मार्क्स के जन्म को दो सौ साल पूरे हो चले – अमन वासिष्ठ

(मार्क्स के जन्म को दो सौ साल हो चुके हैं, मार्क्स ने समाज को नए ढंग से व्याख्यायित किया। द्वंद्वात्मक भौतिकवाद, ऐतिहासिक भौतिकवाद, वर्ग-संघर्ष के सिद्धांतों को स्थापित किया। मार्क्सवादी विचारधारा ने साहित्य-कलाओं को भी गहरे से प्रभावित किया है। मार्क्स के विचारों ने दुनिया को समझने में क्रांतिकारी परिवर्तन किया। इसके परिणामस्वरुप दुनिया में नई किस्म की व्यवस्थाएं भी स्थापित हुई। मार्क्स के चिंतन को अनेक दार्शनिकों, चिंतकों, राजनीतिक नेताओं ने समृद्ध किया है। वर्तमान में मार्क्स का दर्शन अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए है और इसमें निरंतर विकास हो रहा है।

भारत के बारे में मार्क्स ने भी लिखा था और मार्क्सवादियों ने भी भारतीय समाज के हर पहलू को व्याख्यायित किया। मार्क्स की विचारधारा के असली वारिस होने का दावा करने वाले बीसियों राजनीतिक दल भारत में सक्रिय हैं और बीसियों किस्म के मार्क्सवादी भारतीय समाज को निरंतर व्याख्यायित कर रहे हैं। मार्क्सवादी मूल के संगठनों-दलों-बुद्धिजीवियों में तीखी बहस है तो मार्क्सवाद से बाहर के दायरे में मार्क्सवाद के प्रति अजीब किस्म की धारणाएं और संदेह हैं। भारतीय संदर्भ में मार्क्सवाद को लेकर प्रस्तुत है अमन वासिष्ठ की टिप्पणी जो स्वाभाविक है कि कई सवालों की ओर संकेत करती है। इस पर आपके विचार आंमत्रित हैं।- सं

बीते वक़्त में मार्क्स और उनकी विचार परम्परा की याद एकाएक बढ़ गयी। पिछले साल रूस में हुई क्रान्ति के सौ बरस पूरे हुए और इसके साथ ही मार्क्स के महाग्रंथ ‘कैपिटल’ प्रकाशन के डेढ़ सौ साल। वहीं इस साल मार्क्स के जन्म को दो सौ साल पूरे हो चले। ऐसे मौके समय का एक चक्र पूरा होने के साथ-२ कुछ बात करने की जगह भी बनाते ही हैं।

मार्क्स ‘प्रतिरोध’ के प्रतीक रहे हैं। महज़ सीधे-सपाट शोरगुल से भरे ‘विरोध’ के नहीं – बल्कि ‘प्रतिरोध’ के ! मार्क्स के नाम से प्रसिद्ध विचार परम्परा जिसे हम ‘मार्क्सवाद’ कहा करते हैं – वो अब ‘मार्क्स’ नामक व्यक्ति से बहुत आगे निकल आयी है। यूरोप-अमेरिका-अफ्रीका-रूस और दक्षिण एशिया स्थित भारत के न जाने कितने ही मनीषियों ने गहन परिश्रम से अब ‘मार्क्सवाद’ को बहुत विस्तार दे दिया है। हालांकि ये सही है कि आज भी मार्क्सवाद की पॉप्युलर छवियाँ तो ज़्यादातर पुरानी ही हैं। जैसे – हड़ताल, चक्का-जाम तालाबन्दी या फिर कसी-भिंची मुट्ठियाँ लहराता कोई आक्रोशपूर्ण एक्टिविस्ट। लेकिन मार्क्सवाद के फ्रेम-भीतर संस्कृति-आलोचना मानव-इतिहास समाजशास्त्र और न जाने कितने विषयों पर गंभीर कार्य भी तो हुआ ही है। आलोचना में जॉर्ज लुकाच और संस्कृति-चिंतन में थियोडोर एडोर्नो – ग्राम्शी या फिर ऐजाज़ अहमद से लेकर पुराने वक़्त में राहुल सांकृत्यायन और आचार्य नरेंद्र देव सरीखे भारतीय विद्वान भी !

