तरक्की का दौर

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विनोद सिल्ला

कविता

तरक्की के दौर में
गुम हो गया
भाईचारा
टूट गई
स्नेह की तार
व्यक्ति का नाम
छिप गया
सरनेम की आड़ में
पड़ोसी हो गए
प्रतिद्वंद्धी
रिश्तेदार भी हो गए
मौकापरस्त
स्वार्थ की भावना
हो गई बलवती
इस तरक्की के दौर में
जाने क्या-क्या
होना बाकी है

सम्पर्क-. 09728398500

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