जाय रोया जाड्डा   

सोनिया सत्यानिता 

रेडियो आळी दादी के नाम से जाने जाने वाली दादी को “ओबरी आळी”भी कह्या करते। बड़ा सी ओबरी, फिर आँगन ठीक दो मंजली घर उसका। भाग की विडंबना। ओबरी आळी दादी के दस किल्ले। पर मालिक कोई नहीं । दादा गुजर गए थे उसके ब्याह तै  पांच साल पाछै। याणी उम्र म्हं बाप की उम्र के आदमी के गैल ब्याह दी थी। ईब बीमारी के सत्तर टंटे।

किल्ले रह गए, ओबरी आळी अपणे सास ससुर की देखभाळ करदी, खेती करदी फेर कंदी भी “किसे के पल्ले नहीं लागूं”

यो छोड़ के चल्या गया, मेरे बाप ने एक के गल्ले लाई मैं क्यूं और किसे का लत्ता ओढ़ ल्यूं?

सास, ससुर चल बसे। ओबरी आळी एकली रहगी। पड़ोस के जेठ से सलाह मशवरा करी कि “मेरे तो बाळक नीं” थाम किल्ले बो ल्यो मेरे तै बस खाण जोगे दाणे दे दियो।

दो साल किल्ले बोए, चार साल होगे ईब नई पीढ़ी के लिए ये किल्ले उनके थे। रजिस्ट्री करा ली और ओबरी आळी के नाम तै किल्ले तरवा दिए। ओबरी आळी नै पता चल्या तो खूब दहाड़ मार मार रोई, पीहर का कोई नीं जो संभाळ करै।

छन्नो के पास रोंदी, किताबो के पास रोंदी, लच्छो को कंहदी सरपंच को बुला बता गलत करा मेरे गेल। पर बुढ़िया लुगाई सारी, सब कहंदे “पां तो तेरे चेणीयां म्ह पड़े सैं” अर तू किल्ले लेवगी। टिकके टूक तोड़ ले नै।

ओबरी आळी के पास रेडियो था, इसलिए कुछ हाण औरत, युवक उसके पास बैठकै रोटी का जुगाड़ कर देंदे।

जाड्डे थे, ओबरी आळी अंधी हो चुकी थी। जिसनै जो मिल्या ठा लेग्या। रजाई, पिलँग, चाकी, बर्तन, टोकणी सब ले गे। बची एक खाट, रजाई अर रेडियो।

पूरी सर्दी कोसदी रही वो—जाया रोया जाड्डा।  कोई बूट नीं रे, कोई आग सिलगाणे आळा नीं, कोई सकरांत पे मनाण आळा नीं, ताता पाणी नीं, रे कोई तो संभाळ ल्यो मनै ।

पूरे जाड्डे ओबरी आळी जाड़े को और भगवान को कोसदी रही पर किल्लां गलै रोटी बी गयी। कोई बची-खुची 4 रोटी दे जांदा तो कल खातर बचा लेंदी। चा का कप दिन म्हं मिल जांदा तो खिल जांदी वो। कोई बहु नहळा देंदी, तो ठीक। इबतो बिचारी गंजी हो गयी थी कि कौण बाल सँवारै।

जाड्डे के इन दिनों मे हर रात ओबरी आळी रो के सोंदी। अंधेर के अलावा कुछ हो तो बोले वा। ईब बहु भी रेडियो लेकर चलदी बणी कि रोटी के बदले कुछ तो दे।

जाड्डे को ‘मर जाणे जाड्डे’ बोलदी बोलदी ओबरी आळी दुनिया छोड़ चली गयी।

(लेखिका ऐंडी हरियाणा चैनल की पूर्व मुख्य एंकर अभी ख़बरे अभी तक न्यूज चैनल में बतौर एंकर कार्यरत है।)

देस हरियाणा-19 में प्रकाशित

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