प्रेम विवाह

डा. कामिनी साहिर 

 हमारे यहां मनुष्य को सामाजिक प्राणी कहा गया है, विदेशी भाषा में इसका रूपान्तर सामाजिक पशु है। दोनों मनुष्य की परिभाषा  हेतु पर्यायवाची शब्द हैं परन्तु विदेशी शब्द यथार्थ के अधिक निकट है, उसमें वास्तविकता और विवशता का सतर्क समन्वय है – पशुता प्राकृतिक है और सामाजिकता बुद्धिजन्य, परिस्थितिगत विवशता। हमारे शब्द में वास्तविकता अनावृत नहीं है, ‘मनुष्य प्राणी-जगत् में सर्वश्रेष्ठ है’ इस पूर्व धारणा से आंतकित है।

यही कारण है कि हमारे सब नियम, बन्धन, प्रथाएं, रीतियां विस्फोटक भूमि पर उस वातायान-रहित भवन के समान है जिसमें विस्फोट का विषैला लावा सदैव घुटन बन कर धार्मिक विश्वासों की छाया में रिसता रहता है परन्तु पश्चिम में स्थिति अधिक वैज्ञानिक और इससे भिन्न है-विस्फोट के क्षणों में वातायान स्वयंमेव खुल जाते है और क्षणिक घुटन को निकास का मार्ग मिल जाता है। वहां जब दो पशु किसी सामाजिक समझौते के लिए मिलते है तो उनकी दृष्टि मूल भूमि पर रहती है — सामाजिक आवरण में पाशविक वृतियों के विस्फोट की सम्भावना की अवहेलना नहीं करते, जिससे सामाजिक प्राणी में व्यक्ति सदा सजग रहता है। हमारे यहां ऐसे समझौतों के समय दृष्टि आदर्शों के आकाश की ओर रहती है –पाशविक वृतियों के सहज अस्तित्व को हम भूल जाते है, जिससे व्यक्ति जीवन भर सामाजिक रूढिय़ों के बोझ तले पिसता और रिसता रहता है। स्थिति दोनों ओर निराशाजनक और चिरन्तन विडम्बनापूर्ण है। पारिवारिक और सामाजिक जीवन में वहां उच्छृल्खता तथा उद्दण्डता की सुलगती धूप है, जो फूलों का रस सोख लेती है और हमारे यहां घुटन का कोहरा है, जिसमें फूलों की आंखों से सदा ओस ही छलकती रहती है।

सामाजिक पशुओं के परस्पर सम्बन्धों में सर्वोपरि सम्बन्ध को सामाजिक शब्दावली में विवाह और मनोविज्ञान-शास्त्र में ‘काम- तोषक’ कहा जाता है। प्रस्तुत साहित्यिक विश्लेषण में हम यदि कोई साहित्यिक नाम देना चाहें तो नि:संकोच हो कर ‘बखिया-उधेड़क’ बन्धन कह सकते है। उच्छृंखलता और उद्दण्डता के नव तथा विस्तृत लोक में सम्बन्ध के अपने ही और घुटन की संकीर्ण गलियों में सम्बन्धियों के बखिए उधेड़ते है –वहां व्यक्ति प्रबल है, इसलिए परिवार टूटते है और यहां परिवार सशक्त है, इसलिए व्यक्ति टूटते है। इस टूटने के क्रम को न वहां के प्रेम-विवाह रोक सके है और न ही हमारे यहां के स्वयंवर अथवा घूंघट-धारी रूढिग़्रस्त विवाह।

आज स्वयंवर का युग है न ही आज घूंघट-धारी विवाह युवा-वर्ग को प्रिय है। दोनों की दुकानें उठ  गई है। सब ओर प्रेमविवाह की ही मांग है।

  एक युवा वर्ग तो ऐसा है जो प्रेम-विवाह को – ‘तानाशाह के चेहरे पर समाजवाद का मुखौटा’ कह कर उससे भी दूर भागने लगा है। यहां तक कि घूंघट-धारी-विवाह के विरोधी युवक-युवतियां प्रेम-विवाह को भी एक मनोवैझानिक धोखा समझ कर अविवाहित रहने का ही सकंल्प लेने लगे है। परन्तु यह प्रकृति को झुठलाना है।

 यथार्थ कटु अवश्य होता है परन्तु किसी मधुर आदर्श की लालसा में उस कटुता की अवेहलना करने से एक चिरन्तन कटुता के प्रवेश के लिए जीवन का कोई अनजाना द्वार खुल जाता है। एक बार किसी गोष्ठी में एक विदेशी यथार्थवादी ने विश्व भर की श्रीमतियों और श्रीमानों को आंख और कान को खोल कर एक कड़वी गोली निगल जाने की अनुमति दी थी – उनका सुझाव था कि एक बार यदि सब श्रीमतियों और श्रीमानों को सामाजिक को श्रृंखला से मुक्त कर दिया जाए और फिर एक प्रश्न पूछा जाए –

‘क्यों श्रीमान जी, क्या आप अपनी श्रीमती से  पुन:विवाह करना पसन्द करेंगे?’

