महाभारत-युद्ध के दुष्परिणाम – बुद्ध प्रकाश

बुद्ध प्रकाश

महाभारत में वर्णित अनुसार कुरुओं के पतन से यह क्षेत्र बिल्कुल ही नष्ट-भ्रष्ट हो गया। उपनिषद् में कुरु के पतन का टिड्डीदल द्वारा उनकी फसलों के विनाश का वर्णन है (छान्दोग्योपनिषद् 1, 10, 1) और श्रौत सूत्र में  एक ब्राह्मण द्वारा दिए गए अभिशाप के कारण उनके कुरुक्षेत्र से निर्वासित हो जाने का उल्लेख है। गंगा की बाढ़ का पानी हस्तिनापुर में आ जाने से उनकी कठिनाई और भी बढ़ गई और उनका सम्राट निचक्षु अपनी राजधानी पूर्व में कौशम्बी ले जाने को विवश हो गया।

Kurukshetra mahabhar

कुरु वंश के पतन से सरस्वती घाटी में अन्य अनेक वंश आकर बस गये। उनमें से आभीर, जो आजकल अहीर कहलाते हैं, प्रमुख थे। जैसा मैंने अन्यंत्र उल्लेख किया है, आभीर सम्भवतः वही लोग थे, जिन्हें हिबू्र, कनानाइट और मिश्र की पुस्तकों में इभ्री अथवा अपिरु कहा गया है। वे भिन्न-भिन्न वंशों के सैनिक, आक्रमणकारी तथा विद्रोही थे। (पालिटिकल एंड सोशल मूवमैंटस इन एनशन्ट पंजाब, पृष्ठ 132)। संभवतः उनका एक वर्ग पूर्व की ओर चला गया और अबिराय नामक ग्राम्य कबीला बनाकर अज़ेरबैजन के समीप बस गया। बाद में उनमें से कुछ लोग हिरात-कंधार प्रदेश चले गए, जहां अबी वन नामक भू-भाग पर उनकी बस्ती के पुरावशेष पाये जाते हैं। वहां से वे सिन्ध पहुंचे तथा फिर पंजाब में से होते हुए सरस्वती प्रदेष में आ गये। एक किवदंती के अनुसार यह पवित्र नदी उनके कलुषित संस्पर्श से बचने के लिये सूख गई थी। कुरु वंश के विनाश के पश्चात् उनके इस प्रदेश में आतंक फैलाने की बात इस कथा से स्पष्ट हो जाती है कि जब अर्जुन यादवों के भ्रातृघातक सर्वनाश के बाद यादव महिलाओं को अपने संरक्षण में सौराष्ट्र से ले जा रहा था, तो उन्होंने मार्ग में उन महिलाओं का अपहरण कर लिया था। (ब्रह्म पुराण अध्याय 212, पृष्ठ 810 एवं उत्तरवर्त्ती पृष्ठ, महाभारत, XVI, 8, 17, 18)। उनकी असाधारण शक्ति, सामर्थ्य तथा एकता इसी बात से सिद्ध हो जाते हैं कि उन्होंने अजेय अर्जुन के शौर्य तथा रणनीति को भी मात दे दी। संभवतः इस घटना के बाद यादव तथा आभीर वर्णसंकर के कारण अहीरों ने स्वयं को यादव कहना आरंभ कर दिया, परन्तु प्राचीन तथा मध्य काल में इन दोनों में भेद रहा, जैसा कि तेरहवीं शती में दक्षिण के यादव नरेशों तथा आभीरों की शत्रुता से स्पष्ट हो जाता है। 1240 ई0 में यादव नरेश सिंहण के अम्ब शिलालेख में कहा गया है कि उसके सेनाध्यक्ष सोलेश्वर ने आभीर नरेशों के अवशेषों को नष्ट कर दिया था। (आर्केयोलौजिकल सर्वे आफ वैस्टर्न इंडियास खंड-3, पृष्ठ 90)। यह भी कहा गया है कि उसी सेनाध्यक्ष ने भक्मगिरि के आभीर नरेश लक्ष्मीदेव को परास्त किया था। (ऐपिग्राफिया इंडिका खंड XXV, पृष्ठ 203)। एक स्थान पर यादव नरेश कान्हदेव को ‘आभीरकुल रूपी बन के लिए दावानल’ कहा गया है (ऐपिग्राफिया कर्नाटिका, खंड VIII, भाग 18, पृष्ठ 39)। अतः यह स्पष्ट है कि यद्यपि आभीर स्वयं को यादव कहते थे तथापि उन्हें उनसे भिन्न समझा जाता था।

उसी समय हरियाणा में जाट नामक एक और जाति बस गई थी। ये लोग उन इटियोई लोगों के समान हैं, जोकि प्टोलेमी के अनुसार ताशकन्द के आसपास जक्सार्ट्स की घाटी के उत्तरी भाग में तखरोई के साथ निवास करते थे। उन्होंने पंजाब में आकर मद्रास की राजधानी शकल (सियालकोट) पर कब्जा कर लिया। महाभारत में उन्हें जर्त अथवा जर्तिक कहा गया है और उन के अशिष्ट स्वभाव की भर्त्सना की गई है। वे उत्तरी भारत के काफी भागों में फैल गये और हरियाणा के लोगों का अभिन्न अंग बन गए। उनके बाद अथवा उनके साथ-साथ एशिया के अन्य लोग भी इस प्रदेश में आकर बस गए। उनमें से ईरानी यौतिय, जिन्हें बाद में यौधेय कहा जाने लगा और जिनके वर्तमान वंशज दहिया और देह प्रसिद्ध जाट गोत्र हैं और अफगानिस्तान के कबीले रोहे, जिनके वर्तमान वंशज रोहिले भी जाट ही हैं तथा प्रार्जुन अथवा अर्जुनयन, जो आजकल जूट जाट गोत्र है, विशेषतः उल्लेखनीय है। विभिन्न वंशों तथा वर्णों के परस्पर सम्पर्क तथा मेलजोल ने हरियाणा के लोगों को ऐसी स्फूर्ति तथा जीवन शक्ति प्रदान की कि वे हृष्ट-पुष्ट कृषक, पशुपालक और शक्तिशाली योद्धा तथा विजेता बन गये। कृषि-विकास का आर्विभाव इसी युग में हुआ।

साभार-बुद्ध प्रकाश, हरियाणा का इतिहास, हरियाणा साहित्य अकादमी पंचकूला, पृ. 8

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