प्रेमचंद की प्रासंगिकता

 

आज के समय में प्रेमचंद के साथ हमारा क्या रिश्ता बनता है। प्रेमचंद और हमारे साहित्यकार किस तरह से आने वाली पीढिय़ों को रस्ता दिखाते हैं, यह बहुत महत्वपूर्ण बात है। प्रेमचंद 1936 में इस दुनिया में नहीं रहे, लेकिन वे समय बीतने के साथ-साथ और अधिक प्रासंगिक होते जा रहे हैं। वे 1880 में पैदा हुए और 1907-08 में उन्होंने लिखना शुरू किया। यह वह समय है, जब ज्योतिबा फुले, विवेकानंद और स्वामी दयानंद की अगुवाई में 19वीं सदी का पुनर्जागरण आंदोलन था। प्रेमचंद ने पुनर्जागरण की पूरी परंपरा और चेतना को धारण किया। प्रेमचंद चरित्रों के माध्यम से दिखाते हैं कि मेहनतकश साधारण आदमी में मानवता के मूल्य ज्यादा हैं। प्रेमचंद का साहित्य हमें शहीदों, क्रांतिकारियों, स्वतंत्रता सेनानियों की सोच व सपनों को याद करवाता है। प्रेमचंद का साहित्य गवाह है राष्ट्रवाद की तमाम धाराओं का। चाहे वह अंबेडकर का राष्ट्रवाद है, चाहे भगत सिंह का, चाहे गांधी का या आरएसएस के गोलवलकर या हिंदू महासभा के वीर सावरकर का राष्ट्रवाद है। प्रेमचंद अपने समय के सबसे विश्वसनीय आदमी हैं। प्रेमचंद के साहित्य को देखेंगें तो राष्ट्रवाद की समस्त धाराओं के योगदान की सच्चाई हमारे सामने मिलेगी। साम्प्रदायिकता की पूरी प्रक्रिया, रणनीति और मंतव्य प्रेमचंद हमारे समाने लेकर आते हैं। आज के दिन राष्ट्रवाद के नाम पर हमारे देश में अपने ही नागरिकों को मारा जा रहा है। 1947 में विभाजन हुआ देश दो टुकड़ों में बंट गया। लेकिन अब हर शहर का विभाजन हो रहा है। हर मोहल्ले में सरहदें बनाई जा रही हैं। सीधा सा सवाल है कि यदि अपने देश को जात-धर्म के नाम पर बांटते और तोड़ते हैं तो क्या हम अपने देश को मजबूत कर रहे हैं। राजनीति उच्च वर्ग और शिक्षित मध्यवर्ग के दायरे से निकल जब साधारण जनता तक पहुंची किसान, मजदूर व महिलाएं सभी आजादी की लड़ाई में शामिल हुए तो उनके सवाल भी आने लगे। यह सवाल भी आया कि क्या आजादी मिलने पर जागीरदारी व्यवस्था समाप्त होगी। क्या जमीन जोतने वालों को मिलेगी। एक किसान के लिए आजादी का क्या मतलब है। एक किसान के लिए आजादी का क्या मतलब है जब कि जिस भूमि पर वह खेती करता है, उसकी नहीं है और वह बंधुआ की तरह काम कर रहा है। एक दलित के लिए आजादी का क्या मतलब है कि जब वह उस कूएं से पानी नहीं पी सकता, जिससे सारा गांव पानी पीता है। उस मंदिर में वह नहीं जा सकता, जिसमें सभी जाते हैं। उन सार्वजनिक स्थानों पर वह नहीं जा सकता, जहां सारे जाते हैं। प्रेमचंद को समझ आ गया था कि विकास का जो मॉडल अपनाया जा रहा है, उसमें गोदान के छोटी जोत के किसान होरी को जमीन गिरवी रखनी पड़ेगी, वह अपनी जमीन पर बंटाईदार बनने पर विवश हो जाएगा। फिर वह उससे बेदखल होकर मजदूर में तब्दील हो जाएगा। यह प्रक्रिया कि छोटा किसान इन आर्थिक नीतियों में मजदूर बन जाएगा, चाहे वह होरी है या पूस की रात का हल्कू है। प्रेमचंद को पढ़ना ऐसी अन्तर्दृष्टि को प्राप्त करना है, जिससे हम अपने समय की शक्तियों के संघर्ष व अन्तर्विरोध देख सकते हैं। राजनेता किस तरह काउंसिल में बैठ कर किस तरह की बातें करते हैं और हम उनसे क्या उम्मीद लगा रहे हैं। यह चेतना की बात है कि हमने राष्ट्रनिर्माता व भाग्य निर्माता सहित सभी जिम्मे उनके हाथ छोड़ रखे हैं और अपने आप व्हाट्सअप मैसेज की फारवर्डिंग एजेंसी बने हुए हैं। उसे छोडऩे की जरूरत है। स्वयं सोचने की जरूरत है। प्रेमचंद हमें इसी दिशा में ले जाते हैं कि सारे माहौल के बारे में सोचो।  किसान की आत्महत्याओं को पिछले दस-पंद्रह साल से इतना बड़ा आंकड़ा बनता जा रहा है। क्या कोई ऐसा साहित्यकार, बुद्धिजीवी या राजनेता किसानों को यह संदेश भी नहीं दे पाया कि कम से कम आत्महत्या मत करो। साहित्यकार का क्या दायित्व है। प्रेमचंद ने इसके बारे में जगह-जगह लिखा है। प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अधिवेशन का अध्यक्षीय भाषण तो बहुत ही यादगार है। हमें साहित्य की कसौटी बदलनी होगी। हमें वह साहित्य चाहिए जो बेचैन करे, सुलाए नहीं। और सोना तो मृत्यु का लक्षण है। साहित्य तो जीवन की आलोचना होती है। स्वतंत्रता आंदोलन में विकसित हुए आदर्श हमारे संविधान का हिस्सा हैं। कैसा राज्य होगा। शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की जिम्मेदारी किसकी होगी। अब वे सब वापिस हो रही हैं। प्रेमचंद का साहित्य याद करवाता है कि अब दूसरे स्वतंत्रता आंदोलन की जरूरत है।

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