिया, पृ. 314)।

हाल ही में दौलतपुर में हुई खुदाई में प्राप्त स्थानीश्वर की मुद्रा से पता चलता है कि इस प्रदेश का अपना राजनीतिक महत्व था।

शांति तथा समृद्धि से लोगों का ध्यान मनोरंजन तथा हास-परिहास की ओर गया और परिणामस्वरूप हरियाणा के संगीतज्ञ, नगाड़े बजाने वाले तथा वीणावादक देशभर में प्रसिद्ध हुए तथा उजैन जैसे उन्नत शहरों में भी उनकी बहुत मांग थी। (चतुर्शाणी, सम्पादक वी.एस. अग्रवाल तथा मोतीकंदर पृ. 168)

साभार-बुद्ध प्रकाश, हरियाणा का इतिहास, हरियाणा साहित्य अकादमी पंचकूला, पृ. 19

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