सबसे ख़तरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना – महावीर शर्मा

महावीर शर्मा

 रिटायर्ड कर्मचारी संघ हरियाणा का गठन 6 साल पहले 2012 में किया गया था। वर्तमान में इस संगठन की सदस्यता 20,000 के लगभग है। हरियाणा के सभी जिलों और 85 ब्लॉक्स में इस संघ की नियमित इकाइयां काम कर रही हैं। ये संगठन न केवल अपनी पेंशन बचाने और बेहतर सुविधा पाने के लिए संघर्ष कर रहा है बल्कि शिक्षा और स्वास्थ्य के प्रश्नों को भी जनपक्षीय ढंग से उठा कर जनता को जागरूक कर रहा है। आम आदमी से जुड़े मुद्दे सक्रियता से उठाकर लोगों के बीच ले जाने का ये काम अत्यंत सराहनीय है। रोडवेज निजीकरण के ख़िलाफ़ आंदोलन में दिया गया सक्रिय समर्थन, तथा उत्तराखंड व केरल में आई भयंकर बाढ़ के समय सहायता सामाजिक योगदान का जीवन्त प्रमाण है। प्रस्तुत है रिटायर्ड कर्मचारी संघ हरियाणा के तीसरे त्रिवार्षिक सम्मेलन के अवसर पर(2-12-2018) रोहतक मे शिक्षाविद् व पूर्व प्राचार्य महावीर शर्मा का वक्तव्य ।

रिटायर्ड कर्मचारी संघ हरियाणा के तीसरे त्रिवार्षिक सम्मेलन में आपका स्वागत करते हुए मुझे बहुत खुशी हो रही है। मैं आपका तहेदिल से अभिनन्दन करता हूँ। आप सब को आदाब ,नमस्कार, सतश्री अकाल, राम राम, एवं लाल सलाम ।
साथियों, आप अपनी नोकरी से रिटायर हुए हैं लेकिन समाज सेवा के जज़्बे से नहीं। समाज में बदलाव लाने की इच्छा इस उम्र में भी आपके हृदय में धड़क रही है। रिटायर हो कर भी रिटायर न होना, स्वयं को समाज से जोड़े ही नहीं रखना, नौकरी के दौरान देश-समाज से जो कुछ मिला, उस ऋण को चुकाने के लिए अलग-अलग तरह से प्रयासरत रहना, यह सकारात्मक सोच का द्योतक है। इस से भी बढ़ कर, आप समाज में परिवर्तनकारी प्रगतिशील ताक़तों के हिमायती हैं। आप में वो तड़प है जो बदलाव के सपने देखती है और उसके लिए संघर्ष करती है। सामाजिक कार्यों में आप की व्यापक दिलचस्पी और आप की यह तड़प आप को सिर्फ़ अपने, यानी सेवानिवृत्त कर्मचारियों के हितों के लिए ही नहीं, सम्पूर्ण समाज  के बारे में सोचने और कुछ करने के लिए उत्साह देती है। इसी लिए मैं भी हौसला कर रहा हूँ कि आप से समाज और देश के व्यापक फ़लक को ध्यान में रखते हुए कुछ बात करूँ जो आज के हालात का बयान ही न हो, बल्कि अपने प्रेरणास्रोतों को याद करते हुए उन हालात का सामना करने के बारे में भी हो।
पंजाबी के मशहूर जनकवि मरहूम पाश के अनुसार
“सबसे ख़तरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना
न होना तड़प का
सब सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौट कर घर आना
सबसे ख़तरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना”
आप जिंदा-मुर्दा नहीं हैं और न ही आपके सपनों ने आत्महत्या की है। आप की धमनियों में लाल लहू के साथ-साथ क्रांतिकारी चेतना का प्रवाह भी है। इसी लिए पाश के साथ हमें भगत सिंह भी याद आते हैं, जिन के मुताबिक़ ” क्रांति की तलवार विचारों की सान पर तेज़ होती है।” और क्रांति का अर्थ “प्रगति के लिए परिवर्तन की भावना एवं आकांक्षा है।” साधारणत: आम लोग जीवन के रोज़मर्रा के परम्परागत ढर्रे से चिपके रहते हैं और किसी तरह के परिवर्तन के विचार मात्र से ही घबरा जाते हैं। वे ज़िन्दगी को जैसे तैसे जीते हुए यथास्थिति की जंजीरों में जकड़े रहते हैं। यह गतिरोध की स्थिति लोगों को अपने शिकंजे में कस लेती है और वे किसी भी तरह की तब्दीली के विचार मात्र से ही कांपने लगते हैं। रूढ़िवादी शक्तियां इसी डर और निष्क्रियता का लाभ उठा कर मानव समाज को ग़लत रास्ते पर ले जाती हैं। यही है वह ‘जड़ता और निष्क्रियता’ जिसे तोड़ने के लिए क्रांतिकारी भावना जागृत करने की जरूरत होती है। क्रांति की इस भावना से मानव जाति की आत्मा सदैव ओतप्रोत रहनी चाहिए। जब हम हमारी बदहाल जिंदगी के लिए किस्मत या भगवान को दोष न दे कर सामाजिक परिस्थितियों में उनका कारण ढूंढने लगते हैं और उन शक्तियों का विरोध करने लगते हैं जिनका निहित स्वार्थ उन परिस्थितियों को बनाये रखने में है, तो हमारी चेतना में बदलाव आने लगता है। जब हमारे दिल और दिमाग़ में बदलाव की आकांक्षा मज़बूत पकड़ बनाती है और हम बदलाव की भावना से ओतप्रोत होकर पूरे होशोहवास में परिवर्तन के लिए यथास्थिति बनाये रखने वाली ताक़तों से टक्कर लेते हैं तब इंक़लाब की भावना का सूत्रपात होता है। अपने क्रांतिकारी वीरों और स्वतंत्रता आंदोलन से प्रेरणा लेते हुए हमें आज की कठिनतम स्थितियों को समझते हुए आगे बढ़ना है। परिस्थितियां विषम, भयंकर, और निहायत ख़राब अवश्य हैं लेकिन अजेय नहीं।
हमारा समाज सदियों से ग़ैर-बराबरी का शिकार रहा है। जाति-धर्म-अमीरी-ग़रीबी-क्षेत्र-इलाक़ा के भेद हमें आगे बढ़ने से रोकते रहे हैं जब कि यही विविधता हमारी ताक़त भी है। आज आज़ाद भारत में रहते हुए भी ये भेद हमारे सब से बड़े दुश्मन हैं। धर्म और जाति के नाम पर होने वाली वोटों की राजनीति से टक्कर लेने की चुनौती आज की सब से बड़ी चुनौती है। इस के लिए हमारा सब से बड़ा सम्बल हमारा संविधान है जो हर नागरिक को बराबर मानता है, उसे बराबर अधिकार देता है। इस पुस्तक को हम अपनी सोच के केन्द्र में रख कर बात करें तो कुछ बात बनेगी। हमारी गंगा-जमुनी संस्कृति को मिलने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए इस से बढ़ कर कोई हथियार नहीं है। इसे ही हम सही ढंग से लागू करने-करवाने के प्रयास कर लें तो समझें मानवता के पाठ का एक बहुत बड़ा हिस्सा हम ने आत्मसात्‌ कर लिया। संविधान की प्रस्तावना मात्र को एक बार फिर याद कर लेना ही इस बात को समझने के लिए काफ़ी है।

