हरियाणा का इतिहास-प्रारम्भिक काल

बुद्ध प्रकाश

वर्तमान हरियाणा राज्य, देश का वह भाग है जहाँ भारतीय संस्कृति अद्भुत, पल्लवित, विकसित एवं समृद्ध हुई है। इतिहास के प्रारम्भ में यहीं पर उन विचारों, मूल्यों एवं आदर्शों की स्थापना हुई है, जो प्रत्येक युग में भारतीय समाज तथा संस्कृति को दिशा प्रदान करते हैं। प्रागैतिहासिक काल के बाद इतिहास के प्रारम्भ में सर्वप्रथम हमारा परिचय भरत वंश से होता है। इस वंश के लोग भारत में आकर बस गये तथा इन्हीं के नाम पर इस देश का नाम पड़ा। एक पौराणिक कथा के अनुसार भरतवंश का संबंध अनेक वीरगाथाओं के दुष्यंत और शकुन्तला के पुत्र भरत से है। कहा जाता है कि ऋग्वेद काल में सरस्वती (घग्गर) तथा दृषद्वती (चितंग) क्षेत्र में भरतवंश के लोग पावन यज्ञाग्नि प्रज्जवलित किया करते थे। अप्रिसूक्त में ‘सरस्वती’ को भारती अथवा भरतवंश का गौरव कहा गया है। यथासमय भरतवंश की तृत्सु जाति सर्वोच्च सत्ताधारी बन गई। इन्हीं के वंशज सुविख्यात विजेता दिवोदास तथा उसके पुत्र सुदास के पराक्रम का उल्लेख ऋग्वेद के अनेक सूक्तों में पाया जाता है। ऋग्वेद के दो सूक्तों (VI, 45, 1; IX, 61, 2) में यदुओं और तुर्वशों तथा दस्यु सरदार शमबरा से दिवोदास के युद्ध का उल्लेख पाया जाता है। एक अन्य उद्धरण में (VI, 61) सरस्वती के तट पर पर्वतों और वृक्षों से उसके युद्ध का वर्णन है। कहा जाता है कि उसने ऋजिश्वन्, आयु और कुत्स के साथ मित्रता करके चुमुरि, धुनि, शमबर, स्मदीभ, प्रिप्रु, शुष्ण, वेतासु, दशोणि और तुग्र आदि अनेक सरदारों को पराजित किया। उसके पुत्र सुदास को लोगों के दो षड्यंत्रों का सामना करना पड़ा, एक तो यमुना के तट पर भेद के नेतृत्व में अजों, शिग्रुओं और यक्षुओं को और दूसरे रावी के तट पर सिम्यु, पुरोदास, पुरुकत्स तथा कवश के मार्गदर्शन में यदु-तुर्वशों, भृगुओं, द्रुह्युओं, पकथों, भलानसों, अलिनों, शिवों, विषाणिनों, पुरुओं और अनुसों का। परन्तु सुदास अपने पूर्व-पश्चिम के इन दोनों षड्यंत्रकारियों को मुकाबला करने में उसी प्रकार सफल हुआ जैसे के हरकुलस ने अपने दोनों हाथों से दो सांपों को कुचल दिया था। दस षड्यंत्रकारियों (दशराजन युद्ध) से उसका युद्ध विशेषतः रोमांचकारी था। जलमार्गों द्वारा बाढ़ग्रस्त रावी की धारा की दिशा बदल कर, इसे पार करने योग्य बनाने के प्रयत्न से उनके सात किलों पर आक्रमण करने की चाल चली। इस प्रकार अप्रत्याशित रूप से आक्रमण करके उसने सेना को कुछ ही समय में छिन्न-भिन्न करके उनके नेता पुरुकुत्स को बन्दी बना लिया। इस विजय से वह सम्पूर्ण सप्तसिंधु प्रदेश का सर्वोच्च शासक बन गया।

