लिंग-संवेदी भाषा की ओर एक कदम

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डा. सुभाष चंद्र

अपने अल्फ़ाज पर नज़र रक्खो,
इतनी बेबाक ग़ुफ्तगू न करो,
जिनकी क़ायम है झूठ पर अज़मत,
सच कभी उनके रूबरू न करो। – बलबीर सिंह राठी

आजकल संवेदनशील स्वतंत्रचेता नागरिक ये महसूस कर रहे हैं कि समाज का ध्रुवीकरण और घोर विभाजन हो रहा है। व्यक्तियों की पसंद-नापसंद और राजनीतिक दलों के प्रति पक्षधरता कट्टरता का रूप लेती जा रही है। परिणामस्वरुप सामाजिक-राजनीतिक-धार्मिक सवालों पर सांझे विमर्श की जगह सिकुड़ती जा रही है। मीडिया की चौबीसों घंटे की चिख-चिख लोगों के मुद्दों और चेतना को अधिग्रहित करके विभ्रम का वातावरण निर्मित कर रही है। लगता है विभ्रम का स्मॉग छाया हुआ है। सोशल मीडिया भी व्यक्ति को उसके दायरे तक सीमित रखने की रणनीति के तहत काम करता है। सोशल मीडिया व्यक्ति को वही विचार, व्यक्ति अथवा वस्तुएं दिखाता है जो व्यक्ति देखना चाहता है। इस तरह एक ही तरह के विचार, वस्तुएं, व्यक्तियों के घिरे रहने से एक खोल उसके इर्द-गिर्द बन जाता है। धीरे-धीरे पसंद-नापसंद के विकल्प सीमित होने लगते हैं। साहित्य और संस्कृति के दायरे भी इससे अछूते नहीं हैं।

इसके बावजूद कभी-कभी ऐसे जन-आंदोलन भी उठ खड़े होते हैं कि समाज की बौद्धिक ऊर्जा एक मुद्दे पर संकेंद्रित हो जाती है। पिछले दिनों हरियाणा में रोडवेज कर्मचारियों की हड़ताल ने समाज का ध्यान विकास-नीतियों की ओर आकर्षित किया। कर्मचारियों की हड़तालों के प्रति आमतौर पर उदासीन रहने वाली जनता की सहानुभूति और सहयोग भी इस हड़ताल को मिला। यह हड़ताल अपने वेतन-भत्तों में बढ़ोतरी से इतर रोड़वेज के निजीकरण को रोकने के लिए थी। सार्वजनिक सेवाओं के निजीकरण के अनुभव बताते हैं कि उससे लोगों का भला तो नहीं ही हुआ हां कुछ राजनेताओं और पूंजीपतियों के निरंतर मुनाफे का रास्ता इससे जरूर खुला है। स्वाभाविक है कि सीमित दायरे से जुड़ी हड़ताल का असर तो सीमित दायरे तक ही होगा, लेकिन इसने निजीकरण बनाम सरकारीकरण की बहस को फिर से चर्चा में ला दिया है। जो सत्ता के दमन को झेलते हुए साहस के साथ इसमें शामिल हुए वे प्रशंसा के पात्र हैं।

इसी तरह मी टू नामक आंदोलन ने भी समाज को प्रभावित किया है। मी टू की शुरुआत अमेरिका से हुई थी। अमेरिका में कार्यरत इतालवी मूल की अभिनेत्री आसिया अर्जेंटो ने मशहूर फिल्मकार हार्वी वेंस्टिन पर आरोप लगा कर इसकी शुरुआत की थी। यह अभियान थोड़ी देरी से भारत पहुंचा है।

यद्यपि महिला साहित्यकारों ने अपनी आत्मकथाओं में इस संदर्भ में विस्तार से लिखा है। इस लेखन ने साहित्यिक सैद्धांतिकी और विमर्श पर तो असर डाला है, लेकिन साहित्य के पठन-पाठन का दायरा सीमित है इसलिए ये रचनाएं बृहतर समाज में चर्चा का विषय नहीं बन पाई थी।  मीटू की शुरुआत फिल्मी दुनिया और मीडिया से हुई है, व्यापक समाज से जुड़ाव  के कारण इसकी प्रभाव क्षमता भी व्यापक है।

मी टू एक ऐसा मंच बन गया है जिस पर महिलाएं यौन-दुर्व्यवहार को खुलकर बता रही हैं। मीटू ने जहां महिलाओं को आप बीती कहानियां कहने का अवसर दिया है, वहीं पुरुष प्रधान माहौल में पले-बढ़े लोगों को भी व्यवहार में घुसे लैंगिक-सामंती-यौनिक किटाणुओं को चिह्नने का अवसर दिया है। साथ ही दैहिक-आत्मिक-भावनात्मक संबंधों में जाने-अनजाने में हुए अगरिमापूर्ण व्यवहार के प्रति खेद प्रकट करने का अवसर भी दिया।

राजनेताओं की यौन-संबंधों के बारे में सी.डी. तो पहले भी आती ही रही हैं, लेकिन उनका मकसद सामाजिक बदलाव, विकृति अथवा शोषण को उजागर करना नहीं, बल्कि किसी राजनेता के कैरियर को चौपट करने तक सीमित था। मीटू में फिल्म-जगत और पत्रकारिता के क्षेत्र की जो कहानियां सामने आई हैं उनके बीच सच-झूठ की पहचान तो जांच का विषय है। इसमें सकारात्मक बात यह है कि पारिवारिक-सामाजिक बातचीत के दायरों से बाहर इस विषय पर अब ड्राइंग-रूम व डाइनिंग-टेबल पर सहजता से बातें होने लगी हैं और लिंग-संवेदी भाषा उसके लिए निर्मित हो रही है।

