आखिरी कश – शर्मिला

शर्मिला
चेहरे बदले
हम वहीं हैं
एडिय़ाँ सदियों से
मुँह खोले
सिसक रही हैं
हथेलियों में
टिब्बें उग आए हैं
मुट्ठी में चार दाने
धुजते हाथ
जला देते हैं
बीड़ी का आखिरी कश
छूट जाता है ।
(धुजना – कांपना)
शोधार्थी, पी.यू., चण्डीगढ़
 
दर्द
शर्मिला
तुम कहती हो
बारिश में
खिड़कियाँ खुली रहने से
नींद बहुत अच्छी आती है
दूसरी तरफ
एक आदमी
हुक्के पर गिरा हुआ
बूँदों के साथ
चिंताओं के घूँट भरता है
बंद दीवारों के बीच
उसे खड़े दानों का
कड़क कर बादलों में
समा जाती बिजली का
चेहरा दिखता है
और ये दर्द लेकर
नसों में पैठ जाता है
उसकी आँख नहीं झपकती ।
शोधार्थी, पी.यू., चण्डीगढ़
हमने जहर नहीं बोया
शर्मिला
नाड़ लटकाये
डोळी पर
मिट्टी में मिट्टी हुए
घुटनों पर हाथ रखे
तुम बैठे थे
कितने बैठे हैं
डबडबाई आँखों में
दो नहीं …
सहस्र पुतलियाँ थर्राईं
हमने जहर नहीं बोया
कौन लाया है ?
कौन ?
किसने हमें…
सौदागर बनाया है ?
(नाड़-गर्दन, डोळी-मेड़)
शोधार्थी, पी.यू., चण्डीगढ़
निकम्मा
शर्मिला
देखते-देखते धड़कनें
गले तक उछल आती हैं
हाथों से चीज़ें कांपकर
छूटने लगती हैं…
और जंगलो में टँगी आँखें
घूर कर देखती हैंजैसे कत्ल हो गया हो
हड़बड़ाहट में साँसें…तिनकों की तरह
तितर-बितर होने लगती हैं
और सबकुछ समेट कर
निकल जाना चाहती हैं
जैसे कोई पकड़ न ले
प्रेम में आदमी
सिरे का निकम्मा हो जाता है।
इसलिए ज्यादा समझदार लोग
फैसले लेते हैं…
प्रेम नहीं करते !
(जंगला-खिड़की आदि की वह चौखट जिसमें लोहे की छड़ लगी होती है।)
शोधार्थी, पी.यू., चण्डीगढ़

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