वैचारिक बहस को जन्म दे रही है ‘देस हरियाणा’

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प्रोफेसर सुभाष चंद्र

विकास होग्या बहुत खुसी, गामां की तस्वीर बदलगी
भाईचारा भी टूट्या सै, इब माणस की तासीर बदलगी -रामेश्वर गुप्ता

पिछले दस-बारह सालों से ‘हरियाणा नं. 1’ की छवि गढने के लिए हजारों करोड़ रूपये खर्च करके काफी गर्दो-गुबार उड़ाई गई है। स्वर्ण जयंती के कार्यक्रमों की श्रृंखला को भी इस कड़ी में रखा जा सकता है। हजारों करोड़ के खर्च व इतनी ऊर्जा का हरियाणवी समाज को कोई वास्तविक लाभ भी हुआ है या ये ‘कुरड़ी पे कारपेट’ ही साबित हुआ है इसका अनुमान लगाना तो अपने आप में ही एक मेगा प्रोजेक्ट होगा।

संस्कृति जीवन मूल्यों का नाम है न कि स्टेज पर प्रस्तुत मनोरंजक आइटमों का। स्वर्ण जयंती आत्ममंथन का एक अवसर भी था, लेकिन प्रचार-युग में मंथन-विश्लेषण की फुरसत किसे है। विचार रेडीमेड हैं बस उनको लोगों के जहन में उतारने की तरकीबें ईजाद करना ही सृजनात्मक बुलंदी का शिखर है। प्रचार बाजार से आपको अपने अनुकूल ब्रांड-अंबेस्डर छांटना है।

पापुलर मीडिया ने भी पिछले समय में हरियाणा के समाज में रूचि ली है उसका सकारात्मक परिणाम ये रहा कि उसके द्वारा गढ़ा  ‘म्हारी छोरियां छोरां तै कम हैं के’ मुहावरा आम जीवन का हिस्सा बन गया है। यह इस बात का संकेत है कि हरियाणा का समाज बदलाव के लिए कसमसा रहा है और अपनी ही गति से उसमें बदलाव आ रहे हैं।  बदलाव की गति व दिशा का रुख मानवीयता की ओर मोडऩे वाली शक्ति की जरूरत सब महसूस कर रहे हैं ताकि अखबारों में खासी जगह घेर रही इज्जत के नाम पर हत्याओं, दलित-उत्पीडऩ, घरेलू-हिंसा, यौन-उत्पीडऩ, जातिगत विद्वेष की खबरेें कुछ कम हों।

स्वर्ण जयंती वर्ष में डेरा सच्चा सौदा सिरसा प्रमुख के फैसले के बाद हुई आगजनी-हिंसा व जाट आरक्षण की उन्मादी भीड़ की हिंसा-आगजनी मात्र कानून-व्यवस्था का ही मसला नहीं है, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक संकट को दर्शाता है। हरियाणवी समाज के आंतरिक संकटों-अंतर्विरोधों को समझने की जरूरत है।

‘देस हरियाणा’ का 14वां अंक आपके हाथ में है। अभी पत्रिका के बारे में कुछ कहने के लिए बहुत ही कम समय है।  लेकिन अभी तक के कार्य पर संतुष्ट होने के भी कई कारण हैं। पत्रिका का निरंतर समय पर निकलना अपने आप में एक संतोष प्रदान करता है। यद्यपि पत्र आदि लिखकर अपने विचारों से अवगत कराने का रिवाज काफी कम है, लेकिन फोन-फेसबुक आदि के माध्यम से सुधी पाठकों से पत्रिका की विषयवस्तु व सामग्री के संबंध में निरंतर जानकारी मिलती रहती है। इससे यह भी पता चलता है कि पत्रिका न केवल पढ़ी जा रही है, बल्कि एक वैचारिक बहस को भी जन्म दे रही है।

दो हजार की संख्या में पत्रिका छपती है और बहुत से स्कूल-कालेज के अध्यापक भी पाठकों में शामिल हैं जिस कारण कुछ सामग्री की कक्षाओं में सामूहिक पाठन की सूचनाएं भी मिलती हैं। यह भी सच है कि हरियाणा के परंपरागत पाठक वर्ग के बहुत बड़े हिस्से का पत्रिका से नाता नहीं बना है।

