लोक देवता गुग्गा पीर का बदलता स्वरूप

सुरेंद्रपाल सिंह 

(राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के कुछ इलाकों में गुग्गा पीर की विशेष मान्यता है। यह लोकनायक सांझी संस्कृति का विशिष्ट उदाहरण है। यहां हिंदू-मुस्लिम धर्म के लोग बराबर सहभागिता करते रहे हैं। गुग्गा का संबंध पौराणिक-शास्त्रीय कथाओं से नहीं, बल्कि ब्राह्मणी परंपराओं व मान्यताओं के चौखटे से बाहर हुआ है। लेकिन बदली परिस्थितियों इसका ब्राह्मणीकरण हो रहा है। इस संबंध में प्रस्तुत है सुरेंद्रपाल सिंह का शोधपूर्ण लेख। 

सामाजिक कार्यकर्ता सुरेंद्र पाल सिंह बैंक में अधिकारी रहे। लोकधर्मी परंपराओं में विशेष रूचि रखते हैं। स्वैच्छिक सेवानिवृति के बाद विभिन्न संगठनों और मंचों के माध्यम से सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय हैं। अपना पूरा समय सामाजिक कार्यों व लेखन में निवेश कर रहे हैं। देस हरियाणा पत्रिका के सलाहकार हैं  – सं.)

राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के कुछ इलाकों में गुग्गा पीर एक लोकप्रिय लोकदेवता है जिसके नाम पर भाद्रपद की नवमी को लाखों नर नारी दूर दराज से राजस्थान के हनुमानगढ़ जिला में भादरा के नजदीक गुग्गा मैडी नामक स्थान पर मेले में आकर धोक मारते हैं। इसके अलावा इन इलाक़ों में करीब करीब प्रत्येक गाँव या शहर में एकाधिक गुग्गा मैडी पाई जाती है। उल्लेखनीय है कि अधिकतम गुग्गा मैडी की इमारतों के चारों कोनों पर एक एक मीनार बनी होती है जो मैडी को एक इस्लामिक स्टाइल का रूप देती हैं। मैडी के अंदर या तो मजार बनी होती है या घोड़े पर सवार हाथ में भाला उठाए हुए जाहर वीर गुग्गा की मूर्ति होती है।

गुग्गा में आस्था रखने वाले हिन्दू भी हैं और मुसलमान भी। सभी जातियों के लोग गुग्गा पीर में आस्था रखते हुए दिखाई दे जाएंगे। लेकिन सामाजिक रूप से निम्नतम स्तर की जातियों के कुछ सदस्य गुग्गा नवमी से कुछ समय पहले ही विशेष रूप से सक्रिय दिखाई देने लगते हैं। वे गुग्गा का निशान लेकर डेरू बजाते हुए एक खास अंदाज में झूमते हुए गुग्गा के जीवन से जुड़े भजन गाते हैं। उनमे से कुछ एक लोहे की सांकल से बने हुए एक गुच्छे से अपने ही शरीर पर ताजिये की माफिक जोर जोर से चोट मारते हैं लेकिन उन्हें दर्द का कोई एहसास नहीं होता। उन्हें समैये के नाम से जाना जाता है और वे गीत गाते हुए घर घर जाकर भिक्षा मांगते हैं। सभी घरों से उनको इत्मीनान से भिक्षा मिल जाती है। गुगा मैडी पर मत्था टेकने के बाद या गुग्गा के नाम रतजगा के दौरान कुछ एक भगतों में हिस्ट्रीया के दौरे की तरह शरीर में विशेष कम्पन, अबूझ सी विचित्र आवाजें, अकड़न जैसा कुछ घटता है जिसके बारे में यह कहा जाता है कि फलाने भगत में गुग्गा उतर आया है यानी उसमे गुग्गा की शक्ति सवार हो गई है।

