भक्ति आंदोलन और भक्ति

 डा. सेवा सिंह

डा. सेवा सिंह की भक्ति और भक्ति आंदोलन पर कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, इनके अध्ययन के निष्कर्षों ने भक्ति और भक्ति आंदोलन संबंधी चिंतन को एक नई दिशा प्रदान की है। उनकी आधार प्रकाशन पंचकूला से सद्य प्रकाशित पुस्तक ‘भक्ति और भक्ति आंदोलन’ के निष्कर्षों को यहां प्रस्तुत कर रहे हैं, जो एक नई बहस को जन्म देंगे। आशा है कि इस दृष्टि से पाठक फिर से एक बार भक्ति आंदोलन संबंधी विमर्श पर ध्यान देंगे। – सम्पादक

मुगलों के प्रारंभिक प्रशासनिक दौर के उदीयमान हिंदू साहूकारों के वर्चस्व में, उत्पादनशील श्रेणियों पर नियंत्रण बनाए रखने के उद्देश्य से भक्ति आंदोलन का उद्भव और विकास हुआ है। गोस्वामी तुलसीदास इस भक्ति आंदोलन के प्रतिष्ठापक सूत्रधार हैं।

भक्ति ने वर्गीय हितों के नज़रिए से दो उद्देश्यों की पूर्ति की है-

एक, तथाकथित अधजन्मा शिल्पी बौद्धिकों के प्रतिरोधमूलक स्वतंत्रचेत्ता विचारों को, जिन्हें हम जनविमर्श कहते आ रहे हैं, बड़ी क्रूरता से निरस्त करते हुए उनका भक्तिवादी आत्मसातीकरण किया गया है।

दूसरे, उत्पादनशील श्रेणियों की एकजुटताओं को विखंडित किए रखने के उद्देश्य से हिंदू साहूकार-अभिजन के संरक्षण में लोकप्रिय प्रवक्ता बौद्धिकों के नाम पर जातिवादी भिन्न-भिन्न पंथक धर्मगठन स्थापित किए गए हैं। कबीरादि के जनविमर्शों के भक्तिवादी नवनिर्मित संकलन इन पंथों के धर्मग्रंथ हैं। कबीर अब धर्मगुरु हैं। उन्हें विष्णु के अवतारों की सूची में शामिल कर लिया गया है। तुलसीदास जिन विमर्शों का खंडन करते हुए भक्ति में बाधक बता रहे थे, वे विमर्श अब भक्तिवादी समादृत पोथियों के रूप में, कलियुग के दोषों से मुक्ति का कारगर साधन हो गए हैं।

यहां गौरतलब है कि ब्राह्मणीय विचारधारा के इस परिप्रेक्ष्य में जो भक्ति एक आंदोलन के रूप में प्रासंगिक और कारगर होती गई है, उसके केंद्र में न कृष्ण भक्ति है और न ही रामभक्ति है। इस दौर की रामभक्ति, कृष्ण भक्ति आदि अन्य अनेक भक्ति परंपराएं काव्यरूपों, सांस्कृतिक-धार्मिक रूढ़चर्याओं में ढलकर मंदिर-द्विज-केंद्रित और अकादमिक होती गई हैं, जबकि कबीरादि के नाम पर संकलित वाणियां निरंतर अद्यतन भरपूरता से गतिशील हैं। इन वाणियों की एक और मौखिक परंपराएं कीर्तनीय मंडलियोंं द्वारा संवर्धित, संशोधित होते हुए जनसामान्य में ब्राह्मणीय विचारधारा का प्रचार-प्रसार करती आ रही हंै, दूसरी ओर ये वाणियां, पंथक ग्रंथोंं के समादृत आनुष्ठानिक माध्यमों से जनसामान्य के समाज-सांस्कृतिक धार्मिक जीवन का अभिन्न अंग हो गई हैं। परिणामस्वरूप इन वाणी ग्रंथों की भक्ति के कर्मवाद, आत्मवाद, जन्मना जातिवाद, पितृसत्ता, मोक्ष आदि ब्राह्मणीय विभ्रमों की गिरफ्त में तमाम श्रमजन्य उत्पादनशील, सेवाकर्मी उत्पीडि़त वर्ग शोषण और दमन को शिरोधार्य किए हुए हैं, जबकि कर्मपाश अथवा पुनर्जन्म के अंतर्गत वर्चस्वी वर्ग, उत्पीडऩ के अपराधबोध से मुक्त होकर वर्णधर्मी सोपानात्मक व्यवस्था के कार्यान्वयन को सुरिक्षत किए हुए हैं।