अभी तक पांच विशेषांक निकले हंै। प्रवेशांक भाषा विशेषांक था जिसमें जन भाषा व मातृभाषा के विविध पहलुओं को समेटती सामग्री थी। यह अंक काफी सराहा गया था। असल में इस अंक ने ही पत्रिका का स्तर व आगामी दिशा तय कर दी थी। चौथे अंक में आंबेडकर और भगतसिंह पर विशेष सामग्री प्रकाशित की थी इसमें इन महान क्रांतिकारियों के जीवन, कार्य व चिंतन संबंधी सामग्री के अलावा इनके स्वयं के विचार भी इसमें शामिल थे। इस अंक ने शोषण-मुक्त समाज की स्थापना करने वाले दो दार्शनिक-विचारकों के आदर्शों पर चलने वाले आंदोलनकर्ताओं के बीच साझा जमीन तैयार करने का काम किया। अंक 8-9 हरियाणा की स्वर्ण जयंती पर ‘हरियाणा के पचास साल : क्या खोया क्या पाया’ विशेषांक निकाला, जिसमें विभिन्न क्षेत्रों में हरियाणा के विकास की स्थिति, सीमाएं और संभावनाओं का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया गया। दसवां अंक हरियाणा के संदर्भ में भारत विभाजन पर केंद्रित था, इसमें साम्प्रदायिक उन्माद व हिंसा से उत्पन्न त्रासदी और भाईचारे की मिसाल कायम करते चरित्रों व घटनाओं पर मार्मिक रचनाएं थी। अंक-13 ‘कृषि संकट और बदल रहे किसान आंदोलन पर’ वर्तमान कृषि संकट के विभिन्न पहलुओं को समेटे था, जिसकी सराहना सभी तरफ से हुई।

टीम देस हरियाणा ने पत्रिका प्रकाशन के अलावा बहुत महत्वपूर्ण साहित्यिक-सांस्कृतिक आयोजन किए हैं। ‘हरियाणा की संस्कृति के पहचान बिंदू’, ‘हरियाणा के पचास साल: क्या खोया, क्या पाया’, ‘कबीर की विरासत’, ‘प्रेमचंद की प्रासंगिकता’, शहीद भगतसिंह व उधमसिंह के जीवन व विचारधारा पर महत्वपूर्ण व विचारोत्तेजक संगोंष्ठियां आयोजित की हैं। लेखक से रू-ब-रू में अनुराधा बेनीवाल व सोना चौधरी, मुक्तिबोध स्मृति कविता गोष्ठी जैसे अनेक कार्यक्रमों के अलावा इस वर्ष 25 व 26 फरवरी को दो दिन का ‘हरियाणा सृजन उत्सव’ का आयोजन किया, जिसमें हरियाणा के साहित्य, सिनेमा, रंगमंच, कलाएं व हरियाणवी लेखन पर गंभीर मंथन हुआ।

देस हरियाणा की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि हरियाणा की ‘इज्जत के नाम पर हत्या व कन्या भ्रूण हत्या’ वाले राज्य की स्टीरियोटाइप छवि तोड़ रही है। इसी विश्वास के सहारे देस हरियाणा की टीम आगामी दस साल की योजना बना रही है। इसके लिए बौद्धिक-रचनात्मक-सृजनात्मक सहयोग के साथ आर्थिक सहयोग की भी आवश्यकता होगी।  देस हरियाणा पत्रिका अपना स्वरूप ग्रहण करने की कसमसाहट में है। ‘देस हरियाणा’ के 14 अंकों के आधार पर पत्रिका के स्वरूप, सामग्री, दृष्टि की सीमाओं, उपलब्धियों व भविष्य की दिशा के संबंध में आपके सुझाव ही हमारी पूंजी है।

पत्रिका को निकालने के पीछे निश्चित तौर पर कोई दृष्टि तो जरूर होती है जो पत्रिका की सामग्री चयन से लेकर उसे आकार देने व पाठक वर्ग तक तय करती है। असल में यह दृष्टि ही इस समस्त उपक्रम को परस्पर एकमऐक करती है। ‘देस हरियाणा’ के पास भी एक जनपक्षीय दृष्टि तो है, लेकिन किसी किस्म की वैचारिक संकीर्णता व दुराग्रह नहीं है। हमारे लिए न तो कोई विषय अछूत है और न ही कोई विधा या लेखक।

टीम देस हरियाणा शुरु से ही अपने उद्देश्य में स्पष्ट है कि वह लेखकों के लिए पत्रिका का प्रकाशन नहीं कर रही कि कुछ रचनाकार एक दूसरे की रचनाएं पढ़कर एक दूसरे की पीठ थपथपाते रहें। देस हरियाणा के केंद्र में पाठक हैं, और पाठकों को अपने साहित्य व साहित्यकारों से परिचित कराना इसका मकसद है। इसलिए सामग्री चयन में पठनीयता व प्रासंगिकता को हमेशा ही ध्यान में रखा जाता है।

देखने में आया है कि साहित्यकार अपनी रचनाओं में जिस समाज का जीवन उकेरता है उससे जुडऩे या उसमें अपनी लेखकीय पहचान बनाने की बेचैनी नहीं हैं, बल्कि राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय होने की लालसा बढ़ती जा रही है। लेकिन यह भी सच है कि यदि किसी लेखक की अपने ही समाज में पहचान ना हो तो उसके द्वारा ख्याति बटोरने के समस्त उपक्रम एक न एक दिन राख में बदल जाते हैं। जिस समाज से रचनाओं के विषयवस्तु व पात्र हैं उस परिवेश में ही यदि रचना स्थापित न हो तो वह मध्यवर्गीय घरों की दीवार पर सजे प्लास्टिक के फूलों की तरह होगी जिसमें चमक तो होती है पर खुशबू नहीं।