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दिवोदास और सुदास के पराक्रमों के उल्लेख से प्रतीत होता है कि वे व्यापार, सूदखोरी और जमाखोरी द्वारा जनसामान्य का शोषण करने वाले पणिसों, नैचाशखों और किला वासियों के विरुद्ध लड़े। अतः उनका उत्थान तथा विस्तार एकाधिपत्य और मुनाफाखोरी के विरुद्ध लोकमान्य अभियान था। वे ऐसी नई सामाजिक व्यवस्था के प्रतिनिधि कहे जा सकते हैं, जिनमें जन-सामान्य, विशेषतया गांव, को विशेष महत्व दिया जाता था।

उल्लेखनीय है कि हड़प्पा और मोहनजोदड़ों के बड़े-बड़े शहर पश्चिमी पंजाब और सिन्ध में स्थित थे यद्यपि सौराष्ट्र के लोथल स्थान पर पतन-नगर का पता चला है और राजस्थान के कालीबंगान स्थान पर शहरी केन्द्र की खुदाई हो रही है। हरियाणा में भी इस सांस्कृतिक परम्परा के नगरावशेष हो सकते हैं। यदि पूर्ण रूप से विचार किया जाये, तो पूर्वी पंजाब और हरियाणा तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के स्थल अत्यंत नागरीय हड़प्पा सभ्यता की ह्रासोन्मुखी अवस्था को प्रदर्शित करते हैं। गत वर्ष कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग द्वारा पिपली के समीप दौलतपुर की आंशिक खुदाई करने पर ऐसा उपनिवेश प्रकाश में आया जहां के लोग अनाज की पैदावार करके उसका प्रयोग करते थे, मछली पकड़ते थे, तांबे के आभूषण बनाते थे और लाल सतह पर काले रंग के रेखिकीय डिजाइन वाले मिट्टी के बर्तन प्रयोग में लाते थेः अब तक के अध्ययन से पता चलता है कि हड़प्पा संस्कृति के नागरीय विकास की गति इस प्रदेश में बहुत धीमी रही। यद्दपि इसके निश्चित कारणों के विषय में कुछ कहना कठिन है तथापि अनुमान लगाया जा सकता है कि नागरीय सभ्यता में सन्निहित शोषण प्रवृत्ति के कारण लोगों में विरोध की भावना ने जन्म लिया। जैसा कि अन्यंत्र उल्लेख किया जा चुका है हड़प्पा-सभ्यता के ह्रास के पश्चात ही शहरी लोगों के निरन्तर बढ़ रहे शोषण को सह पाने में असमर्थ ग्रामीण लोगों में नवजीवन का संचार हुआ।  (ऋग्वेद और सिन्धुघाटी सभ्यता पृष्ठ 95-97)। हड़प्पा संस्कृति के नगरों और सुदास का प्रमुख कार्यस्थल पूर्वी पंजाब और हरियाणा में रावी तथा यमुना के मध्य होने से पता चलता है कि उन्होंने इस प्रदेश के लोगों को बड़े-बड़े नगरों के सुदृढ़ दुर्गों में सुरिक्षत नागरीय लोगों के अत्याचारों के विरुद्ध उत्तेजित किया। आशा है का और अनुसंधान करहे पर इस अनुमान करने पर इस अनुमान को सप्रमाण निश्चित किया जा सकेगा।