इसप्रकार भक्ति विचारधारा उत्पीड़क और उत्पीडि़त को एक सांझे समन्वय की एकसूत्रता प्रदान करते हुए असंतोष, प्रतिरोध और विद्रोह को कुंठित और आत्मसात करती आ रही है।

कबीरवाणी में दर्ज एक क्रांतिकारी के भक्तिवादी आत्मसातीकरण का एक उदाहरण देखिए-

कबीर कूता राम का, मुतिया मेरा नाउं।
गलै राम की जेवड़ी, जित खैंचे तित जाउं।।
तो तो करै त बाहुड़ों,  दुरि दुरि करै तो जाउं।
ज्यूं हरि राखै त्यूं रहौं, जो देवै सो खाउं।।
यह है ब्राह्मणीय विचारधारा का विमोहक तंत्रजाल।

अनावश्यक विस्तार के दोहराव से संकोच करते हुए, सूत्र रूप में प्रस्तुत अध्ययन के निष्कर्ष हैं-

–  भक्ति ब्राह्मणीय विचारधारा का कारगर संप्रेषणीय उपस्कर है।

–  भक्ति ने पूर्वजन्म अथवा कर्मपाश की अवधारणाओं को पुष्ट करते हुए जन्मना जातिवाद को दैवी प्रामाणिकता प्रदान की है।

– उत्पीडि़त वर्गों के प्रतिरोधों को निरंतर कुंठित किया गया है।

– दासता और दीनता के भक्तिमयी उच्च आदर्श में दमन की यथास्थिति का आत्मसातीकरण हुआ है।

– भक्तिवादी मोक्ष की पारलौकिकताओं में वास्तविक उत्पीडऩ और दमन एक विभ्रममूलक वस्तुस्थिति है। भक्तिवादियों के अनुसार ‘उत्पीडऩ’ गत जन्म के अभिशापों से मुक्त होने की एक प्रक्रिया है। ‘उत्पीडऩ’ के कतई कोई परिस्थितिजन्य यथार्थ कारक नहीं हैं, जिन्हें दूर किया जा सके।

– पुनरुत्पादन की रतिजन्य लैंगिक संबद्धताओं को भक्ति के साधना मार्ग की निर्णायक बाधा सिद्ध करते हुए तमाम उत्पादनशील श्रेणियों के साथ-साथ स्त्री वर्ग पर भी ढेरों अमानवीय अशक्ताएं आरोपित कर दी गई हैं।

– भक्ति के नाम जप, संकीर्तन आदि तमाम उपस्करों के बरक्स मानवीय मूल्य और मानवीय अस्मिताएं गौण होती गई हैं।

– धर्म के रूप में प्रचारित-प्रसारित जिन मिथकीय और अंधविश्वासपूर्ण परंपराओं  का कबीरादि के विमर्शों में निषेध किया जाने लगा था, भक्ति आंदोलन के दौरान उनका पुनरुत्थान हुआ है।

– शोषित-जन में  वर्गीय कार्रवाइयों का जो विवेक उजागर हो रहा था, उस वर्गीय धार को भक्ति का समन्वयवाद और समधर्मभाव कुंद करता आ रहा है।

– हिंदू-सौदागरी-साहूकारों के व्यापारिक और समाज-सांस्कृतिक वर्चस्व की  महत्वाकांक्षाओं के मद्देनजर, तथाकथित कलियुग रूपी ‘मलेच्छ’ (मुगल) सत्ताओं के पतन और लिहाजा, औपनिवेशक स्थापनाओं की कशमकश में भक्ति की उत्प्रेरणाओं के माध्यम से जनसामान्य की शमूलियतें यकीनी कर ली गई थीं।

आखिर, इस संदर्भ में हमें ब्राह्मणीय विचारधारा की अभूतपूर्व क्षमताओं को कभी भूलना नहीं होगा कि किस प्रकार ब्राह्मणीय राज्य-व्यवस्थाओं के उत्पीडऩ से त्रस्त यहां के किसानों, शिल्पियों, तमाम जन समुदायों ने आप्रवासियों की प्रशासनिक स्थापनाओं का मार्ग प्रशस्त कर दिया था, पर अब भक्ति आंदोलन के माध्यम से ब्राह्मणीय विचारधारा में दीक्षित कर दिए जाने पर वे तमाम उत्पीडि़त वर्ग इन सत्ताओं को उखाड़  देने की लड़ाइयों में ब्राह्मणीय वर्चस्व के पक्षधर हो गए थे।

भक्ति और भक्ति आंदोलन, डा. सेवा सिंह

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