न दीवानों से वाबस्ता, न फरज़ानों से वाबस्ता -महावीर ‘दुखी’

महावीर ‘दुखी’ 

न दीवानों से वाबस्ता, न फरज़ानों से वाबस्ता,
रहा हूं मैं हमेशा आम इन्सानों से वाबस्ता।

सुना है देवाओं का कभी था बास धरती पर,
मगर क्यूं आजकल दुनिया है शैतानों से वाबस्ता।

हमारी बस्तियां सहराओं जैसी होती जाती हैं,ॉ
हुए जाते हैं ख़्वाब अपने बियाबानों से वाबस्ता।

बदल देगी हमारा हाल कोई गैब की ताकत,
रहे हम तो हमेशा ऐसे इम्कानों से वाबस्ता।

किनारों से हमारी कश्तियों का वास्ता कैसा,
हमारी कश्तियां रहती हैं तूफानों से वाबस्ता।

वही तो जानता है दर्द सहने का मजा क्या है,
अज़ल से जिन्दगी जिसकी गमखानों से वाबस्ता।

नज़र आती है अब तो हर तरफ बस एक ही सूरत,
न जाने कौन है ये मेरे अरमानों से वाबस्ता।

सुनाऊं किस तरह रुदादे-गम अपनी जमाने को
मिरा गम तो है मेरे दिल के तहखानों से वाबस्ता।

जुनूं वाले सफ़र ही पर कुछ इस अन्दाज से निकले,
‘दुखी’ भी हो गया मंजिल के दीवानों से वाबस्ता।

गांव सुदकैन कलां, तह. नरवाना, जींद-94169-67861

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