दलित स्त्री के जीवन की महागाथा – दाई’

अनिता भारती

भारत की सत्तर प्रतिशत आबादी गांव में निवास करती है। इस आबादी के पास शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं का नितांत अभाव है।  अशिक्षा, गरीबी और अज्ञानता के साथ-साथ मौलिक सुविधाओं के अभाव में ग्रामीण समाज ने जीने खाने और रहने के अपने तौर तरीकों का विकास अपने तरीकों से कर लिया है। ऐसे ही तौर तरीको में, गांव में अस्पताल या स्वास्थ्य केन्द्र के अभाव में गांव की तमाम महिलाओं को प्रसव कराने वाली दाईयां होती थी, जो शिशु का जन्म दिलवाने से लेकर जच्चा-बच्चा के स्वास्थ्य का भी ध्यान रखती थी।  यदि गांव में दाईयां जच्चा बच्चा की बागडोर नहीं संभालती तो न जाने कितने शिशु और माँ की जानें हर महीने काल कलवित होती रहती।

दाई के पेशे और हुनर में तेज यह महिलाएं जिन्हें आज भी समाज दाई या दाई माँ के नाम से जानता है, अधिकांश उनमें से दलित महिलाएँ होती थी और अभी भी हैं। दाई समाज ने देश में स्वास्थ्य सुविधाओं के समानान्तर अपनी सेवाएं देकर, उसकी रीढ़ की हड्डी बनने का काम किया है। इसमें कोई शक की गुजांईश नहीं बचती कि निम्न वर्ग से आई प्रसव कला में दक्ष इन दाईयों ने सालों साल सुरक्षित प्रसव भी कराएं है।

एक दाई की जिजीविषा, उसके संघर्ष, उसके अंदर बैठी सृष्टि रचने जैसी सृजनात्मकता, नवजात बच्चे के प्रति उसकी मोह-ममता, उसके त्याग परिश्रम और लगनशीलता को युवा उपन्यासकार टेकचंद ने अपने उपन्यास दाई में रेशम चरित्र के माध्यम से समाज के सामने प्रस्तुत किया है। रेशम एक दाई न रहकर पूरे दाई समाज की जातिवाचक संज्ञा बन जाती है। रेशम बचपन से अत्यंत साहसी है, खिलंदड है, वाकपटु है, खुशमिजाज है। एक अच्छी नर्स, अच्छे डॉक्टर, एक अच्छे मित्र के गुण उसमें कूट कूट कर भरे हैं। रेशम का जीवन एक दलित स्त्री के जन्म से लेकर मृत्यु तक के सम्पूर्ण जीवन का आख्यान है। एक पत्नी और एक माँ के रुप में दाई रेशम ने हमेशा दुख पाए। पति जुआरी और शराबी निकला तथा रेशम के लड़के भी अपने बाप की राह पर चलते हुए शराबी और जुआरी निकले। जीवन भर पति और बच्चों को मशीन की तरह कमाकर खिलाने के बाद भी रेशम दाई अन्त समय में जिस आर्थिक विपन्नता से गुजरती हुई मर जाती है वह हमारे नैतिकता की पट्टी पढ़ाने वाले समाज के लिए अत्यन्त शर्मनाक है।

रेशम दाई उपन्यास के कथा नायक की रिश्ते में बुआ लगती है, कथा नायक रेशम दाई के चरित्र से अत्यंत प्रभावित है। वह रेशम दाई अर्थात अपनी बुआ के किस्से कहानियां सुन सुनकर बड़ा हुआ है। शायद यही वजह है कि दाई उपन्यास का पूरा कथानक रेशम के बचपन से लेकर उसकी मृत्यु तक उसके इर्द-गिर्द घूमता है।

उपन्यास की नायिका रेशम बचपन से विद्रोही है। रेशम को लड़कों की तरह कपड़े पहनकर खेलना-कूदना, तितली, बर्रे पकडऩा, गाय भैंसों के पीछे भागना आदि उसका शौक है। जोखिम भरे कामों से लेकर मां-पिता के कामों में बढ़-चढ़कर हाथ बंटाना रेशम का चरित्र है। परिवार में जब सुअर पालने की बात आती है तो वह विरोध कर गाय भैंस या बकरी का बच्चा पालती है, जिससे घर में पैसा आता है। रेशम का चरित्र बहुआयामी है उसे नाचने, गाने से लेकर गांव देहात के सारे काम आते हैं। रेशम को माता-पिता भाई-बहनों और गांव-समाज से  जितना प्यार-दुलार मिला, उतनी ही पति से प्रताडऩा मिली। पर रेशम उस प्रताडऩा की परवाह किए बगैर अपने स्वाभिमान, आजादी और मेहनत से अपना आनंद से जीवन बिताती रही ।

रेशम एक इज्जतदार दाई है जिसके पहुंचते ही प्रसूताओं को चैन पड़ जाता है। गांव की गर्भवती स्त्रियों को लगने लगता है कि अब उनका जीवन और उनका बच्चा सुरक्षित हाथों में है। इसी भरोसे को कायम रखते हुए गांव में रेशम न जाने कितने प्रसव करा चुकी है। गांव के सारे बच्चों का जन्म उसके ही हाथों से हुआ है। जब गांव के  लड़के एक दलित बच्ची को छेड़ते हैं तो रेशम ने भी लटठ उठाकर पूरा मुकाबला किया। उत्पीडऩ और हिंसा की इस घटना पर अपना दुख व्यक्त करते हुए रेशम अपने भाइयों से कहती है- ‘सारे ई तै मेरे हाथां के पैदा करे ओड थे,….पर नसे और छोह(गुस्से) मैं थे…कमरा अर पावां पर ल_ मारे जिब भाज्जे…..(पृ-38)’

