हाय मेरे ईश्वर, मेरे गॉड़, वाहे गुरू, हाय मेरे अल्लाह

अमृतलाल मदान 

भीष्म साहनी की स्मृति को समर्पित –

गूँगा बना दिया गया था मुझे
और लँगड़ा भी
धर्म-संचालित पिछले भूचाल द्वारा
आओ तुम भी देखो जो मैं देख रहा हूँ
तड़ाक से खुल गयी इस टूटी खिड़की से
दूर उठता वो काला बवंडर
बड़े बड़े धर्म ग्रंथों से बंद बाड़ों के फाटक
अचानक खोल दिये गये हैं,
सायों के द्वारा
मुखौटे पहने हैं जो, दस्ताने भी
नयी दास्तानें गढ़ने को गरमाई गयी हवाओं के बीच ।

साफ-साफ देख रहा हूँ
जुनूनी मुखौटों-नकाबों से उभरते नुकीले सींग
आँखों के लाल-लाल बिफरे साँड
तलवारों सी तनी उनकी पूँछें
अकड़े रक्त से सनी उनकी मूँछें ।

ओह सह नहीं पाएगी मेरी खोपड़ी मेरी झोपड़ी भी
इस भूचाल का प्रहार
ए.सी. में बैठे भू-वेत्ताओं ने रिक्टर स्केल पर
शून्य कर दी है जिसकी तीव्रता
महज एक संयोग करार दे कर।

उफ्फ, वे आ ही गये हैं द्वार भड़भड़ाते
मेरे बच्चों, छुप जाओ कहीं पिछवाड़े
सदियों पुरानी माटी ओढ़े माँ और बुजुर्गों के साथ
झेल लूँगा यह तूफान अकेले दम आज भी।

हे मेरे प्राण, सिमट जा, सिमट जा
ओस की बूँद सा थरथराता कहीं कोने में।
तुलसी की पत्तियों के बीच।

अरे ठहर, मत काँप यूँ थर-थर
बन जा भगोड़ा चूहा या कीट-मकोड़ा
छुप जा किसी दरार में रोज की तरह
डर नहीं, डर नहीं कुछ न होगा तुझे
वो ऊपर बैठा है न सबका हाथ पकड़ने वाला
सबका साथ देने वाला
ओह, सुनता क्यों नहीं वह दीन की पुकारें
देखता क्यों नहीं ये काँपती अल्पसंख्यक दीवारें
अपने अच्छे दिनों में भी ।

ओह वे घुस ही आए हैं अंदर
ओ मेरे प्राण, बना ले इस बैसाखी को ही यान
उड़ जा सगर्व मंगल ग्रह पर
दिखेगा जहाँ से सारे जहाँ से अच्छा
ये लंगडिस्तान हमारा ये गूंगास्तान हमारा।

ओह किधर जाऊँ कहाँ जाऊँ
ढोकर यह पौने छह फुटा प्राण
आखिर पाऊँगा भी कहां त्राण
बेहतर है हवाले कर दूं खुद को
इस विशालकाय भूखे दानव के सामने रौंदे जाने को
पर पहले प्रण कर प्राण
सुबह हर चाय की प्याली में उठे इक तूफान

तैर उठे तेरे रक्त का कतरा कतरा
तभी जानेगी यह कुंभकर्णी व्यवस्था
उन्माद के किस रावण से है
संपूर्ण सह-अस्तित्व को ही खतरा ।

हाय! आह! हा ! ओम शांति साँस साँस स्वाहा
हाय मेरे ईश्वर, मेरे गॉड़, वाहे गुरू,
हाय मेरे अल्लाह !!!-

1150/11, प्रोफेसर कालोनी कैथल (हरि) 09466239164

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