गाँवन की भिनसार

डॉ. निधि अग्रवाल

( गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश)  में जन्म। बचपन से पढने और लिखने का शौक। एम बी बी एस के बाद पैथोलॉजी में परास्नातक की शिक्षा। वर्तमान में झांसी (उत्तर ) में निजी रूप से कार्यरत। कविताएँ, कहनियाँ और सामाजिक विषयों पर ब्लॉग आदि का लेखन)

 

नहीं लड़ती घड़ी की सुइयों से
गाँवन की भिनसार
चिरैया की चिचयान पर थिरकती
इत्मीनान के सूरज संग उगती हैं
गाँवन  की भिनसार!

दबे पांव उतर नीम से
चली आती स्नेहिल किरण
चौंतरा पर दातुन ले बैठी
कक्को के पास ,
कर उनसे कुछ चुहल
ले आती एक स्मित
उनके पोपले चेहरे पर
और बरसाती है स्नेह अपार
अपनेपन के सूरज संग उगती हैं
गाँवन  की भिनसार!

लांघ जाती हैं बखरी और दल्लान
पूछती हैं कुशल-क्षेम
चौका में औरों की ख्वाहिशों के
व्यंजनों में बघार लगाती
अपनी इच्छाओं को
सिल लुडिया मध्य दबा ,बाबा को
कलेऊ कराती गृहणी से
और तुरुप देती है उसकी
उधड़ी उम्मीद की
फरिया के कुछ किनारे
कर जाती है
नव ऊर्जा का संचार
आशा के सूरज संग उगती हैं
गाँवन की भिनसार!

बांट लेती हैं बोझ
नाजुक कंधों पर लदे बस्ते  का
और थाम वक्त की उंगली
भर लेने देती हैं उन्हें कुछ
निश्चिंत से कुलांचे
बचाए रखती हैं उनकी नजर में
अल्हड़ बचपन का विश्वास
चाचा-भाई नहीं दिखते उन्हें
अपनी अस्मिता के भक्षक
नही बिखराती कलुषता के हथियार
संस्कारों के सूरज संग उगती हैं
गाँवन की भिनसार!

नन्ना के कांधे चढ़ आल्हा गुनगुनाती
पहुंच जाती हैं खेतों में
और पसर गेहूं की बालियन पर
बिखरा देती हैं सुनहरी आभा
करती शीतल पिता के हृदय के
चिंताओं के अंगार
दर्प के सूरज संग उगती हैं
गाँवन की भिनसार!

दोऊबिरियाँ में गोधूलि संग
करती हैं अठखेलियां
सिमट चौपालों की गप्पों में
घिस्सा का हिस्सा बन जाती
अहसासों के दीप जलाती
मन के अनचीन्हे कोनों को
चुपके से चिन्हित कर जाती
मुंदी आँखों में जगती रात भर
कभी न माने हार
जिजीविषा के सूरज संग उगती हैं
गाँवन की भिनसार!

(चिरैया: चिड़िया,  चिचयान: कलरव,  बघरी: आंगन, चौंतरा  :  चबूतरा, दल्लान: दालान सिल लुडिया: सिल बट्टा,  कलेऊ: सुबह का नाश्ता, फरिया: चुनरी , दोऊबिरियाँ : साँझ,  घिस्सा: तम्बाकू घिसना,  आल्हा: लोक गीत, कक्को: काकी)

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