संम्भवतः द्वितीय सहस्राब्दी के आरम्भ में सुदास की महान विजय के पश्चात शक्ति हथियाने के लिये घोर संघर्ष आरम्भ हुआ। सुदास के उत्तराधिकारी अपने सहायकों और पुरोहितों, वाशिष्ठों से झगड़े पड़े और शक्ति नामक एक व्यक्ति को जला दिया। उसी समय सुदास के पराजित प्रतिद्वन्द्वी पुरुकुत्स के पुत्र और शक्ति नामक एक व्यक्ति को जिंदा जला दिया गया। उसी समय सुदास के पराजित प्रतिद्वन्द्वी पुरुकुत्स के पुत्र त्रासदस्यु ने पुनः शक्ति प्राप्त करके सरस्वती के तट पर तृत्शु राज्य पर आक्रमण कर दिया। आंतरिक तथा बाह्य दबाव के कारण सुदास के उत्तराधिकारियों का प्रभाव कम हो गया। त्रासदस्यु के अधीन पुरु सरस्वती प्रदेश के शासक थे। वह, उसका पुत्र हिरणिन और अन्य वंशज तृक्षि, त्रयरुण और कुरुश्रावण प्रख्यात नरेश थे। इस दौरान पुरु वहां रहने वाले भरतों के साथ घुल-मिल गये तथा उन दोनों की जाति भी एक हो गई। उन्हीं लोगों में वैदिक संस्कृति का चरम विकास हुआ, जिसके परिणामस्वरूप उनकी भाषा सर्वोत्तम तथा विशुद्ध और उनकी बलि देने की विधि आदर्श तथा उत्कृष्ट समझी जाती थी। (पंचर्विश ब्राह्मण XXV 10, शतपथ ब्राह्मण IV, 1, 5, ऐतरेय ब्राह्मण VII, 30)

कालांतर में पांचाल नामक लोगों के एक नये संगठन ने पौरक नरेश संवरण पर आक्रमण करके राज्य से निकाल दिया। वह और उसका परिवार सिंधु के तट पर शरण लेने पर विवश हो गया। (महाभारत 1, 80, 31-40)। वहां उसने वशिष्ठ को अपना पुरोहित बनाया और उनके मार्गदर्शन में अपना राज्य वापिस लेने का प्रयत्न आरंभ किया। प्रतीत होता है कि उसने उत्तर-पश्चिम में भारत-ईरानी प्रदेश में ख्याति प्राप्त कर रहे कुरुओं के साथ मैत्री करके उनकी सहायता से सरस्वती घाटी में अपना राज्य पुनः प्राप्त कर लिया। पुराणों के लेखकों ने इसे एक आख्यान का रूप देते हुए लिखा कि सवरण का सूर्य की पुत्री तापती से प्रेम हो गया। सवरण के पुरोहित वशिष्ठ ने तापती को सूर्य से लेकर संवरण से उसका विवाह कर दिया। उनसे कुरु का जन्म हुआ। उसी के नाम पर इस प्रदेश का नाम कुरुक्षेत्र पड़ा (वामन पुराण XXII, 26-61)। यह तो स्पष्ट ही है कि संवरण के विनाश के बाद कुरु वंश पुरु-भरत वंश का उत्तराधिकारी बना। इस कुरु वंश ने अपनी अर्थ-व्यवस्था को और अधिक सुदृढ़ करने के विचार से सरस्वती घाटी के विशाल भू-भाग को कृषि योग्य बनाने की महत्वपूर्ण योजना बनाई। पुराण प्रणेताओं ने इसे भी आख्यान का रूप देते हुए लिखा है कि कुरु ने सरस्वती के तट पर सामंतपंचक नामक पांच वर्ग योजन क्षेत्र को कृषि योग्य बनाने का निर्णय लिया और शिव के वृषभ और यम के भैंसे को स्वर्ण हल में जोत कर स्वयं हल चलाना आरंभ कर दिया। विष्णु द्वारा यह पूछे जाने पर कि यह क्या कर रहे हैं, उन्होंने उत्तर दिया कि वह सत्य, तप, क्षमा, दया, शौच, दान, योग और ब्रह्मचर्य आदि आठ सद्गुणों की साधना कर रहे हैं और इनके अंकुर उनके अपने शरीर में ही हैं। इस पर विष्णु ने वह बीज देने को कहा। उसने अपना दायां हाथ फैलाया। विष्णु ने इसके सहस्रों टुकड़े बनाकर लोगों में बांट दिए। तब उसने अपना बायां हाथ फैलाया और विष्णु ने उसी प्रकार इसे काट कर लोगों में बांट दिया। इसी प्रकार उसने उसके शरीर के अन्य भागों को काट दिया। इस बलिदान के परिणामस्वरूप यह प्रदेष हरा-भरा हो गया और यहां के लोग धन-धान्य से समृद्ध हो गए तथा ईश्वर स्वयं वहां निवास करने लगे और यह स्थल पवित्रतम स्थल ‘धर्मक्षे़त्र’ बन गया। यहां एक बार जाने से ही मोक्ष और परमानन्द प्राप्त होना निश्चित था। (वामन पुराण, XXIII, 23-33)। पौराणिक आख्यान के अलंकारों और प्रतीकों का वास्तविक अभिप्राय कुरुओं के माध्यम से हरियाणा का आर्थिक तथा नैतिक उन्नयन प्रदर्शित करना है। इससे पता चलता है कि उन्होंने सरस्वती तट के विस्तृत भू-भाग पर कृषि आरंभ करके इसे प्रदेश की अर्थ-व्यवस्था का केंद्र-बिंन्दु बनाया और यहां के लोगों के लिए उच्च नैतिक सिद्धांतों पर आधारित आचरण संहिता बनाई, जो आने वाले समय में उनके सांस्कृतिक-विकास का आधार बनी। श्रम तथा सदाचार, शारीरिक आध्यात्मिक उन्नति का समन्वय इस प्रदेश और इसके द्वारा समस्त देश की संस्कृति का सारतत्व है। लौकिक तथा पारलौकिक मूल्यों का सामंजस्य ही भगवद गीता में प्रस्तुत किया गया है, जिसका वर्णन हम बाद में करेंगें।

