वर्तमान समय की दुरभिसंधि की करुण कथा – जाट कहवै , सुण जाटनी- राजेन्द्र गौतम

ग्लोकल और लोकल की फ्रेज इस उपन्यास के साथ विशेष रूप से जुडी है क्योंकि इसमें चित्रित समस्या का आकार अखिल भारतीय है पर उसको जिस भाषिक और शैल्पिक कलेवर में ढाला गया है उसका फलेवर पूरी तरह हरियाणवी है। हरियाणवी का शायद ही कोई ऐसा मुहावरा या कहावत हो जिसका समावेश इस उपन्यास में नहीं हुआ है।

‘जाट कहवै सुण जाटणी’ हरियाणवी उपन्यासों की परम्परा को नया मोड़ देता है। कहने की अपेक्षा मुझे यह कहना ज्यादा सार्थक लगता है कि यह उपन्यास हरियाणवी उपन्यास-साहित्य में एक धमाका करता है। ‘मोड़ देना’ इसलिए सार्थक नहीं है क्योंकि हरियाणवी उपन्यासों की कोई बहुत लम्बी परम्परा है ही नहीं। राजाराम शास्त्री से लेकर सन् 2017 तक के पचास वर्षों में हरियाणवी उपन्यासों की संख्या आराम से उंगलियों पर गिनी जा सकती है। उस स्थिति में जब हरियाणा में लिखे गए खड़ी बोली साहित्य का भी का बहुत ही थोडा अंश प्रांतीय सीमाओं से बाहर स्वीकृति पा सका है, यह एक विस्मित करने वाला तथ्य है कि हरियाणवी में रचित यह उपन्यास हिन्दी के किसी भी सामयिक उपन्यास से टक्कर ले सकता है।

यद्यपि यह उपन्यास ‘राग दरबारी’ का अनुकरण नहीं है पर इसको पढ़ते समय ‘राग दरबारी’ का स्मरण बार-बार आता है। सांस्थानिक भ्रष्टता पर नश्तर लगाने का जो काम सातवें दशक में ‘राग दरबारी’ ने किया था, आज उसकी जरूरत और भी ज्यादा हो गयी है क्योंकि तब जो बीमारी शुरू हुई थी, उसके प्रति हमारे महान् राष्ट्र ने ‘निप द ईविल इन द बड’ के फिजूल के फार्मूले को नहीं अपनाया अपितु उसको ‘दूधों नहाओ पूतों फलो’ का आशीर्वाद दे दिया। परिणाम यह हुआ कि आज हम भ्रष्टाचार की सर्वदलीय प्रतियोगिता देख रहे हैं। किस की कमीज ज्यादा सफेद है, इसकी अहमियत नहीं है। अब तो तर्क यह है कि आप जब महापापी हैं तो आपको हमें पापी कहने का अधिकार नहीं है। ऐसे भयानक समय में ‘जाट कहवै सुण जाटणी’ एक ऐसे जादुई यथार्थ को बुनता है जो हमें कचोटता भी और हालात के प्रति सचेत भी करता है लेकिन साथ क्रूर सत्ता के समक्ष आम जन की असहायता को रेखांकित करता है।

ग्लोकल और लोकल की फ्रेज इस उपन्यास के साथ विशेष रूप से जुडी है क्योंकि इसमें चित्रित समस्या का आकार अखिल भारतीय है पर उसको जिस भाषिक और शैल्पिक कलेवर में ढाला गया है उसका फलेवर पूरी तरह हरियाणवी है। हरियाणवी का शायद ही कोई ऐसा मुहावरा या कहावत हो जिसका समावेश इस उपन्यास में नहीं हुआ है।

 मेरी व्यक्तिगत राय है कि जिस मानक हरियाणवी का प्रयोग इस उपन्यास में हुआ है, रागनी साहित्य को छोड़ कर उसके दर्शन हरियाणवी लेखकों में कम ही होते है। मैकलुहान ने ‘मीडियम इज़ द मेसेज’ यद्यपि थोड़े भिन्न सन्दर्भ में कहा है पर मेरी निश्चित मान्यता है कि साहित्य में केवल सन्देश कभी महत्त्वपूर्ण नहीं होता। रचना को रचना तो उसका लहजा बनाता है। इस उपन्यास का अंदाजे-बयाँ जिस कमाल को हासिल किये है वह असाधारण है। सब कुछ यों तो हमारा देखा है, रोज हमारी आँखों के आगे घटित होता है लेकिन यह उपन्यास जिस फिल्म को बुनता है, उसके ‘दी एंड’ पर पहुँच कर भी दर्शक-पाठक भौचक सा परदे को निहारता रहता है।

धोती, दूबे और जयंत की तिकड़ी आजाद भारत की विश्व-विजयिनी तिकड़ी है। आज राजनीति और बाबा-युग का जो चोली-दामन का साथ हुआ है उसकी महागाथा भी इस उपन्यास को कहा जा सकता है। इसी अगस्त महीने के अख़बार यही सिद्ध करते हैं कि लेखक कई मायनों में भविष्य-द्रष्टा होता है। बाबा-प्रकरण इसका प्रमाण है। हरियाणा के सन्दर्भ में यहाँ पारम्परिक पूँजीवाद का खेल दिखाया गया है। आज हालात कॉर्पोरेट का जामा पहन कर थोड़े आगे जा चुके हैं। तो भी उपन्यास का कथानक विश्वसनीयता की कसौटी पर एकदम खरा उतरता है।

हमारे समाज में एक खास तरह का दोहरापन मौजूद है। यह समाज स्वस्थ-सहज प्रेम का तो घोर विरोधी है, परदे के पीछे वासना के खेल में रात-दिन लगा है। एक तरफ हरयाणा में यौन-शुचिता प्रतिष्ठा की दृष्टि से नाक का बाल बनी हुई है, दूसरी और कदम कदम पर औरत को बेइज्ज़त किया जाता है। इस उपन्यास में इस दोहरी मानसिकता पर करारी चोट है।

इस उपन्यास में लेखक ने जिस संघर्ष में प्रमोद को उतारा है, विडम्बना यह है कि वह इसे काल्पनिक विजय का नायक नहीं बना पाया है। शिशिर का टूटना भी आसुरी शक्ति की विजय तो लगता है लेकिन यूटोपिया परोसना भी लेखक का मन गंवारा नहीं कर सका।

‘जाट कहवै सुण जाटणी’ वर्तमान समय की दुरभिसंधि की करुण कथा है। वह करुणा बहुत मारक होती है जो हास्य के माध्यम से व्यक्त होती है। व्यंग्य की कसौटी यही है कि अपना और दूसरों का , सब का उपहास कर सकता है। इस उपन्यास में पाठक पूर्णत: ‘रंदाधारी’ नजऱ आता है. सब कुछ को छील कर रख देता है– लेखक का रंदा।

हमारे समाज में एक खास तरह का दोहरापन मौजूद है। यह समाज स्वस्थ-सहज प्रेम का तो घोर विरोधी है, परदे के पीछे वासना के खेल में रात-दिन लगा है। एक तरफ हरयाणा में यौन-शुचिता प्रतिष्ठा की दृष्टि से नाक का बाल बनी हुई है, दूसरी और कदम कदम पर औरत को बेइज्ज़त किया जाता है। इस उपन्यास में इस दोहरी मानसिकता पर करारी चोट है।

‘नील’ का दायित्व मुझे लगता है अब बहुत बढ़ गया है। अब उसे अपने अगले उपन्यास में इससे बड़ी रेखा खींचनी होगी।

सम्पर्क-98681-40469

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