अनपढ़ रेशम को समाज और इंसान के स्वभाव में आ रहे परिवर्तन की खूब पहचान और समझ है। उसे अपने दाई के हुनर का पूरा ज्ञान है। वह जानती है पैसे वालों और नव धनाढ्यों की दुनिया कैसे बदल रही है और कैसे अस्पतालों के डॉक्टरों का लोभ दिन पर दिन बढ़ता जा रहा है- ‘ये डाग्दर तै नपूतै ढेड़ पेट पाड़ के रपिये बणावैं से (पृ.42)’  ‘बालक मानते ई कोन्या….ले हैं अर बहु नैं ठा (उठा) के डाग्दर के भाज लिए.. के फैदा होया? दोन्नूं बार बड्डे परेसन होये….न्यू जाण ल्यो अक बालक मोल पडग़े…..इतनी रकम लागगी नरसिंग हूम मैं……ऊपर तै बहू आज तक  दुख पा री है….(पृ-42)

रेशम नाते-रिश्तेदारों की शादियों की जान है, जब तक रेशम नहीं पहुंचती शादी-विवाह में जान नहीं आती।  दलितों की शादी में जब बारात लड़की के घर चली जाती है तब खोईया होता है इसमें रात भर औरतें नाच गाना मस्ती करती है। स्त्रियाँ तरह-तरह के रूप धरकर खासकर मर्दों के रूप धरती है और मर्दों की खूब खिल्ली उड़ाती है। खोईयां की जगह मर्दों का प्रवेश निषिद्ध होता है। यहां तक की छोटे लड़कों को भी नहीं आने दिया जाता। ऐसे ही एक खोईया में कथा नायक रेशम के खोईयां में खेले गए चरित्र का वर्णन करते हुए कहता है-

‘रेशम मर्द की एक्टिंग में माहिर है वह अंग्रेज मर्द बनती है और अपनी ऊट पटांग अंग्रेजी से सबको हँलाती है हम तुमको गोले मारटा… ऐंडर…पैंडर…गैंडर लंडन से आटा’ शब्दों का उच्चारण ऐसा कि अंग विशेष की परिभाषा ध्वनित हो। शादी से पूर्व की रात को होने वाले गीत संगीत में जमकर नाटक बाजी करती। ऐसे ही एक कार्यक्रम में वह औरतों के झुंड में अपना स्पेशल आइटम सूट टू पीस बिकनी, घुटनों तक बूट सिर पर चौड़ा हेट जो चेहरा ढक लेता था, और नकली बंदूक लिए अंग्रेजी में हिन्दी बोलकर भाषण सा दे रही थी।

रेशम दाई कभी किसी से न हारने वाली, किसी के दाब-दबैल में न रहने वाली, अपने पैरों पर खड़ी बचपन से लेकर बुढ़ापे तक पूरे परिवार को पालने वाली, सारी जंग जीतने वाली अपराजेय यौद्धा अंतत: अपने शराबी पुत्रों से हार जाती है। ‘रेशम’ दाई की कहानी दाईयों के जीवन और उनके पेशे से गुजरते हुए एक दलित स्त्री की महागाथा बन जाती है। इस महागाथा को सलीके से बुनने में लेखक ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। हरियाणवी भाषा का प्रयोग दाई उपन्यास को आंचलिकता  प्रदान करता है। पूरे उपन्यास में भाषा एक चित्रमयी खिड़की की तरह खुलती है जिसमें कहीं तो निश्छल हंसी, उत्साह, उत्सव, दादी, चाचियों, भाभियों के चौबारे हैं, तो कहीं दाईयोँ के महत्व को धीरे-धीरे खत्म करने की कगार पर खड़े नित नये खुलते महंगे नर्सिंग होम से उपजी निराशा और हताशा झलकती है। आज बेशक पांच मई को दाईयों के लिए एक दिन तय कर दिया गया हो पर वास्तव में गांव देहात की यह कुशल कलाकार, नवजीवन देने वाली हाथों की जादूगर दाईयां धीरे-धीरे खत्म हो रही है या उपेक्षा की शिकार होकर मर रही है, जैसे रेशम दाई मर रही है और उसकी कला और  कौशल भी मर रहा है।

युवा दलित साहित्यकार टेकचंद ने अपने पहले उपन्यास ‘दाई’ में भारतीय दाईयों और उनके माध्यम से भारतीय दलित महिलाओं के जिस जीवट भरे चित्र और चरित्र को उकेरा है वह दलित साहित्य और समाज के लिए बहुत मानीखेज उपलब्धि है। इससे भी ज्यादा मानीखेज यह है कि उपन्यासकार टेकचंद ने दलित स्त्रियों के समाज में योगदान का कृतज्ञता भरा जो आख्यान रचा है उसकी धमक दूर तक और देर तक सुनाई देगी। विश्वास है कि ‘दाई’ उपन्यास अपने पूरे दम खम के साथ दलित साहित्य में अपनी पहचान बनाने में कामयाब रहेगा।

उपन्यास का नाम- दाई

प्रकाशक- वाणी प्रकाशन दिल्ली, पृ.-72

सम्पर्क-9899700767

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