लेकिन यह भी सच है कि हमारे रचनाकारों की जनता में कोई पहचान नहीं है और न ही इसके लिए उनमें कोई बेचैनी है। अधिकांश रचनाकार प्रकाशकों, अकादमियों तथा कुछ पुरस्कृत करने वाली संस्थाओं से ही रचनात्मकता के प्रमाण पत्र बटोरने की चिंता में है। पाठकों से जुडऩे की बजाए वे कथित आलोचकों की प्रशंसात्मक टिप्पणियों से खुश हैं। साहित्यकार स्वयं अपनी शक्ति को नहीं पहचानता और उसकी तरफ पीठ किए हुए है।  साहित्यकारों को अपने रचना कर्म के आत्ममूल्यांकन की महती आवश्यकता है।

‘देस हरियाणा’ के सामने जो सबसे बड़ी समस्या है और कई बार निराश भी करती है वो है डाक-व्यवस्था की। पत्रिका डाक से भेजी जाती है तो यह जरूरी नहीं कि वह पाठक तक पहुंचेगी। न तो हम अपने बूते पर कोई वैकल्पिक व्यवस्था बना सकते हैं और न ही डाक व्यवस्था को सुधार सकते हैं। इस संबंध में लेखकों-पाठकों की ओर से भी कोई खास सहयोग नहीं मिल रहा। ऐसा देखने में आया है कि अपने पड़ौस में भी पहुंचाने में आलस महसूस होता है। ये कहना तो ज्यादती होगी कि प्रतिबद्धता की कमी है, लेकिन आदतों में ही यह शुमार हो गया है। खैर हम इतिहास की खास अवस्था में जी रहे हैं, जिसकी अपना ही स्वभाव व गति है। जनपक्षीय रचनाओं का ‘देस हरियाणा’ में  हमेशा स्वागत है।

इस बार

हरियाणा के साहित्य में कथा साहित्य में इने-गिने महत्वपूर्ण साहित्यकार ही है। सुखद बात ये है कि पिछले दिनों हरियाणा से कुछ महत्वपूर्ण उपन्यास चर्चा में आए हैं और कुछ उपन्यास अभी लिखे जा रहे हैं। इस अंक में विशेषतौर पर प्रदीप नील रचित हरियाणवी उपन्यास ‘जाट कहवै सुण जाटणी’, ज्ञान प्रकाश विवेक रचित ‘डरी हुई लड़की’ तथा रत्नकुमार सांभरिया द्वारा लिखे जा रहे ‘सांप’ उपन्यास का परिचय दे रहे हैं।

साहित्य लिखा जाना ही काफी नहीं, बल्कि उसके उत्तरोतर विकास के लिए उस पर आलोचनात्मक विमर्श भी जरूरी है। इसके लिए ‘खास रचनाकार’  में इस बार तारा पांचाल पर विशेष सामग्री दे रहे हैं उम्मीद है कि इससे उनकी रचनाशीलता के सामथ्र्य को समझने में मदद मिलेगी।

हरियाणा के पाठकों को विश्व साहित्य से परिचित करवाने के लिए ‘सात संमदर पार से’ स्थायी स्तम्भ शुरु कर रहे हैं, जिसमें विश्व की एक श्रेष्ठ कृति का हरियाणवी में अनुवाद होगा। इस बार प्रसिद्ध कथाकार चिनुवा अचीबे की एक कहानी का हरियाणवी अनुवाद प्रस्तुत कर रहे हैं।

 समाज में ऐसे व्यक्तित्व हमेशा ही होते हैं जो अपने जज्बे की शक्ति से  कुछ सकारात्मक प्रयास करने में सफल होते हैं और दूसरों के लिए भी प्रेरणा बनते हैं। यहां रोहतक में प्रवासी बच्चों के लिए नरेश द्वारा संचालित रात के स्कूल के अनुभव दे रहे हैं।

 ‘बीच बहस में’ समाज में अंधश्रद्धा व अंधविश्वास  पर  बूटा सिंह सिरसा और मुकेश के आलेख प्रस्तुत कर रहे हैं। ‘इतिहास के झरोखे’ से प्रसिद्ध इतिहासकार बी एन पांडे का  ‘हिंदू मंदिर और औरंगजेब’ आलेख है जो विभ्रमों को दूर करता है।

नवरत्न पांडेय की कहानी भैतर हजार की भौडिय़ा, कमलेश भारतीय की कहानी, ‘युवा कलम’ में दिनेश हरमन की गजलें, विनोद सिल्ला की कविताएं, पृथ्वी सिंह गोरखपुरिया की ‘डायरी’ से मां के बारे में संस्मरण तथा लोकधारा में रामेश्वरदास गुप्ता व जयसिंह खानक की रागनियों के साथ ‘डपोरशंख’ व ‘बाम्हण अर बाणिया’ लोक कथाएं है।

आशा है कि ये अंक आपको पसंद आयेगा।

(देस हरियाणा -14 का संपादकीय )

डा. सुभाष चंद्र

 

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