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किसी धार्मिक ग्रन्थ या शास्त्र में गुग्गा पीर का कोई ज़िक्र नही आता है और ना ही उसकी पूजा का शास्त्रीय विधान उपलब्ध है । फिर भी सदियों से जाहिर (हमेशा और हर जगह) के रूप में गुग्गा पीर लोकमानस का सतत हिस्सा रहा है। अवश्य ही लोकजीवन की इस सामाजिक-सांस्कृतिक-धार्मिक प्रक्रिया को समझने के लिए मानव मस्तिष्क की आदिम अन्तश्चेतना , सामाजिक-धार्मिक प्रतीकों, अचेतन मन की उड़ानों को और काल्पनिक अवधारणाओं को बूझ पाना समाजशास्त्रीय, मनोवाज्ञानिक अध्ययन की एक बड़ी चुनौती है।

गुग्गा पीर की मूल कहानी की ओर चला जाए। राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में  के राजा जेवर को अपनी दोनों रानियों बाछल और काछ्ल (सगी बहनें) से कोई संतान नहीं है। निराश होकर रानी बाछल नाथ जोगी गुरु गोरखनाथ के समक्ष पुत्र की कामना रखती है। गुरु गोरखनाथ एक सुबह उसे बुलाते हैं लेकिन इस बात का बाछल की छोटी बहन काछ्ल को पता लगने पर वह बाछल जैसे वस्त्र पहन कर बाछल से पहले ही गोरखनाथ से जौ के दो दानें ले आती है। जब बाछल वहाँ पहुँचती है तो उसे निराशा ही हाथ लगती है क्योंकि गुरु गोरख नाथ तो अपना आशीर्वाद पहले ही दे चुके हैं। अनेक अनुनय विनय के बाद गुरु गोरख नाथ पाताल लोक से नागों के राजा वासुकी के जहर की जुगाली को गुगल के रूप में बाछल को देते हैं । इस प्रकार अब दोनों बहनें गर्भवती हो जाती हैं। राजा जेवर की बहन सबीर दे को जब पूरी कहानी का पता लगता है तो वह रानी बाछल पर जोगी के साथ व्यभिचार का लांछन लगा कर उसे अपने पैतृक परिवार में भेजने का राजा जेवर से आदेश दिलवा देती है। रास्ते में एक सांप गर्भ में पल रहे गुग्गा को डसने का प्रयास करता है लेकिन असफल होने पर उनके बैलों की जोड़ी को डस लेता है और इस प्रकार दोनों बैल मर जाते हैं। अब गुग्गा अपनी चमत्कारिक शक्ति से दोनों बैलों को जीवित कर देता है और और अपनी गर्भवती माँ को वापस ददरेवा लौटने को कहता है। वापस आकर जब गुग्गा का जन्म होता है तो सारा महल अपने आप ही रोशन हो उठता है।

उधर काछ्ल को अरजन और सरजन नाम के दो पुत्र होते हैं। जवान होने पर गुग्गा का रिश्ता कारू देश/ गोर बंगला/संगल द्वीप की राजकुमारी सीरियल से होता है लेकिन बाद में वहाँ का राजा इस रिश्ते को मानने से मना कर देता है। एक सांप राजकुमारी के अंगूठे पर डस लेता है और कोई ईलाज कारगर ना होने पर वही साँप एक ओझा का रूप धारण करके गुग्गा से विवाह की सहमति की शर्त पर सीरियल को जीवित कर देता है। अब गुग्गा सीरियल से विवाह करने को राजा की शर्त के अनुसार सात ही दिनों में एक बड़ी बारात लेकर सात समुद्र पार जाने का कठिन काम अपने घोड़े, सांपों और गुरु गोरख नाथ की सहायता से पूरा कर लेता है।

