फुहशनिगार नहीं, हकीकतनिगार इस्मत चुगताई – गुरबख्श मोंगा

गुरबख्श सिंह मोंगा

समूचे भारतीय उपमहाद्वीप में इस्मत चुगताई का नाम किसी तआरूफ  का मोहताज नहीं। अपने ही घर में मजहब, मर्यादा, झूठी इज्जत के नाम पर गुलाम बना ली गई, औरत की आजादी पर उन्होंने सख्ती से कलम चलाई और उसके हकीकी हकूक के हक और उसकी हिफाजत में अपनी आवाज बुलंद की। वे सचमुच में एक स्त्रीवादी लेखिका थी। अपने समूचे साहित्य में उन्होंने निम्न मघ्यवर्गीय मुस्लिम तबके की औरतों की समस्याओं, उनके सुख-दु:ख, उम्मीद-नाउम्मीद को बड़े ही बेबाकी से अपनी आवाज दी। भारतीय समाज में सदियों से दबी-कुचली और रूढ़ सामाजिक बंधनों से जकड़ी महिलाओं के दर्द को न सिर्फ उन्होंने संजीदगी से समझा, बल्कि उसे अपने साहित्य के माध्यम से लोगों के बीच ले गई। उन्होंने उन मसलों पर भी कलम चलाई, जिन्हें दीगर साहित्यकार छूने से भी डरते और कतराते थे। इस्मत चुगताई के लेखन में धर्मनिरपेक्षता और आधुनिकता का हमेशा जोर रहा। अंधविश्वास, धार्मिक कटरता, साम्प्रदायिकता, सामंती प्रवृतियों, वर्गभेद और जातिभेद का उन्होंने जमकर विरोध किया।

                हिंदी, उर्दू अदब की दुनिया में ‘इस्मत आपा’ के नाम से मशहूर इस्मत चुगताई का जन्म 21 अगस्त,1915 को उतर प्रदेश के बदायूं शहर में हुआ। उन्हें बचपन से ही पढऩे का बहुत शौक था। इस्मत चुगताई खुद अपने लेखन कला के बारे में कहती थी, ‘‘लिखते हुए मुझे ऐसा लगता है। जैसे पढऩे वाले मेरे सामने बैठे हैं, उनसे बातें कर रही ह और वो सुन रहे हैं। कुछ मेरे हमख्याल हैं, कुछ मोतरिज हैं, कुछ  मुस्करा रहे हैं, कुछ गुस्सा हो रहे हैं। कुछ का वाकई जी जल रहा है। अब भी मैं लिखती हूं तो यही एहसास छाया रहता है कि बातें कर रहीं हूं’’।

                इस्मत चुगताई की कई कहानियों पर वामपंथी विचारधारा का असर है। उस दौर के तमाम रचनाकारों की तरह वे भी अपनी कहानियों के जरिए समाजवाद का पैगाम देती हैं। ‘कच्चे धागे’ ‘दो हाथ’ और ‘अजनबी’ उनकी ऐसी ही कहानियां हैं। इस्मत चुगताई इंसान-इंसान के बीच समानता की पक्षधर थी। औरत और मर्द के बीच असमानता देखकर, वह हमलावर हो जाती थी। ‘मसावात’’ (समानता) का फुकदान (अभाव) अमीर गरीब के मामले में ही नहीं,औरत और मर्द के मुकाबले में तो और भी ज्यादा है।

                इस्मत चुगताई अपनी किशोरावस्था से ही आजादख्याल थी। किसी भी खांचे में कैद रहना उन्होंने सीखा नहीं था। लड़का-लड़की में लिंग के आधार पर भेदभाव को वे गलत मानती थी। इस्मत चुगताई के कई कहानी संग्रह प्रकाशित हुए। जिसमें प्रमुख है।, ‘चोटें’, ‘छुईमुई’, ‘एक बात’, कलियां, ‘एक रात’, ‘दो हाथ’, ‘दोजखी’, ‘शैतानी’ आदि। वहीं साल 1941 में प्रकाशित ‘जिद्दी’ उनका पहला उपन्यास था। ‘टेढ़ी लकीर’ एक कतरा ए खून, दिल की दुनिया, मासूमा, ‘बहरूप नगर’,’सैदाई’, ‘जंगली कबूतर,’ ‘अजीब आदमी,’ ‘बांदी’ उनके दीगर उपन्यास हैं। ‘कागजी है पैरहन’ कहने को इस्मत चुगताई की आत्मकथा है,  लेकिन एक लिहाज से देखा जाए, तो इस किताब में जगह-जगह स्त्री विमर्श के नुकते बिखरे पड़ेेे हैं। अपनी बातों और विचारों से वे कई जगह पितृसतात्मक मुस्लिम समाज की बखिया उधेड़ती हैं। किताब का हर एक अध्याय, मुकम्मल अफसाना है।