‘क्यों मैडम, क्या आप अपने मिया को पुन:वरण करना चाहेगी?’–तो बिना किसी अपवाद के दोनों ओर प्रतिशोध चीत्कार कर उठेगा – नहीं -नहीं – नहीं।

यही युग्म विवाह के पूर्व सपनों के जंगल में लैला और मजनू के समान खाक छाना करते थे। कोई छोटा बच्चा किसी दुकान पर एक खिलौना देखता है तो उसे लेने के लिए मचल उठता है, बाज़ार के मध्य में लेट जाता है। परन्तु कौन नहीं जानता कि दो दिन के पश्चात् वहीं खिलौना बच्चे के हाथों अंग-भंग हो कर कूड़े में पड़ा रहता है। यदि आर्थिक या किसी अन्य विवशता के कारण बच्चे के हाथ उस खिलौने तक नहीं पहुंच सकते जिस तक उसकी आंख सहज ही पहुंच चुकी है तो सपनों के लोक में उसकी कल्पना खिलौने का निर्माण करती है और भावना के आंसू उसे श्रृंगारते हैं। यह बच्चों का खेल समझ कर टालने की बात नहीं है, क्योंकि बच्चे के शारीरिक विकास के साथ-साथ वृत्तियां भी विकसित होती है।

हमारा दुर्भाग्य है कि हम कूड़े  के अंग-भंग खिलौने में तुतलाते यथार्थ को न देख कर काव्य के मादक प्रेम को प्रमाण मान लेते है । काव्य का प्रेम उस भावुक-हृदय की कल्पना का प्रसार है जिसका हाथ विवशता ग्रस्त है और आंख बहुत दूर पड़े दुकान के खिलौने पर है – न तो दृष्टि के स्पर्श से दुकान का खिलौना मैला होता है और न ही खिलौने के उस सूक्ष्म प्रतिबिम्ब को समय की कोई आंधी मैला अथवा पुराना कर सकती है, जिसे अपने में समेट कर दृष्टि स्वयं भी  सिमट गई है। परन्तु प्रेम-विवाह में आंख और हाथ दोनों सांझी हैं और हाथ के स्पर्श से वस्तु मैली होती है तथा समय के प्रहार स्थूल को नष्ट करते है। प्रेम सपना है और विवाह स्थूल जीवन की एक समाजीकृत प्राकृतिक आवश्यकता। आंख खुलने पर जब हम अपने आप को कठोर धरातल पर देखते है तो सपना केवल टूट ही नहीं जाता, वरन् उसके टुकड़े यथार्थ की भूमि पर हमारे हाथ पांव को छलनी भी कर देते है। हम काव्य की भाषा से प्रेम का अभिनन्दन और समर्पण का अभिनय करते है परन्तु व्यावहारिक भूमि पर अधिकारों की मांग करने लगते हैं।

  प्रेम की आवश्यकता विवाह के पश्चात् सुखद जीवन के लिए आवश्यक है परन्तु हम प्रेम पहले कर लेते है और विवाह बाद में। प्रेम आकर्षण है और विवाह प्राप्ति। प्राप्य के प्रति प्राप्ति के क्षणों में यदि आकर्षण आरम्भ हो तो उसके भावी जीवन तथा विकास को चिरंजीव होने का आशीर्वाद भी दिया जा सकता है और आशा भी की जा सकती है। परन्तु यदि उसका बाल्यकाल और यौवन प्राप्ति से पूर्व ही चुक जाए तो वह आशीर्वाद पाकर भी दम तोड़ बैठता है और आकर्षण के आंख बन्द करते ही तलाक के गुरू हथौड़े से मधुर बन्धन की कोमल कडियां तोड़ फोड़ दी जाती है।

आज प्रेम सूत्रधार है और विवाह मूल नाटक जिस के सम्पन्न होते ही रंगमंच पर धूल उडऩे लगती है। विवाह से पूर्व प्रेम एक लालसा है, जिससे ‘अहं’ विकृत होता है। विवाह के पश्चात् प्रेम एक कत्र्तव्य है, जिससे ‘अहं’ को सन्तुलित रख कर हाथ में हाथ डाल कर चलने की प्रेरणा मिलती है। प्रेमियों की मुलाकातों में न तो विश्व शान्ति की समस्या पर कोई वाद-विवाद होता है और न ही परीक्षा की कोई चिन्ता वहां हस्तक्षेप कर सकती है।

 विभागाध्यक्ष(हिन्दी), खालसा कॉलेज फॉर वूमैन सिविल लाईन्ज, लुधियाना

No related posts found...

Advertisements

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.