अभी तक इस विषय पर रहस्यमयी-अस्पष्ट और फुसफुसाहटी भाषा में ही संवाद होता था। इस भाषा की अपनी सीमाएं होती हैं जिसमें अर्थ निकालने का दायित्व कहने वाले से अधिक सुनने वाले पर होता है। विंडो वाचिंग टाइप इस भाषा में दिखता तो सच्चाई का सिर्फ एक टुकड़ा ही है, लेकिन श्रोता के पूर्वाग्रहों का आख्यान और कोण ही उसे अर्थ प्रदान करता है।

सही है कि समाज का बहुत ही छोटा सा वर्ग इसमें शामिल है, दलितों-वंचितों का बहुत बड़ा वर्ग शताब्दियों से जिसका शोषण हो रहा है वो अभी इसमें शामिल नहीं है। रेखांकित करने योग्य बात ये है कि यह छोटा सा वर्ग समस्त समाज को प्रभावित करता है। उम्मीद है कि यह कुछ घटनाओं, मुकद्मों और कुछ लोगों की पोल खोलने तक ही ये सीमित नहीं रहेगा। भविष्य में  इस विषय पर फिल्में, टी.वी. धारावाहिक आदि दिखेंगे तो समाज पर गुणात्मक प्रभाव पड़ेगा ही।

महिलाएं अपनी बात कह रही हैं, इस पर दो तरह की आत्यंतिक प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। एक तो ‘बासी कढ़ी में उबाल’ ‘बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम’ ‘नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली’ जैसे मुहावरे उछालकर खिल्ली उड़ाने और चटखारे लेकर मनोरंजन का हिस्सा बनाने की। दूसरी  भावुक किस्म के तत-भड़कों की जो आरोपी का सार्वजनिक तौर पर पिटाई-अपमान-तिरस्कार से लेकर गोली से उड़ा देने तक की वकालत कर रहे हैं। इन दोनों को ही उचित नहीं ठहराया जा सकता।

मुझे याद आ रहा है दस-पंद्रह साल पहले मृत्यु-दंड के खिलाफ जुलूसों-धरनों-प्रदर्शनों में खूब बढ़-चढ़कर भाग लेते थे और तभी किसी घटना पर आरोपी के लिए फांसी की सजा मांगते हम जूलूस निकाल रहे होते। समय के साथ ही समझ में आया कि जिस तरह लोकतंत्र में विपक्ष की अहम भूमिका होती है सही भावना से उसे सुने जाने में ही लोकतंत्र मर्यादित रहता है ठीक उसी तरह आरोपी का पक्ष सुने जाने से न्यायिक-प्रक्रिया की पवित्रता व साख बची रहती है। तालिबानी न्याय कभी भी सामाजिक न्याय का आदर्श नहीं हो सकता।

मी टू प्रकरण से एक बात अच्छी हो रही है कि यौनिकता के साथ चिपकी नैतिक और इज्जत वगैरह की धारणाएं उससे दूर हो रही हैं, ये उसकी स्वाभाविकता को ही समाप्त कर रही थी।

मानव-देह के साथ ही मानव जीवन है। अपनी देह पर खुद का अधिकार स्वतंत्र मनुष्य की पहली शर्त है। मनुवादी-पितृसत्ता के व्रत व आदर्श नारी की अवधारणा आदि तमाम उपक्रम नारी-देह को नियंत्रित करने के लिए हैं। मी टू इस दिशा में एक कदम तो है, लेकिन पितृसत्ता के चौखटे को चुनौती प्रदान नहीं करता। इसलिए यह संभावनाशील अभियान भी कुछ देर अपनी चमक दिखाकर धूमिल पड़ जाने के लिए अभिशप्त है।

विस्फोटक ढंग से तो नहीं, लेकिन चुपचाप सामाजिक बदलाव की धारा निरंतर  बह रही है। पिछले कुछ समय में महिला-संबंधी कुछ ऐतिहासिक कदम उठाए गए हैं जिनकी ओर संकेत करना यहां अप्रासंगिक नहीं होगा। मसलन तीन तलाक, व्यभिचार और सबरीमाला मंदिर में हर आयु की महिला के प्रवेश के मामले। इन व्यापक सामाजिक बदलाव के सवालों के प्रति उदासीनता ही दिखाई देती है।

दो सौ साल पहले राजाराम मोहन राय ने जिस जज़्बे से सामाजिक बदलाव की शुरुआत की थी और जोतिबा फुले-सावित्रीबाई फुले ने जिस चेतना से उसे ठोस आकार दिया था उससे ही भारतीय समाज में कुछ उल्लेखनीय बदलाव संभव है।

इस अंक में कहानी, कविताओं, ग़ज़लों, अनुवाद के साथ साथ साहित्यिक-सामाजिक-सांस्कृतिक विषयों पर आलेख हैं।  उम्मीद है कि जनधर्मी विमर्श को आगे बढ़ाने वाली सामग्री समेटे ये अंक आपको पसंद आएगा।

आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है।

(देस हरियाणा 19-20 का संपादकीय)

सुभाष चंद्र

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