                इस्मत चुगताई के पति शहिद लतीफ अपने जमाने के मशहूर फिल्म लेखक और निर्देशक थे। इस्मत चुगताई भी फिल्मों से जुड़ी रहीं। उनकी कई कहानियों पर फिल्में बनीं। इसके अलावा उन्होंने अनेक फिल्मों की पटकथा भी लिखी। फिल्म ‘जुगनू’ में अभिनय किया। निर्देशक एम एस सथ्यू की मशहूर फिल्म ‘गर्म हवा’ इस्मत चुगताई की कहानी पर ही बनी थी। जिसके लिये उन्हें सर्वश्रेठ कहानी का फिल्मफेयर अवार्ड भी मिला। ‘गर्म हवा कैसे बनी, इसका भी बड़ा दिलचस्प किस्सा है। इस्मत चुगताई की कहानी इस्मत चुगताई को कई सम्मानों से भी नवाजा गया। उन्हें मिले प्रमुख सम्मान हैं-‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’, ‘गालिब अवार्ड, ‘इकबाल सम्मान’, ‘मखदूम अवार्ड’ आदि।

                इस्मत चुगताई को वतन की गंगा-जमुनी तहजीब से बेहद प्यार था। बाज लोगंों में दूसरे धर्म को लेकर जो कट्टरता और असहिष्णुता होती है, वह उनमें बिल्कुल नहीं थी। इस्लाम धर्म के अलावा वे सभी धर्मो को पंसद करती थी, वतन की साझा संस्कृति में वे अपनी भी हिस्सेदारी की बात करती थी। ”मै मुसलमान हूं बुतपरस्ती शिर्क (अल्लाह की जात में किसी को शरीक करना, जो इस्लाम के मुताबिक पाप है। मगर देवमाला (पुराण,माइथलॉजी) मेरे वतन का विरसा (धरोहर) है। इसमें सदियों का कल्चर और फलसफा समोया हुआ है। ईमान अलाहदा है। वतन की तहजीब अलाहदा है। इसमें मेरा बराबर का हिस्सा है। जैसे उसकी मिट्टी, धूप और पानी में मेरा हिस्सा है। मैं होली पर रंग खेलूं, दीवाली पर दिये जलाऊं तो क्या मेरा ईमान मुतजलजल (कंपायमान) हो जाएगा। मेरा यकीन और शऊर क्या इतना बोदा है, इतना अधूरा है कि रेजा-रेजा (टुकड़े-टुकड़े) हो जाएगा।’’ हर दिल अजीज अफसानानिगार इस्मत चुगताई ने 24 अक्तूबर, 1991 को इस दुनिया से विदाई ली। जाते-जाते भी वे दुनिया के सामने एक मिसाल छोड़ गईं। उनकी वसीयत के मुताबिक मुंबई के चंदनबाडी शमशान गृह में उन्हें अग्नि को समर्पित किया गया। एक मुस्लिम औरत का मरने के बाद दफनाए जाने की बजाय हिंदू रीति रिवाजों से दाह संस्कार, सचमुच उनका एक आश्चर्यजनक और साहसिक फैसला था।  इस्मत चुगताई के इस फैसले से उनके कुछ तरक्कीपसंद साथी नाराज भी हुए। लेकिन चुगताई अलग मिट्टी की बनी हुई थी, न तो वे अपने जीते जी कभी लीक पर चली और ना ही मरने के बाद। इस्मत चुगताई की शानदार शख्सियत के बारे में मंटो ने क्या खूब कहा है। ”इस्मत पर बहुत कुछ कहा गया है और कहा जाता रहेगा। कोई उसे पसंद करेगा, कोई नापसंद। लेकिन लोगों की पसंदगी और नापसंदगी से ज्यादा अहम चीज इस्मत की तख्लीकी कुव्वत है। बुरी, भली,उरियां,मस्तूर जैसी भी है, काइम रहनी चाहिए। अदब का कोई जुगराफिया नहीं। उसे नक्शों और खाकों की कैद से, जहां तक मुमकिन हो, बचाना चाहिए।

 सम्पर्क – 99966-84988

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