अब एक दूसरी कहानी शुरू होती है। सगी मौसी के जुड़वां बेटे अरजन और सरजन ना केवल ज़ायदाद में हिस्सा माँगते हैं बल्कि सीरियल पर भी अपना हक जताने की चेष्टा करते हैं या छेड़खानी करते हैं। जवाब में गुग्गा दोनों भाइयों के सिर धड़ से अलग करके अपनी माँ बाछल को पेश करता है। ये देख कर बाछल ना केवल विलाप करती है बल्कि गुग्गा को आईन्दा से अपना चेहरा ना दिखाने का प्रलाप करती है। गुग्गा वापस मुड़ कर धरती में समा जाना चाहता है परन्तु धरती उसे जगह नहीं देती । गुग्गा सबकी नज़रों से ओझल हो जाता है लेकिन सीरियल के रंग ढंग देख कर बाछल को शक होता है और वह उसे प्रताड़ित करती रहती है। आखिरकार सीरियल बता ही देती है कि गुग्गा रात को उसके पास आता है। एक रात को पहरा देते हुए बाछल गुग्गा के घोड़े की लगाम पकड़ लेती है और ऐसे में अपनी माँ को अपना चेहरा ना दिखाने के संकल्प के अनुसार गुग्गा अपने घोड़े समेत जमीन में समा जाता है। इस बार धरती उसे जगह दे देती है क्योंकि अब तक वह अढाई कलमा पढ़ कर मुसलमान हो चुका है।

  उपरोक्त मूल कहानी के अनेकों रूपान्तर हैं। कभी गुग्गा पीर को एक बड़े इलाके का प्रतापी राजा के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, कभी दिल्ली के राजा अनंगपाल द्वारा अरजन सरजन की सहायता को उस पर चढ़ाई की जाती है, कई बार राजा अनंगपाल की जगह सम्राट पृथ्वी राज चौहान का नाम आता है। एक कहानी यूँ भी बताई जाती है कि गुग्गा पीर आक्रमणकारी मुहम्मद गजनी से लड़ते हुए शहीद हो जाता है। ये भी बताया जाता है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लाखों की संख्या में पीले वस्त्र धारण करके जो लोग आते हैं उसका कारण ये है कि सीरियल उस इलाके से थी। उधर पश्चिमी राजस्थान में राजस्थान और गुजरात के इलाकों में लोकगायक भोपा एक अन्य लोकदेवता पाबूजी की जब फड़ बांचते हैं तो ये प्रसंग भी आता है कि पाबूजी की भतीजी केलम की शादी गुग्गा पीर से हुई थी।

ऐतिहासिक रूप में गुग्गा की पुश्तों में से एक मोटे राव चौहान का बेटा करमचंद फिरोजशाह तुगलक ( 1351-1388) के शासन के दौरान मुसलमान बन कर कायमखान के नाम से हांसी-हिसार का नवाब रहा और उसकी पुश्तें अठारहवीं शताब्दी के मध्य तक झुंझनु, चुरू और मुख्यतः फतेहपुर (शेखावटी) में कायमखानी के नाम से जागीरदार रही हैं।

अब इस मूल जनश्रुति और गुग्गा पीर की मान्यता के विश्लेषण का सवाल हमारे सामने खड़ा है। मुख्य रूप से जब किसी भी जन आस्था के विषय को टटोला जाता है तो अध्ययन के केंद्रबिंदु अनेक प्रकार के हो सकते हैं। मसलन, एन्थ्रोपोलिजीकल सोशियोलॉजिकल, मिथक, चमत्कार, प्रतीक, सामाजिक आर्थिक वातावरण, सामाजिक मनोविज्ञान, सांस्कृतिक विकास, जातिय सामुदायिक डायनामिक्स आदि आदि।  गुग्गा पीर या राजस्थान के अन्य लोक देवताओं के बारे में एक समग्र समझ को विकसित करने के लिए भिन्न भिन्न वैचारिक दृष्टिकोणों से अनेक प्रयास हुए हैं ।

मेरे विचार के अनुसार इनमें से सर्वाधिक महत्वपूर्ण औजार है एतिहासिक- राजनैतिक- सामाजिक- आर्थिक दृष्टिकोण। एक व्यक्ति किन परिस्थितियों में लोक नायक बनता है और उसका लोकनायक से लोक देवता में परिवर्तित होना, उसके बारे में समय-काल के हिसाब से लौकिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकार के मिथकों का सहज रूप में पैदा होते जाना, उसके प्रति आस्था, मान्यता के प्रकारांतर और उनमे निरंतर परिवर्तन आदि के क्रम को जाने बिना शायद किसी भी लोक देवता को समग्रता में नहीं समझा जा सकता।

