हरियाणा में अनुसूचित जाति आयोग

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सुरेंद्र पाल सिंह

 हरियाणा में जाति आधारित शोषण-उत्पीड़न अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय रहा। सामाजिक स्तर पर बहुत जघन्य कांड  हरियाणा के समाज ने देखे। शासकीय मशीनरी में भी भेदभाव के आरोप लगते रहे हैं। निदान के लिए मानवाधिकार आयोग और अनुसूचित जाति आयोग के गठन की जरूरत महसूस की गई और लोगों ने इस तरह की व्यवस्था बनाने के लिए ऊर्जा लगाई थी। सरकार ने अनुसूचित जाति आयोग गठित करने की घोषणा की है। सुरेंद्रपाल सिंह को व्यक्तिगत मामले में अनुसूचित जाति आयोग की कार्यप्रणाली का खासा अनुभव हुआ। प्रस्तुत है सामाजिक कार्यकर्ता सुरेंद्रपाल सिंह का आलेख। 

हरियाणा सरकार ने 16 दिसंबर को घोषणा की है कि वह राज्य में अनुसूचित जाति आयोग की स्थापना करने जा रही है। इस संबंध में हरियाणा स्टेट कमीशन फ़ॉर शेडुल्ड कास्ट्स ऐक्ट 2018 की अधिसूचना राज्य के क़ानून विधान विभाग द्वारा जारी की जा चुकी है।

नवम्बर 2012 में तत्कालीन मुख्यमंत्री भुपेंद्र सिंह हुडा ने राज्य अनुसूचित जाति आयोग के गठन का ऐलान किया था और 21 फ़रवरी 2013 को राज्य सरकार के मंत्रिमंडल ने इस आशय का फ़ैसला ले लिया था। ये वो दौर था जब दलित उत्पीड़न, सामूहिक दुष्कर्म और ऑनर किलिंग की घटनाओं का सिलसिला तेज़ी पर था। अब आयोग के गठन की बात 2019 तक पहुँच गई है।

राज्य में हरसोला, दुलीना, गोहाना, मिर्चपुर, भगाना जैसी घटनाओं के साथ साथ बेशुमार घटनाएं दलित महिलाओं के साथ सामूहिक दुष्कर्म की, हत्याओं की, और ऑनर किलिंग की घटती रही हैं। हरियाणा में दलितों उत्पीड़न की घटनाओं को लेकर अनुसूचित जाति आयोग के पिछले चेयरमैन ने एक बार टिप्पणी की थी कि ऐसा लगता है हरियाणा राज्य दलित उत्पीड़न की प्रयोगशाला बनता जा रहा है। सामाजिक रूप से कमज़ोर तबकों पर अत्याचार हमारे देश में कोई नई कहानी नहीं है। छुआछूत और ऊंच नीच के चोखटे में बँटे समाज में जब भी श्रेष्ठताबोध की कुंठा को गाहे बगाहे अभिव्यक्ति का अवसर मिलता है वह उससे चूकने का मौक़ा नहीं छोड़ती।

2 अप्रैल 2018 को उच्चतम न्यायालय द्वारा अनुसूचित जाति /जनजाति अत्याचार प्रतिरोधक क़ानून को हल्का करने के विरोधस्वरूप देशभर में एक अभूतपूर्व रोष दिखाई दिया था। जिसने सत्तासीन निज़ाम की नींद हराम कर दी थी और कुछ समय बाद ही दोनों सदनों ने निर्विरोध रूप से उस क़ानून को मूलरूप में पुनर्स्थापित कर दिया।अभी 11 दिसंबर को पाँच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे आए हैं जिनमें केंद्र की सत्तासीन पार्टी द्वारा शासित तीन राज्यों से हाथ धोना पड़ा। राज्य और केंद्र में सत्तासीन निज़ाम की विचारधारा हिंदू गौरव और हिंदू एकता पर आधारित है लेकिन हिंदू समाज की संरचना के विरोधाभास को छूने को ये मॉडल इंकार करता है।

अनुभव यही बताता है कि दलित-उत्पीड़न की कोई घटना होती है तो ये आँख-कान-मुँह बंद कर अप्रत्यक्ष तौर पर ये उत्पीड़क के साथ ही खड़े हो जाते हैं। एक उदाहरण देना ही काफी होगा। हिसार के नज़दीक भगाणा गाँव में जब दबंगों द्वारा दलितों का सामाजिक बहिष्कार किया गया तो उत्पीड़न के शिकार अनेक परिवार गाँव छोड़ने पर मजबूर हुए। लम्बे अरसे तक न्याय ना मिलने की प्रतिक्रियास्वरूप उनमें से कुछेक ने इस्लाम धर्म अपना लिया। जब वे वापस गाँव लौटने का प्रयास कर रहे थे तो विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल ने उनका गांव में घुसने का विरोध किया। लेकिन सामाजिक बहिष्कार के समय उनकी चुप्पी का रहस्य क्या था इसका कोई जवाब उनके पास नहीं था।

