जहां में खौफ़ का व्यापार क्यूं है सोचना होगा – महावीर ‘दुखी’

महावीर ‘दुखी’ 

जहां में खौफ़ का व्यापार क्यूं है सोचना होगा,
तशद्दुद की यहां भरमार क्यूं है सोचना होगा।

सुना था आदमी ने बेबसी पर पा लिया काबू
मगर हर आदमी लाचार क्यूं है, सोचना होगा।

तरक्की के सभी साधन हमारे पास हैं फिर भी,
हमारा रास्ता दुश्वार क्यूं है सोचना होगा।

जहां इख़्लास, यकजिहती, उखुव्वत की जरूरत हो,
तअस्सुब का वहां परचार क्यूं है, सोचना होगा।

खबर आती है, हर जानिब से जुल्मों-कत्लो-गारत की,
लहू से तर हर इक अखबार क्यूं है सोचना होगा।

फिरिश्ते दुबके बैठे हैं, पहाड़ों की गुफाओं में,
दरिन्दों का खुला दरबार क्यों है सोचना होगा।

महायुद्ध सी कयामत देख ली हमने, मगर फिर भी,
हमें जंगों-जदल से प्यार क्यूं है, सोचना होगा।

युगों पहले हुई आबाद ये दुनिया मगर यारो,
गरीब अब तक भी बेघर बार क्यूं है सोचना होगा।

मुहब्बत से, मुरब्वत से, शराफ़त से, सदाकत से,
ज़माना बरसरे-पैकार क्यूं है, सोचना होगा।

उजालों की ‘दुखी’ सबको जरूरत है, मगर अपना,
अंधेरों के लिए इसरार क्यूं है, सोचना होगा।

गांव सुदकैन कलां, तह. नरवाना, जींद-94169-67861

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