मूल कथा अनेक प्रकार की किवंदतियों से घिरी हुई है। लेकिन इन तमाम किवंदतियों में कुछ प्रतीक साझे हैं। राजा का नि:संतान होना, संतान के लिए नाथ जोगी की सहायता, ननद द्वारा लाँछन लगाना, सगी बहन द्वारा संतान प्राप्ति के लिए स्वार्थी हो जाना, गुग्गा की माँ द्वारा चमत्कारिक रूप से गर्भधारण करना, गर्भ में होते हुए भी चमत्कार दिखाना, सांपों पर शक्तिशाली अधिकार, सांपों के विभिन्न रहस्यमयी रूप, सौतेले भाइयों द्वारा ईर्ष्या और क्लेश, गुग्गा की शक्ति का भगतों में अवतरण, मैडी/ मढ़ीयों की इस्लामिक बनावट, सामाजिक रूप से सबसे निम्न जातियों के सदस्यों द्वारा सवैयों के रूप में डेरू बजाते हुए गुग्गा के निशान को लेकर गुग्गा के जीवन से जुड़े गीतों को गाते हुए भिक्षा माँगना और ताजिए की माफ़िक लोहे की सांकल के गुच्छे से अपने आप को जोर-जोर से मारना लेकिन दर्द का एहसास ना करना, भाद्रपद की नवमी (गुग्गा नवमी) के दिन दीवार पर सांप की या घोड़े पर सवार गुग्गा की तस्वीर बनाकर या मिट्टी से बने घोड़े के सामने धूपिया जलाकर खीर, गुलगुले, नारियल आदि का चढ़ावा चढ़ाकर प्रसाद बाँटना और सबसे बढ़कर सांप के काटने पर गुग्गा मैडी पर जाकर मत्था टेकना, मिट्टी काढना, जमीन पर ही सोना, घर में सांप निकलने पर गुग्गा पीर के नाम से दूध से बनी कच्ची लस्सी का छिडकाव करना ताकि सांप फिर ना निकले।

शेष मान्यताए भी अनेक प्रकार की हैं। जैसे कि जमीन के बँटवारे का जिम्मा गुग्गा पीर के हवाले कर देना और अगले दिन घोड़े के खुरों के निशानों को ही सीमा मान लेने के उदाहरण भी सुनने को मिलते हैं। इन सबके अलावा किसी भी प्रकार के शारीरिक, मानसिक, पारिवारिक, आर्थिक संकट से उबरने के लिए भी गुग्गा पीर की गुहार लगाई जाती है। सांपों के डसने की घटनाएँ इतनी आम होती थी कि किसान जब हल चलाने के लिए निकलता था तो चलते वक़्त बोलता था ‘हाली बाल्दी गोगो रखवालो’। यानी सांप का खतरा केवल हाली को ही नहीं बल्कि बैलों की सुरक्षा भी चिंता का विषय थी। मैडी पर जोत जलाना, धुणे को जलाए रखना, गुग्गा नवमी से कुछ दिन पहले सवैयों द्वारा गुग्गा का निशान लेकर गाते बजाते घर-घर से माँगना, मेले वाले दिन मुख्य मैडी या स्थानीय मैडी पर निशान टिका कर मत्था टेकना, और डेरू की आवाज पर एक विशेष लोच पर नाचना और गाना, कुछ एक भगतों पर गुग्गा की शक्ति का उतरना। भगतों द्वारा अपनी गर्दन में सांपों को लपेटे हुए घुमना मुख्य गुग्गा मैडी में आम तौर पर दिखाई देता है।

