मां की ना कहिए, न्या की कहिए – तारा पांचाल

समाज अपने समय की सच्चाई को अपने रचनाकारों की आंख से देखता है। यह जानना हमेशा ही रोचक होता है कि रचनाकार अपने समय को कैसे देखते व अभिव्यक्त करते हैं। हरियाणा में साहित्य विमर्श की संस्कृति का घोर अभाव है, जिसका यहां के साहित्यिक परिवेश पर खासा नकारात्मक असर है। लेखकों व साहित्यकारों के बीच यह निरंतर चिंता का विषय है। हरियाणा की रचनाशीलता की पहचान के लिए ‘देस हरियाणा’ के हर अंक में किसी एक रचनाकार पर विशेष सामग्री प्रस्तुत की जाएगी। आशा है कि इससे हरियाणा में साहित्य-विमर्श की संस्कृति पनपेगी व साहित्य बोध विकसित होगा।

इस बार हम हरियाणा के कहानीकार तारा पांचाल की रचनाओं पर केंद्रित कर रहे हैं। हम तारा पांचाल की रचनाएं  निरंतर प्रकाशित करते रहे हैं। इसमें उनकी रचना प्रक्रिया व रचना सरोकारों पर प्रकाश डालता उनका वक्तव्य तथा उनकी रचनाओं की मूल्यवत्ता को उदघाटित करते आलेख प्रस्तुत कर रहे हैं। -सं.

 खास रचनाकार

 तारा पांचाल

28 मई,1950 – 20 जून, 2009

साहित्य की यथार्थवादी परंपरा के कहानीकार तारा पांचाल का जन्म 28 मई, 1950 को नरवाना, जिला जींद में हुआ। पंजाब विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त की। प्रारंभिक जीवन से जीवन से ही लेखन के प्रति रूझान रहा। किशोरावस्था में ही अखबारों में उनकी लघुकथाएं व कहानियां प्रकाशित होने लगी थी।  ‘सारिका’, ‘हंस’, ‘कथन’, ‘वर्तमान साहित्य’, ‘पल-प्रतिपल’, ‘बया’, ‘गंगा’, ‘अथ’, ‘सशर्त’, ‘जतन’, ‘अध्यापक समाज’, ‘हरकारा’ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में पाठक उनकी कहानियों से निरन्तर परिचित होते रहे हैं। ‘गिरा हुआ वोट’ संग्रह की दस कहानियों समेत तारा पांचाल की कुल चालीस के आसपास कहानियां हैं, जिनमें कुछ अप्रकाशित हैं।

अपनी युवावस्था में हरियाणा के कहानीकारों की कहानियों का संग्रह ‘बणछटी’ का संपादन-प्रकाशन किया, जिसकी उस समय काफी सराहना हुई थी। तारा पांचाल लगातार अपने साथी रचनाकारों तथा नव-रचनाकारों को प्रोत्साहित करते रहे हैं। बेहद विपरीत परिस्थितियों में उन्होंने ‘जतन’ पत्रिका के संपादन की मुख्य जिम्मेवारी निभाई। उनका छोटा सा घर साहित्यिक-गोष्ठियों और विमर्श का अड्डा था। तारा पांचाल कई वर्षों तक हरियाणा के जनवादी लेखक संघ के अध्यक्ष रहे। जोड़-तोड़ करके पुरस्कार हथियाना तथा स्वयं को सर्वश्रेष्ठ रचनाकार की घोषणा के लिए हिन्दी के कथित आलोचकों व पत्रिकाओं के संपादकों के आगे-पीछे फिरना उनकी फितरत का हिस्सा नहीं था। हरियाणा की साहित्य अकादमी ने भी वर्ष 2007-08 का बाबू बालमुकुन्द गुप्त सम्मान प्रदान करके  तारा पांचाल की रचनात्मक प्रतिभा का सम्मान किया।

हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा बाबू बालमुकुन्द गुप्त  पुरस्कार 2007-08 के अवसर पर दिया गया  वक्तव्य

मां की ना कहिए, न्या की कहिए

1. तारा पांचाल

मेरी कहानियों के मूल्यांकन के आधार पर मुझे बाबू बालमुकुंद गुप्त पुरस्कार दिए जाने के लिए मैं हरियाणा साहित्य अकादमी का हार्दिक आभार व्यक्त करता हूं। इस अवसर पर मैं अपनी लेखकीय चिंताओं में से एकाध यहां उपस्थित आप सभी लेखकों बुद्धिजीवियों सें  इस विश्वास के साथ सांझा करना चाहता हूं कि इसी तरह की चिंताएं आपकी सोच का भी हिस्सा रही हैं। साथियो! लेखक के रूप में मेरी और राज्य के रूप में हरियाणा की आयु लगभग बराबर है। संभवत: यही कारण है इस माटी से मेरा अतिरिक्त लगाव रहा है। मोह रहा है, लेकिन हरियाणा में कहावत है कि ‘मां की ना कहिए।’ यानि हमारी लोक संस्कृति में भी चीजों को वस्तुपरकता की कसौटी पर कसने की हिदायत है न कि अनुराग या मोह के वशीभूत होकर।

हरियाणा की आर्थिक प्रगति हमारे सामने है, जिस पर किसी को भी संतुष्टि हो सकती है, लेकिन आर्थिक प्रगति के चलते स्वस्थ सांस्कृतिक मूल्यों की अनदेखी होती चली जाए, यह भी परखना-देखना आवश्यक है।