संविधान की प्रस्तावना में लिखा है कि

हम, भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्वसंपन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने का  संकल्प करते हुए तथा उसके समस्त नागरिकों को:

सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय,

विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म

और उपासना की स्वतंत्रता,

प्रतिष्ठा और अवसर की समता

प्राप्त कराने के लिए,

तथा उन सबमें

व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता

और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता

बढ़ाने के लिए

दृढ़ संकल्प होकर अपनी संविधानसभा में आज तारीख 26 नवम्बर 1949 ईस्वी (मिति माघशीर्ष शुक्ल सप्तमी, संवत दो हजार छह विक्रमी) को एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।

मगर आज का दौर वह दौर आ बना है जब इसी संविधान के मूल्य ख़तरे में हैं। क्योंकि हमारी मिली-जुली, सर्वधर्म समभाव पर आधारित संस्कृति को आज उन तत्वों से सीधी चुनौती मिल रही है जो बहुरंगी नहीं बल्कि एकरस, एकरंग संस्कृति के पैरोकार हैं। ये वे ताक़तें हैं जो जाति, धर्म, समुदाय के नाम पर लोगों को बांटने में रत्ती भर भी हिचकिचाहट महसूस नहीं करतीं। इन के लिए यह समझना बहुत ही मुश्किल है कि इस मुल्क की विविधता ही इस की शान है। और यह समझना भी, कि धर्म और धार्मिक विश्वास मंदिर-मस्जिद-गिरजाघर-गुरुद्वारा में नहीं, इंसान के दिलों में वास करते हैं, क्योंकि इन्सान का रब्ब-ईश्वर-गॉड-राम तो उस के दिल समेत हर जगह है। कबीर साहेब कहते हैं
सकल हंस में राम बिराजे
राम बिना कोई धाम नहीं
ये है सच्ची आस्था। सभी हृदयों में राम का निवास है। राम बिना कोई स्थान नहीं। इस विश्वास में अगाध प्रेम है, निर्मल भक्ति भाव है और भगवान राम का सारे ब्रह्मांड में दीदार है। ईश्वर में सच्चा विश्वास रखने वाला कौन इस बात से सहमत न होगा। एक सच्चे-खरे धार्मिक व्यक्ति के लिए तो इन्सान का हृदय ही धर्म-स्थल है, न कि कोई मंदिर-मस्जिद-गिरजा-गुरुद्वारा। और अगर ऐसा है तो धर्म के झगड़े और ये झगड़े करवाने वालों की अहमियत ही क्या रह जाती है? और अगर हम एक ही देश के वासी हैं, तो किस का धर्म ऊँचा है और किस का नीचा?
यही बात जाति पर भी लागू होती है। अगर एक ही रब्ब ने सब को जन्म दिया है तो कौन ऊँचा है और कौन नीचा। गुरू ग्रंथ साहिब की वाणी के मुताबिक़
अव्वल अल्ला नूर उपाया
कुदरत के सब बन्दे
एक नूर ते सब जग उपज्या
कौन भले कौन मंदे
जाति-धर्म के नाम पर हमें तोड़ने वालों के बरअक्स हमें इस संविधान की रक्षा करनी है क्योंकि यह संविधान हमारी स्वतंत्रता के लिए राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान निर्मित सांझे संघर्ष और चेतना का परिणाम है। हमारा नारा है “संविधान के सम्मान में – हिंदुस्तान है मैदान में।”