पूरे प्रकरण में अनेक प्रतीकों और मिथकों का गहरा पुट है। यहाँ प्रख्यात समाजशास्त्री और इंडोलोजिस्ट  वेंडी डोनिजर की ये टिप्पणी उपयुक्त लगती है :

‘वास्तविक घटनाओं और भावनाओं से प्रतीकों की उत्पति होती है और उसी प्रकार प्रतीक भी घटनाओं और भावनाओं को पैदा करते हैं। मिलाजुला कर एक ही प्रकरण में वास्तविक और प्रतीकात्मक दोनों का पुट संभव है।’

उन्ही के शब्दों में ‘मिथक इतिहास के धुएं की तरह होते हैं और वे सामाजिक धरातल की अग्नि से उपजते हैं। मिथक और सामाजिक धरातल से कल्पित कथाएँ पैदा होती हैं तो कल्पित कथाएँ भी सामाजिक परिवेश को प्रभावित करती रहती हैं। विश्वास, सच्चे हों या झूठे, तथ्य बन जाते हैं। सन 1857 का गदर इस विश्वास पर (सच्चा या झूठा) उबल पड़ा था कि कारतूसों में गाय और सूअर की चर्बी मिली है ।’

आलेख को अत्यंत अकादमिक स्वरूप ना देते हुए हम विख्यात एन्थ्रोपोलोजिस्ट बी. मलिनोव्सकी के इस कथन के साथ आगे बढ़ते हैं  कि ‘कल्पित अवधारणाएं आस्थाओं की एक ऐसी सूची है जो मनुष्य की सोच और कार्यों को सही ठहराने का कार्य करती हैं ।’

उपरोक्त सन्दर्भों के मद्देनजर किसी भी सामाजिक-धार्मिक-सांस्कृतिक प्रक्रिया को कभी भी एकान्तिक विचार से समझने का प्रयास एक खंडित समझ ही पैदा कर पाएगा। राजस्थान में केवलमात्र गुग्गा पीर ही एकमात्र लोकप्रिय लोकदेवता नहीं है, बल्कि रामदेव जी, पाबूजी और तेजाजी भी अलग-अलग क्षेत्रों और अलग अलग समुदायों के आस्था के प्रतीक हैं। ये लोकदेवता किन परिस्थितियों में बने और इनका ऐतिहासिक विकासक्रम क्या है, ये जानना भी अति आवश्यक है। क्या इन लोक देवताओं में आस्था रखने वाले किसी विशेष समुदाय के ही रहे हैं या उनमे परिवर्तन होता रहा है। क्या इन देवताओं का प्रारम्भ से देवता का ही चरित्रीकरण था या लोकनायक से  लोकदेवता में परिवर्तित हुए हैं। ये भी ग़ौरतलब है कि राज्य सत्ता का इन नायकों/ देवताओं के बारे क्या रुख रहा है और इनके पूजा विधान किस प्रकार से समय और परिस्थितियों के अनुसार बदलते रहे हैं।

इन तमाम पक्षों पर समग्रता से विचार करके ही गुग्गा पीर और अन्य लोक देवताओं के बारे में कुछ संकेत तो किए ही जा सकते हैं।

  • गुग्गा के जन्म का वर्ष अभी तक विवाद का विषय है जिस पर अधिकारिक तौर पर निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता। लेकिन तमाम किवंदतियों और ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर इतना तो दावे के साथ कहा जा सकता है उस समय नाथ पंथ आमजन में लोकप्रिय था । इस्लाम की सूफी परम्परा भी अपने पैर फैला चुकी थी। दोनों परम्पराएँ ब्राह्मणवाद के चौखटे से बाहर के समुदायों को आकर्षित कर रही थी। इसमायली पंथ मुख्य रूप से अछूतों और अवर्णो को अपने दायरे में समेट रहा था और कितने ही मुसलमान नाथ जोगी बन रहे थे। इस प्रकार दोनों तरफ़ से आपसी घालमेल की प्रक्रिया सहज रूप से चल रही थी। गुग्गा और रामदेव जी को गुग्गा पीर और रामदेव पीर के नाम से जाना जाना, उनकी मज़ार होना, रामदेवरा ( रुनेचा) में क़ब्रों का होना, मेघवालों और नाथों का मृत्युपरांत दाह संस्कार की बजाय दफ़नाया जाना साझा व्यवहार थी।