हरियाणा में सबसे बड़ा संकट तर्क पर रहा है, जो शिक्षा के प्रसार और तीव्र प्रगति कगे चलते घट जाना चाहिए था, लेकिन यह संकट पहले से कई गुणा गहराया है। तर्क के महत्व को रेखांकित करना मैं यहां आवश्यक नहीं समझता, क्योंकि यहां मैं बौद्धिक रूप से सम्पन्न लोगों से मुखातिब हूं। आप जानते हैं कि  किसी भी राष्ट्र की सामाजिक-सांस्कृतिक समृद्धि उसके तर्कों के पैनपन और गहराई से ही मापी जा सकती है। तर्कों के मरने का अर्थ है राष्ट्र की आत्मा का सड़ जाना।

यहां एक बात स्पष्ट कर दूं-तर्कहीनता अल्पज्ञता या भोलेपन या भलमानसाहत के आसपास की स्थिति है। इनकी पर्यायवाची नहीं। इस तरह की तर्कहीनता बेशक सीधे-सीधे किसी को कोई नुक्सान नहीं पहुंचाती। बशर्ते वह निजी हितों या भय की देन न हो। लेकिन परोक्ष रूप से यह हानिकारक इसलिए है कि लोगों की यह तर्कहीनता चौपालों, नोहरों, बैठकों में खाटों के सिरहाने बैठे कुतर्कों को हुक्के की तरह गुडग़ुड़ाते रहने की सामाजिक मान्यता देने लगती है। इस प्रकार सामाजिक मान्यता प्राप्त कुतर्क संस्कृति को विषाणुओं  की तरह बीमार करने लगते हैं।

यहां उपस्थित सुधीजनों में से शायद ही कोई इन कुतर्कों की दी हुई खीझ से बचा हो। कोई लाख तर्क करे कि नहीं भाई। मानो आप। चाहो तो चलो गिनवा दूं। तीन नहीं। बकरी के दो थन होते हैं। लेकिन यहां तीन थन बताने वाला कुतर्की पूरी ढिठाई के  साथ कहता हुआ सुना जा सकता है-बेशक गिनवा दे। मैं मानूंगा तब ना।

जैसा कि मैंने कहा है-किसी भी संस्कृति की धड़कनों को, हरारत को या उत्कृष्टता को माने का सबसे कारगर मापदण्ड है उस संस्कृति में विद्यमान तर्कों की ऊंचाई और गहराई और बीमार-बोदे तर्कों के स्थान पर नए तर्कों के बनने की प्रक्रियाएं और गुंजायश। इस दृष्टि से हरियाणा की संस्कृति को देखें-परखें, तो  गर्व के स्थान पर परेशानी ही होती है। मनुष्य और मनुष्यता की सुरक्षा किसी भी स्वस्थ संस्कृति का पहला सर्वोच्च तर्क होता है, लेकिन हरियाणा में कई बार ऐसा लगता रहा है। जैसे मनुष्य और मनुष्यता की सुरक्षा वाला यह तर्क अभी अपनी शैशवावस्था मेंं है और कुतर्कों की अंगुली पकड़कर चलना सीख रहा है।

हमें इन घटनाओं को पूरी तार्किकता के साथ देखना चाहिए, क्योंकि दलितों-वंचितों का गांव से पलायन मात्र उनका पलायन नहीं है। अपितु यह कुतर्कों द्वारा  उनके लोकतांत्रिक अधिकारों का देश-निकाला है। युवकों-युवतियों का बाहों में बाहें डालकर रेल के आगे कूदना या जहर खाकर आत्महत्या करना कुतर्कों के हाथों एक सुंदर लेकिन विवश तर्क की हत्या नहीं तो और क्या है? ऐसी तमाम हत्याओं पर हर बार संवेदनहीन कुतर्क गंडासी या जेली पर अपनी जीत के झंडे फहराता हुआ चौपाल के चबूतरे पर रावण के ‘हमी-हम’ वाला ठहाका लगाता हुआ देखा जा सकता है।

महिलाओं की स्थिति  में सुधार के तमाम तर्क पुराने स्थापित सामंती कुतर्कों के आगे  हां  जी, हां जी करते देखे जा सकते हैं। उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का तर्क तो हरियाणा में अभी आकार-प्रकार ही ठीक से ग्रहण नहीं कर पा रहा और तो और यहां लड़कियों की उच्च शिक्षा का तर्क भी ठीक  से पांव नहीं जमा पा रहा। इधर लिंगभेद का कुतर्क पूरे  समाज के लिए अभिशाप बनता जा रहा है।

मानव इतिहास में लोकतंत्र एक बहुत बड़ा तर्क है, जो बर्बर युग के रक्तरंजित भालों-तलवारों से मानव जाति को बचाने के लिए गढ़ा गया। लेकिन हरियाणा में यह तर्क जिस तिस कारण से हमेशा खतरे मेें रहा है।

यहां मैंं एक बात और कहना चाहता हूं-आज कुकरमुत्तों की तरह जगह-जगह श्री श्री गुरु जी, श्री श्री माता जी, श्री श्री बहन जी, श्री श्री भाई जी, श्री श्री बापू जी और इनके डेरे-संगठन उग रहे हैं। ये सब भी समाज की तर्कहीनता के ही कड़वे फल हैं। ये भी अपने-अपने हितों  के पोषण के लिए भक्ति के रस में  डूबो कर अलग तरह के कुतर्क हमारे समाज में फैला रहे हैं। ऐसी परिस्थितियों में लेखकों-बुद्धिजीवियासें का दायित्व और अधिक बढ़ जाता है, जिसे शौकिया या पार्ट-टाइम लेखन के जरिए पूरा नहीं किया जा सकता।  आज हरियाणा में एक बड़े नव जागरण की जरूरत है, जिसमें लेखक अपने लेखन की सार्थकता सिद्ध करते हुए अग्रणी और बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।

साभार-साहित्य उत्सव 2008

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