2019 के लोकसभा चुनाव चुनाव सिर पर है। तीन राज्यों का झटका ताज़ा ताज़ा है अनेक राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। ऐसे में ऐन केन प्रकारेण हिंदू वोटों को एकजुट करने की चुनौती बहुत बड़ी है। हिंदूवाद की मलाई खाने वालों के वोटों की संख्या से तो काम नहीं चलने वाला है . इसी दिशा में उठाया गया क़दम है राज्य अनुसूचित जाति आयोग का गठन।

सन 1978 में पहली बार अनुसूचित जाति/ जन जाति आयोग का गठन केंद्र में हुआ था। सन 1992 में अनुसूचित जन जाति आयोग के अलग से गठन होने से अनुसूचित जाति आयोग एक अलग इकाई हो गया। ये एक संवैधानिक संस्था है जो मुख्यत: अनुसूचित जाति की सुरक्षा, भलाई, विकास, और प्रगति लिए कार्य करता है। आयोग को किसी भी व्यक्ति को समन (summon) करने, शपथ लेकर भी बयान लेने, किसी भी दस्तावेज़ को प्रस्तुत करवाने और एफिडेविट के माध्यम से सबूत प्राप्त करने का अधिकार सिविल कोर्ट की तरह से है। यह पढ़ते हुए यूँ लगता होगा कि हमारे समाज में अनुसूचित जाति के सदस्यों की सुरक्षा और प्रगति के लिए कितनी चाक चौबंद व्यवस्था है लेकिन ज़मीनी सचाई और अनुभवों को जाने बिना ये समझ अधूरी रह जाएगी।

भेदभाव का कोई भी मज़बूत केस लेकर जाने वाला याचिकाकर्ता आयोग में जाकर एक नए प्रकार के उत्पीड़न का शिकार बनता है। आयोग के सदस्यों की किसी भी केस को निपटाने की कोई समय सीमा और जवाबदेही नहीं है। प्रतिपक्ष को इस दौरान छूट है कि याचिकाकर्ता की जीविका के साथ बदले की भावना से कुछ भी करे। हाँ, अगर याचिकाकर्ता का केस थोड़ा सा भी कमज़ोर है तो याचिका का रिजेक्शन तुरंत पहली या दूसरी पेशी में हो जाता है और अगर केस मज़बूत है तो याचिकाकर्ता को लम्बे समय तक पेशियां भुगतते हुए मानसिक यंत्रणा का शिकार होना पड़ता है। इसी दौरान प्रतिपक्ष अपनी कारगुजारी कर चुका होता है।

यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि दिसंबर 2008 की याचिका का निपटान अक्टूबर 2013 में मेरे पक्ष में किया गया और तब तक अपमान और ब्लैकलिस्टिंग की वजह से मुझे अपनी गरिमा को बचाते हुए नौकरी छोड़ देनी पड़ी थी। इस प्रक्रिया में प्रतिपक्ष अगर क़द्दावर है तो उसके लम्बे लम्बे हाथ अदृश्य रूप से अपना काम करते रहते हैं। मेरी याचिका के मामले में भारतीय स्टेट बैंक की तत्कालीन डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर सुश्री अरुधन्ति भट्टाचार्य ने जो बाद में बैंक की चेयरपर्सन भी थी, ने लिखित रूप में ग़लत बयान दिए थे लेकिन मेरे द्वारा उनके ख़िलाफ़ दायर पर्जरि की दरख्वास्त पर कोई कार्रवाई नहीं की गई।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अनुसूचित जाति आयोग कोई फ़ैसला नहीं दे सकता बल्कि निष्कर्ष और सुझाव ही दे सकता है जो अदालत में मान्य नहीं है और न ही प्रतिपक्ष उसको लागू करने को बाध्य है। इस प्रकार एक अपमान भरी लंबी लड़ाई लड़कर भेदभाव का शिकार याचिकाकर्ता यदि अपने पक्ष में निष्कर्ष/ सुझाव प्राप्त कर भी ले उसका आख़िर क्या करे ?