गुरु गोरखनाथ के आशीर्वाद से गुग्गा का जन्म, गुग्गा की मज़ार का होना, सदियों से चोहिल राजपूत मुस्लिम सेवादारों का खानदानी परम्परा का निर्वाह करना, मैडियों की इस्मालिक स्टाइल में इमारत और अच्छी खासी संख्या में मुसलमानों की गुग्गा पीर में आस्था आदि इस बात का संकेत है कि गुग्गा पीर का ऐसे परिवेश से संबध था जब नाथपंथ में मुसलमान सहज रूप से शामिल होते थे। सन 1821 और 1891 की जनगणना का हवाला देते हुए हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अपनी पुस्तक ‘नाथ सम्प्रदाय’ में इस बात की तसदीक़ की है। ये ऐसा दौर था जब ब्राह्मणवाद के समानांतर परम्पराए अवर्णों को आकर्षित कर रही थी। ऐतिहासिक रूप से यह दौर 11वीं से 16वीं सदी का था।

पश्चिमी राजस्थान का नागौर इलाके में 12वीं सदी से ही गजनी के सुल्तान बहराम शाह (1117-58) के एक गवर्नर मुहम्मद बहलिम बागी स्थापित हो गया था और इसके बाद 13वीं सदी से लेकर नागौर चिश्ती सूफ़ी धारा का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया था। फ़िरोज़ तुग़लक़ के समय मुसलमान बने उज्जिहला के चार पुत्रों में से एक शमसखाँ 15वीं सदी की शुरुआत में नागौर का शासक था।

  • ये वो दौर था जब राजस्थान में लूटमार, छीना झपटी, हमले , पशुधन छीनना, छोटी-छोटी रियासतों को बनाए जाने की होड़ ने असुरक्षा का अजीबोगरीब माहौल पैदा किया हुआ था। इन परिस्थितियों में कमज़ोर वर्ग को सुरक्षा और राहत की विशेष आवश्यकता महसूस होती थी। स्वभाविक है कि ऐसे वातावरण में जिसने भी उनके पक्ष में हिम्मत दिखाई वो उनका नायक बन गया। पाबूजी का थोरी जाति के 7 भाइयों को साथ रखना और अपने राठौड़ खानदान की विरासत को त्याग कर जीना, रामदेव जी का मेघवाल समुदाय के ढेढ़ कहे जाने वाले व्यक्तियों के बीच रहना और अवर्ण व गरीब मुसलमानों को मिलाकर एक नए पंथ ‘कामडिया’ की स्थापना करना, तेजाजी द्वारा एक गुर्जर महिला के पशुओं को लूटे जाने से बचाते हुए जान की बाजी लगा देना, गुग्गा द्वारा समाज के निम्नतम स्तर के व्यक्तियों से मित्रता रखना आदि ऐसे अनेकों उदाहरण है जिनसे लोकमानस में इनकी छवि लोकनायकों के रूप में बनती गई। शनैः शनैः ये छवि लोक आस्था, लोक धर्म और लोक परम्परा का हिस्सा बन गई।
  • धीरे धीरे लोकिक आवश्यकताओं की अन्त्श्चेतना के प्रक्षेपण से इन लोकनायकों की सामाजिक मनोवैज्ञानिक छवि लोकनायक से लोकदेवता में रूपांतरित होने लगी। ये प्रक्रिया अनादि काल से चलती आ रही है। देवी देवताओं का नए-नए रूपों में पैदा होना और एक अंतराल के बाद उनकी प्रासंगिकता का समाप्त होना एक निरंतर सामाजिक-सांस्कृतिक-धार्मिक प्रक्रिया रही है। हर प्रकार के चमत्कार और सांपों से सुरक्षित रहने के लिए गुग्गा पीर एक अचूक माध्यम बन गया। समाज के निम्नतम श्रेणी के सदस्यों को गुग्गा पीर हर मर्ज़ की दवा के रूप में दिखाई देने लग गया। क्योंकि उनका प्रवेश ब्राह्मणवादी मंदिरों, पूजा-पाठ, कर्मकांडो में वर्जित था तो उनके लिए गुग्गा पीर या अन्य लोकदेवता ही धार्मिक-लौकिक आकांक्षाओं की पूर्ति करने का एकमात्र माध्यम बनते रहे हैं। बेशक उच्च वर्ण द्वारा इनके लिए उपहास भी उड़ाया जाता था। मसलन रामदेवजी में आस्था रखने वालों पर एक आम तानाकशी होती थी कि ‘रामदेव न मिल्या ढेढ़ ही ढेढ़’।