मार्क्सवाद के यूँ तो न जाने कितने ही अवदान गिनाये जा सकते हों लेकिन उनमें एक दो पर फिलहाल बात। पहली ‘कंट्राडिक्शन’ यानी ‘अंतर्विरोध’ की समझ। मार्क्सवाद ने किसी सामाजिक प्रक्रिया या फिर आर्थिक प्रक्रिया में ‘अंतर्विरोधों’ की पहचान को केंद्र में ला खड़ा किया। इसे एक लोकप्रिय वैचारिक औजार बनाने का श्रेय  मार्क्स को ही है।

भारत में गांधीजी ने समाज की गति में और ‘ज़िन्दगी’ में भी ‘सामंजस्य’ को बुनियादी चीज़ माना था। यही वजह है कि मार्क्स की जो आवाज़ है वो कई बार गांधीजी की आवाज़ की तुलना में बहुत आक्रोशपूर्ण दिखाई पड़ती है। इस सबके बावजूद सभ्यता-संस्कृति संबंधी विचार के इलाक़ों में मार्क्सवादी लगातार गांधी को और गांधीवादी मार्क्स को अपने करीब पा रहे हैं। बहुत से विचारकों के नाम गिनाये जा सकते हैं लेकिन उस नाम-सूची में न जाकर इतना भर कहना काफ़ी होगा कि भारतीय मार्क्सवाद में गांधीजी को लेकर जो तल्ख़ी रही है वह अब लगभग समाप्त हो चली है और गाँधीवाद महज़ ‘चरखाशास्त्र’ न रहकर वर्त्तमान सभ्यता की आलोचना सिखाने का एक ज़रूरी स्रोत बना है।

मार्क्स को लेकर हमारे भारत में एक आलोचना यह भी रही कि उनसे जाति के बारे में कोई बड़ी समझ हासिल नहीं होती। जाति की समझ के लिए आम्बेडकर के पास ही जाना होता है। खुद आम्बेडकर का मार्क्सवाद को लेकर जो दृष्टिकोण था वह एक सीधी लाइन में नहीं चलता। कहीं-२ वो मार्क्सवाद के कटु आलोचक नज़र आते हैं तो कभी हल्की-फ़ुल्की सौहार्द की खिड़की भी खुल जाती है। मार्क्सवादियों में भी आम्बेडकर को लेकर भारी फसाद रहा है। संसदीय-चुनावी-मार्क्सवाद अब जहाँ ज़्यादातर आम्बेडकर को लेकर ‘स्वीकार भाव’ से भरा दिखाई पड़ता है वहीं एक हिस्सा आज भी यही मानता है कि आम्बेडकर का मार्क्स की विचारधाराओं को कोई मेल सम्भव नहीं ! हालांकि किशन पटनायक और मधु लिमये जैसे समाजवादियों की धारा बाबा साहेब को बहुत सम्मान से देखती रही है। आगे आने वाले वक़्त में यह देखना दिलचस्प होगा कि भारत में मार्क्सवादी चिंतक जाति को लेकर कैसी समझ विकसित कर पाते हैं। इतना तो तय है कि निरे ‘आर्थिक सवालों’ के रास्ते भारत में टिकना मुश्किल ही होगा।