Kuru and other Mahajanapadas in the Post Vedic period.

बंजर धरती में हल चलाने वाले कुरु के हाथ सहस्रों लोगों के हाथ बन गये और उसके विचारों तथा सद्गुणों ने अनेक लोगों का मार्गदर्शन करते हुए उन्हें अनुप्राणित किया। उसके शरीर तथा मन का भाग तथा साकार रूप होने के कारण उसके समकालीनों तथा दायाधिकारियों ने लोहे के प्रयोग के कारण अत्यधिक सुसाध्य हो गई कृषि को लोकप्रिय बनाया। इसके परिणामस्वरूप समस्त भू-भाग पर धन-धान्य से सम्पन्न गांवों तथा उपनिवेशों का विकास हुआ। मैंने अन्यत्र संकेत किया है कि कुरुक्षेत्र नाम से प्रसिद्ध हरियाणा तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में संकेंद्रित चित्रांकित धूसर भांड संस्कृति कुरुओं से सम्बद्ध है। (ऋग्वेद तथा सिंधु घाटी की सभ्यताएं पृष्ठ 120)। यदि यह धारणा युक्तियुक्त हो तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि कुरु वंश के लोग प्रायः कच्चे तथा मिट्टी के पलस्तर से बने ठाठ वाले घरों में रहते थे, कृषि करते थे, पशु पालते थे और शिकार करते थे, भट्टी में अपचायक स्थिति में पकाये जाने के कारण धूसरवर्ण, हाथ से बने तथा चक्के पर बने बर्तनों, किंचित् उत्तल कटोरों, कम गहरी, नत तल तथा अथवा चपटे तल वाली तश्तरियों और लोटे जैसे बर्तनों का प्रयोग करते थे तथा तांबे और लोहे के औजार बनाते थे। घोड़ों को पालतू बनाने और लोहे के प्रयोग से उनके व्यापार का विस्तार हुआ और वे समृद्ध होकर उत्तरी भारत के सर्वोच्च सत्ताधरी बन गए। इस प्रकार कुरुओं के अधीन सरस्वती तथा गंगा घाटी के चारों ओर का विस्तृत भू-भाग, जो एक प्रकार से विशाल हरियाणा ही है, कृषि, उद्योग, ग्रामीण विकास तथा राजनीतिक सत्ता का केंद्र बन गया।

साभार-बुद्ध प्रकाश, हरियाणा का इतिहास, हरियाणा साहित्य अकादमी पंचकूला, पृ. 1

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