18-19-20वीं सदी में एक बड़ा परिवर्तन देखने को मिलता है। अब केंद्र में मुग़ल साम्राज्य पतनोन्मुखी हो चुका है। साथ ही साथ मुग़ल साम्राज्य की सक्रिय हिस्सेदार रहने वाली राजपूताना शक्तियां चाहे वो जोधपुर हो, बीकानेर हो, जयपुर हो या कोई और, सभी शक्तिहीन होने लगी। दक्कन से मराठों के हमले और लूट बढती गई, आपसी लड़ाईयां भी बढ़ गई जैसेकि जोधपुर बनाम बीकानेर, जयपुर बनाम जोधपुर आदि आदि। 19वीं सदी में अकाल की मार भी बहुत बड़ी थी जिसने लाखों लोगों को दरबदर कर दिया। ऐसे माहौल में एक बदहवासी की मानसिकता देखने को मिलती है। राजपूत-ब्राह्मण चौखटे में सीमित रूढ़िगत धार्मिक देवता, मंदिर और कुलदेवी मान्यताएं अब रूप बदलने लगी। बदली हुई परिस्थितियों में राजनैतिक, सामाजिक, नैतिक मानदंडों को नए सिरे से खड़े करने की चुनौती जो आन पड़ी। निदान के तौर पर राजपूत अभिजात शासक वर्ग ने आमजन में अपनी स्वीकार्यता को बढाने के लिए लोकप्रिय प्रतीकों, मिथकों और लोकदेवताओं को अपनाना शुरू कर दिया। उदाहरण के लिए जोधपुर की पुरानी राजधानी मंडोर में 1707 से 1749 के दौरान 33 करोड़ देवी देवताओं का एक स्थान बनाया गया और वहीँ पर गुग्गा, पाबूजी, रामदेव, तेजाजी को मिलाकर 9 लोकदेवताओं की मूर्तियाँ भी स्थापित की गई।

जोधपुर के महाराजा अजित सिंह (1707-24) विशेष तौर पर रामसा पीर (रामदेवजी) के स्थान रुणेचा जाकर पूजा करते हैं । वे पाबूजी के स्थान पर भी जाते हैं। बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह (1887-1943) रुणेचा और गुग्गा मैडी के स्थानों की परिक्रमा का निर्माण करवाते हैं। बीकानेर के किले के एक दरवाजे का नाम गोगा दरवाजा रखवाते हैं, 1894 में एक पानी के कुंड का निर्माण करवाके उसका नाम गोगा टैंक रखा जाता है। इसी प्रकार के अनेकों उदाहरण दस्तावजों में उपलब्ध है। यह सब राजा और आम प्रजा के बीच नए समीकरण पैदा करने के सूत्र थे जो पुराने शासक और शासित के समीकरण से भिन्न था। संक्षेप में यह सब कुछ राजपूत अभिजात वर्ग द्वारा लोकदेवताओं को हथिया लेने की प्रक्रिया थी जो इन लोक देवताओं के राजपूतीकरण के रास्ते ब्राह्मणीकरण के माध्यम से की जा रही थी।