आज जबकि पूरे भारत की चुनावी राजनीति में जाति पूरी तरह छायी हुई है तो उसपर कोई अलग समझ विकसित करनी ही पड़ेगी। ये सब अब दीख भी रहा है। जाति-प्रश्न पर मार्क्सवादी धाराओं में जो लगातार नए-२ विचार एप्रोच और भरपूर अकादमिक प्रकाशन अभी आ रहे हैं सो इतना साबित करने के लिए काफ़ी हैं कि जाति संबंधी जटिलताओं की धमक उनके यहाँ देर से ही सही लेकिन पहुँच गई। है ‘आइडेंटिटी’ यानी पहचान-अस्मिता के सवालों पर मार्क्सवाद बहुत असहज रहा है। उसके अनुसार ये सब कामगार की ‘श्रम-चेतना’ को कुन्द करने के झंझट हैं। लेकिन वो सब लगातार तीख़े से तीख़ा होता ही गया। ‘अस्मिता’ बहुत ताकतवर तत्त्व है और वो हमारा इतनी आसानी से पीछा छोड़ने वाला नहीं। 

आज से क़रीब नब्बे साल पहले हिन्दू पंच नामक पत्र का ‘बलिदान अंक’ छपा था। इस अंक में शिवि दधीचि से आरम्भ करके जटायु-सीता और फ़िर महाराणा प्रताप – शिवाजी सरीखे न जाने कितने ही बलिदानी वीरों का ज़िक्र हुआ। और इसी कड़ी में इन सबके साथ एक आलेख छपा – साम्यवाद के प्रवर्तक महर्षि कार्ल मार्क्स ! दिलचस्प है कि इस लम्बे आलेख के अंत में मार्क्स को ‘योगियों और ऋषियों’ में सर्वश्रेष्ठ कहा गया। फिर आगे लेनिन को ‘बोल्शेविक आचार्य महात्मा लेनिन’ कहा गया। खैर , इस पर बहुत कुछ कहा जा सकता है लेकिन फिलहाल इतना ही संकेत काफी होगा कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान धार्मिक लोगों के बीच भी इनकी क्या प्रतिष्ठा रही। दुखद ही है कि मार्क्स के मानवता-दर्शन को नितान्त ‘धर्मद्रोही’ के रूप में चित्रित किया गया। इसमें कुछ न कुछ योगदान तो मार्क्सवादियों का भी है जिन्होंने मार्क्सवाद के ‘ध्वंसात्मक’ पक्ष को ही तरजीह दी। क्या आचार्य नरेंद्र देव जैसे मार्क्सवादी उसी वक़्त पर ‘बौद्ध धर्म दर्शन’ नहीं लिख रहे थे। राहुल सांकृत्यायन बौद्ध ग्रंथों और मार्क्सवाद पर समानांतर कार्य कर रहे थे। किसान नेता स्वामी सहजानन्द सरस्वती गीता के सहारे मार्क्सवाद को नए सिरे से समझाने में यत्न में लगे।

जर्मनी में फ्रैंकफर्ट स्कूल से जुड़े मार्क्सवादियों ने हमारी चेतना और अंतर्मन की गहराईयों को मार्क्सवाद के साथ जोड़ दिया। वाल्टर बेंजामिन का मार्क्सवाद और धर्म-संस्कृति चेतना पर एक साथ काम एक मिसाल रहा। कितने उदाहरण गिनाएं !

मोटी बात ये है कि क्या हम हर सिद्धांत को स्थूल बनाकर छोड़ देना चाहते हैं या उसका सूक्ष्म विस्तार भी चाहते हैं। अगर हम पुराने निष्कर्षों को दोहराना भर चाहें तो कौन रोक सकता है। लेकिन पुराने निष्कर्षों को दोहरा भर देना ‘विज्ञान’ तो नहीं कहलाता न! अगर कोई मार्क्स और उनके काम को महज़ ‘आर्थिकता’ तक महदूद कर देना चाहे तो उसे क्या कहा जाए ! मार्क्स की विचारधारा एकमात्र दरवाज़ा नहीं है जहाँ से हम वर्तमान संकट से बाहर निकलेंगे। लेकिन इसको नज़रअंदाज़ करके वैचारिक दरिद्रता ही हाथ लगेगी।       

 संपर्क- 9729482329

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