धर्म का राज- कर्मजीत कौर किशांवल

कर्मजीत कौर किशांवल की कविताएं

 पंजाबी से अनुवाद परमानंद शास्त्री
                                      (कर्मजीत कौर किंशावल पंजाबी की कवयित्री हैं, गगन दमामे दी ताल कविता संग्रह प्रकाशित हुआ है। इनकी कविताएं दलित जीवन के यथार्थपरक चित्र उकेरती हुई सामाजिक न्याय के संघर्ष का पक्ष निर्माण कर रही हैं। पंजाबी से अनुवाद किया है परमानंद शास्त्री जी ने। उन्होंने पंजाबी से हिंदी में गुरदियाल सिंह के उपन्यास और गुरशरण सिंह के नाटकों का अनुवाद किया है। साहित्यिक-सांस्कृतिक क्षेत्र में अपनी सक्रियता से निरंतर सांस्कृतिक ऊर्जा निर्माण कर रहे हैं – सं.)

 

धर्म का राज

क्या करोगे पूछकर
कि
बनी हूँ मैं
शाम कौर से शकीना
या
शकीना से शाम कौर ?
क्या फर्क पड़ता है ?
बस नहीं भूलता मुझे
कि
‘वह ‘ जिस दरिन्दे ने
मेरा नामकरण किया था
उसके एक हाथ में था
लहू से लथपथ खंजर
…और
… और दूसरे हाथ से
उसने मुझे
कतरनों की गुडिया की तरह
कंधे पर उठा लिया था ।
मुझे नहीं मालूम
वह किस धर्म का
रहनुमा था
मुझे तो
उसकी आँखों में
भूखे भेडिये-सा
आतंक दिखा था बस ।
नहीं समझ सकी मैं
कि
‘क्या ‘ दुश्मनी थी
और ‘क्यों ‘दुश्मनी थी उसकी
मेरे मां-बाप से
भाइयों के धर्म से
(जिन्हें उसने एक ही साँस में काट फेंका था )
…और मुझे
मुझे
संभाल लिया था
ज़रूरी सामान की तरह ।
बनाकर मुझे
शकीना से शामकौर
या
शाम कौर  से शकीना
कर लिया था उसने
अपने रब्ब की नजर में
कौनसा धर्म -कारज सम्पन्न ?

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