खिलवाड़ – राधेश्याम भारतीय

लघुकथा

गांव में एक घर की छत ढहने से परिवार के चार सदस्यों की मौके पर ही मौत हो गई। हादसा इतना दर्दनाक था कि देखने वालों की रूह कांप गई। बड़ी मुश्किल से लाशों को बाहर निकाला गया। बात जंगल की आग की भांति पूरे इलाके में फैल गई। हर कोई उस घर की ओर दौड़ पड़ा। पर सब बेबस।

‘गरीबी भी शाप है मास्टर जी। बेचारे एक छत पक्की न करा सके।’ एक बुजुर्ग ने मास्टर रामप्रकाश को कहा। ‘महंगाई किसी को उठने दे तब ना। लील गई हंसती खेलती चार जिंदगियों को।’ मास्टर जी ने बुजुर्ग की बात को आगे बढ़ाया।

शाम को एक साथ चार लाशें जली। पूरा गांव शोक के सागर में डूबा था।

मास्टर जी घर आए तो निगाह अखबार पर पड़ गई। पहले ही पन्ने पर एक नेताजी का बयान था कि हम देश से भ्रष्टाचार, महंगाई आदि को जड़ से खत्म कर देंगे। हम जनता से किए हर वायदे को पूरा करेंगे। हर घर को छत देंगे।

मास्टर जी ने क्रोध में आकर अखबार वहां से उठाकर कोने में फैंक मारा।

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