भगाना कांड के विरुद्ध लड़ाई लड़ने में अग्रणी सामाजिक कार्यकर्ता श्री विरेन्द्र बागोरिया की यह टिप्पणी अत्यंत प्रासंगिक है ‘अनुसूचित जाति आयोग के पास कोई ऐसी पॉवर नहीं है कि वह प्रशासनिक अधिकारियों के माध्यम से उत्पीड़न के शिकार व्यक्तियों को न्याय दिलाने के लिए बाध्य कर सके. आयोग तो न्याय प्रक्रिया को लम्बा खींचने का काम करता है और इस दौरान उत्पीड़ित को कहीं-न-कहीं ये ग़लतफ़हमी बनी रहती है कि उसकी कोई सुनवाई हो रही है’।
एक अन्य याचिकाकर्ता श्री संतोष कुमार कौशल अप्रैल 1999 से लेकर पिछले 19 वर्षों से अपनी याचिका के नतीजे की इंतज़ार करते करते करते रिटायर भी हो चुके हैं .उनके शब्दों में ‘ अगर मेरा केस कमज़ोर होता तो कभी का रिजेक्ट हो चुका होता। लेकिन मज़बूत केस होने की वजह से आयोग का व्यवहार केवल मात्र एक डम्मी का होकर रह गया है।
निष्कर्ष के तौर पर दलित उत्पीड़न के समाधान की अनुसूचित जाति आयोग से उम्मीद करना दही के भ्रम में कपास खाने जैसा है. यह एक छलावा है और झूठी दिलासा का माध्यम है। सामाजिक राजनीतिक सक्रियता ही दलित उत्पीड़न का वास्तविक प्रतिरोध है। आयोग तो मर्ज़ को मलहम लगाने का भ्रम पैदा करता है लेकिन इलाज नहीं करता। स्थिति का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि दिनांक 09.08.2018 को सदन के पटल पर रखी गई आयोग की नवीनतम वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार दिनांक 31.08.2016 तक आयोग के पास निपटाने हेतु 29,912 शिकायतें बक़ाया थी।

इस लिंक पर क्लिक करके राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग की हरियाणा संबंधी रिपोर्ट देख सकते हैं।

http://ncsc.nic.in/pages/view/243-statesreviewed(haryana)

इस सबके बावजूद किसी अन्य प्रभावी संस्था के अभाव में सामूहिक दलित उत्पीड़न के मौक़ों पर फ़ौरी प्रशासनिक, मनोवैज्ञानिक हस्तक्षेप आयोग के माध्यम से होते रहे हैं जिनकी अपनी महता है। लुट पिट गए हिंसा के शिकार परिवारों को तुरंत आर्थिक सहायता, प्रशासन को सुरक्षा देने के लिए सक्रिय करने में, सरकारी कल्याण स्कीमों को लागू करवाने में और इसी प्रकार छुआछूत, मंदिर प्रवेश, दलित दूल्हे की घोड़े की सवारी आदि अनेक पक्षों पर आयोग से तुरंत हस्तक्षेप की उम्मीद की जाती है और हस्तक्षेप होता भी है। मनोवैज्ञानिक रूप से भी उत्पीड़नकर्ता को कहीं ना कहीं एक डर बना रहता है कि दंगा-फ़साद किया तो मामला आयोग के माध्यम से दूर तक जाएगा। चूँकि आयोग की वार्षिक रिपोर्ट राष्ट्रपति को भेजी जाती है और सदन में भी पेश होती है तो आयोग का इस प्रकार एक विशिष्ट महत्व भी है।
हरियाणा राज्य में आयोग की कार्यप्रणाली कैसी रहेंगी और सत्तापक्ष इसके माध्यम से दलित समुदायों से कितनी नज़दीकियाँ बना पाएगा ये तो आने वाला वक़्त ही बताएगा।

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2 COMMENTS

  1. कुछेक आयोग तो पहले ही पंगु थे, आजकल बचे खुचे भी नपुंसक बना दिए गए हैं।

  2. 👍🏻सामाजिक,राजनीतिक सक्रियता ही दलित उत्पीड़न का वास्तविक प्रतिरोध है ••।
    बढ़िया एवम् जमीनी सच्चाई से रुबरु करवाता बेहतरीन आलेख।
    सुरेन्द्रपाल सिंह सर को सलाम।
    इसमें खापड़ और मनोहरपुर प्रकरण का भी जिक्र किया जा सकता है ।लम्बे समय से मनोहरपुर के पीड़ित जींद सचिवालय के बाहर बैठे हैं ,कोई सुनवाई नहीं।
    ऐसा ही खापड़ के मामले में हुआ।
    विक्रम राही

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