दायरे -विनोद सिल्ला

विनोद सिल्ला
कविता
कर लिए कायम
दायरे
सबने अपने-अपने
हो गए आदि
तंग दायरों के
कितना सीमित कर लिया
खुद को सबने
नहीं देखा कभी
दायरों को तोड़ कर
अगर देख लेता
तोड़ कर इनको
तो हो जाता उन्मुक्त
पक्षियों की तरह
जिन्हें नहीं रोक पाते
छोटे-बड़े दायरे
नहीं कर पाती सीमित
इनकी उड़ान को
देशों-प्रदेशों की
या अन्य प्रकार की सीमाएं

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