अब उच्च जातियों के लिए लौकिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए गुग्गा भी उनके अन्य  देवी देवताओं के बीच एक स्थान ग्रहण कर चुका है जबकि अनेकों निम्नवर्ग के समुदायों के लिए गुग्गा आज भी उनका मुख्य इष्टदेवता है।

मनोवैज्ञानिक रूप में अपने इष्टदेवता की उच्च वर्ण द्वारा स्वीकारोक्ति उनकी सामाजिक पहचान को तुष्ट करती है लेकिन उनके लोकदेवता को छिने जाए जाने की प्रक्रिया से एक प्रकार की मानसिक उलझन की स्थिति भी पैदा होती है। उदाहरण के तौर पर रूणेचा स्थित रामदेवरा में अनेकों क़ब्रों की वजह से ब्राह्मण पुरोहित हवन किसी ओर स्थान पर जाकर  करते हैं।

लोकदेवताओं के ब्राह्मणीकरण के विभिन्न रूप और उसके सामाजिक आयाम को संक्षिप्त रूप से निम्न प्रकार से देखा जा सकता है:-

 अब मुख्य गुग्गा मैडी में मेले के समय एक महीने के लिए ब्राह्मण पुजारी भी नियुक्त कर दिया गया जो चोहिल राजपूत मुसलमान द्वारा ख़ानदानी रूप से 12 महीनों के लिए उपस्थित होने के अलावा है। पूजा विधान का यथासंभव ब्राह्मणीकरण किए जाने का प्रयास किया जा रहा है। अब गुग्गा मैडियों में शिव, हनुमान, गणेश, कृष्ण आदि  अन्य हिंदू देवताओं की मूर्तियाँ भी स्थापित की जाती है। पारम्परिक रूप से निम्न वर्ग के भगतों का स्थान ब्राह्मण पुजारियों द्वारा लिया जा रहा है। आरती, हवन, गणेश वंदना, संस्कृत श्लोकों के माध्यम से उच्च वर्ण के यजमान अपना स्थान बना रहे हैं। ऐसे दृष्टांत भी देखने में आते हैं कि यजमान अपने ब्राह्मण पुरोहित को मेले में अपने साथ ले जाते हैं जो मेला प्रांगण में ही ब्राह्मण हवन कर लेते हैं।

पुराने साधारण थान की जगह अब गुग्गा पीर की मूर्तियाँ घोड़े पर सवार, हाथ में भाला उठाए हुए बहादुर राजपूत के रूप में आम हो गई है। थान एक छोटा चबूतरा या घर में आले की जगह होती है जिस पर सांप की आकृति छाप दी जाती है या मिट्टी से बने घोड़े रखके पूजा की जाती है।

गुग्गा के कलेंडर और चित्र भी राजपूत योद्धा के रूप में छापे जाते हैं । इसके अलावा गोगा पुराण, गोगा चालीसा, गोगा आरती आदि पुस्तिकाएँ थोक में बेची या बाँटी जाती हैं। इन सबमें गुग्गा को गुग्गा पीर की बजाय गुग्गा वीर लिखा जाता है। एक जन नायक का जन्म और उसकी बहिष्कृत और अछूत समाज के लोक देवता के रूप में पीर से वीर की हैसियत में एक छोटे हिंदू देवता की तस्वीर हमारे सामने है।

सन्दर्भ:

  1. ‘ Folk Religion : Change and Continuity’ by H.S. Bhatti
  2. ‘ Economic Conours of Hero’s Den: Untalked Dynamics of Gogamedi Shrine in Medival Rajasthan’ by Sarita Sarsar
  3. The Hindus: An Altenative History’ by Wendy Doniger
  4. ‘ Popular Religion inRajasthan: A study of four dieties and their worship in the 19th and 20th centuries’ by Rajashree Dhali
  5. ‘क़यामखां रासा’ द्वारा जान कवि (नियामत खां)

संपर्कः 9872890401

साभार – देस हरियाणा, (सितंबर – दिसंबर, 2018) पेज- 61

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