इसी कठिन दौर की बात पूर्व राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी ने भी की है। उन्होंने भी इस बात पर चिंता व्यक्त की है कि वह भूमि जिसने सारी दुनिया को “वसुधैव कुटुम्बकम” का संदेश दिया और भ्रातृत्व तथा सहिष्णुता की लोकनीति का पाठ पढ़ाया, वही देश बढ़ती असहिष्णुता, अत्यधिक गुस्से के प्रदर्शन एवं मानवीय संवेदना के पतन और नागरिक अधिकारों के शर्मनाक हनन के लिए समाचारों में है।
बाबासाहेब अम्बेडकर ने कहा था कि हम राजनैतिक तौर पर तो आज़ाद हो गए हैं मगर यह आर्थिक आज़ादी के बिना यह आज़ादी अधूरी है। कितनी सही थी उन की बात। आज समाज में चहुतरफ़ा संकट है। किसानी घाटे का सौदा बन गयी है और किसान कर्ज़ के मारे आत्महत्याएं कर रहे हैं। नवयुवकों के लिये रोज़गार उपलब्ध नहीं हैं। Jobless growth मुंह बाए खड़ी है। अर्थात जो भी आर्थिक वृद्धि हो रही है वह रोज़गारोन्मुखी नहीं है। शिक्षा के निजीकरण एवम महंगी होने के कारण साधारण घरों के विद्यार्थियों के लिये अच्छी शिक्षा के स्रोत निरन्तर सूखते जा रहे हैं। आम आदमी के लिए बीमार पड़ने पर चिकित्सा की समुचित व्यवस्था नहीं है। महिलाएँ हर समय बिल्कुल असुरक्षित महसूस करती हैं। समाज के कमज़ोर तबके दमन के शिकार हो रहे हैं। और ऐसा लगता है कि सरकार हालात बदलने की बजाय नाम बदलने के काम में व्यस्त है।
आज का वक़्त शायद हमारे देश की आज़ादी के बाद का सब से कठिन वक़्त है क्योंकि पुरानी चुनौतियों ने नया रूप ले लिया है और साथ ही नई चुनौतियाँ भी हमारे सामने हैं। और इन चुनौतियों का सामना हम ने आज नहीं किया तो अन्धकार घटेगा नहीं, बढ़ेगा ही। उम्र के जिस पड़ाव में हम हैं, उस में हमारा तजुर्बा एक बड़ी पूँजी की तरह हमारे साथ है। इस तजुर्बे से जो कुछ भी सीखा है, उसे इस्तेमाल करते हुए काम करना होगा सब को – ग़लतियों को सुधारते हुए, और अपनी ताक़त को बढ़ाते हुए। अपनी इस पूँजी में हमारे ख़्वाब भी शामिल हैं। पुराने ख़्वाब जो अभी पूरे नहीं हुए, और नए भी जो हमें लेने चाहिएँ। आज जिस संकट के दौर से हम गुज़र रहे हैं, उसे देख कर ऐसा लगता है कि जो बात साहिर लुधियानवी ने दशकों पहले कही थी, वो आज भी सच है:
आओ कि कोई ख़्वाब बुनें कल के वास्ते
वरना ये रात आज के संगीन दौर की
डस लेगी जान-ओ-दिल को कुछ ऐसे कि जान-ओ-दिल
ता-उम्र फिर न कोई हसीं ख़्वाब बुन सकें
मगर बात अकेले ख़्वाब बुनने से नहीं बनेगी।
ऐसे में हम क्या करें? अपने ख़्वाबों से रौशनी ले कर  हमें सही सवाल उठाना जारी रखना चाहिए। जब तक समस्याएँ हैं तब तक सवाल भी हैं। इसलिए सवाल उठाने का वक़्त न कभी गया था न कभी जाएगा। लोकतंत्र में सही सवाल गूंजते ही रहने चाहियें। जब तक सड़कें बोलती रहेंगी, जब तक गलियों में सही सवाल गूंजते रहेंगे, तब तक संसद भी ठीक काम करेगी अन्यथा संसद और विधान सभा भी आवारा हो जाएंगी। बोलते रहिये, सही सवाल उठाना जारी रखिये, संघर्ष का परचम लहराते रहिए।

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