सूखा

डॉ. निधि अग्रवाल

( गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश)  में जन्म। बचपन से पढने और लिखने का शौक। एम बी बी एस के बाद पैथोलॉजी में परास्नातक की शिक्षा। वर्तमान में झांसी (उत्तर ) में निजी रूप से कार्यरत। कविताएँ, कहनियाँ और सामाजिक विषयों पर ब्लॉग आदि का लेखन)

सूखा

सूख गए सब नदियाँ-पोखर
नैना बरसे बन परनाले
इस बरस भी न बरसे बदरा
गगन में भी लग गए  जाले!

मौड़ा-मौड़ी शांत भए सब
उलहाने न देती डुकरिया
पात नहीं अब हिलता कोई
डांग दिखात सूकी लकरिया!

काज नहीं कोई खेतों में
होत भुंसारे बटाठाई
गोड़न ताईं  को देखे अब
सीने में भी पड़ी बिवाई!

घर-आंगन वीरान पड़े सब
ताला लटका है हर  कुंडी
सड़कों से जोड़े सब नाता
तज दई गाँव की पगडंडी!

निष्ठुर आज बना है कितना
अजब खेल रच रहा विधाता
चौमासे में सूका पारें
भूखा अन्नदाता अभागा!

काहे आत्महत्या कहे जग
गले डला फांसी का फंदा
कंधा दे जमीन हड़प लई
मुआवजे का गोरखधंधा!

नेता और विधाता दोई
करबें गरीब का ही भक्षण
का सौनो खाबे की इच्छा?
खेतों का कर लो संरक्षण!
(पोखर: तालाब, मौड़ा : बच्चा, मौड़ी: बच्ची,  डुकरिया: बूढ़ी,डांगजंगल, सूकी: सूखी,  करिया: लकड़ी, भुंसारे: सवेरे,  कओ: करना,  बटाठाई:बिना काम के,   वारगी गोड़न: पैर,   ताईं: तरफ,  को: कौन, चौमासे: बारिश का मौसम,  पारें : डाले, दई: देना,  लई: लेना,  दोई: दोनों, करबे: करना , सौनो:सोना, खाबे: खाना)

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