रहयी भारत माँ फटकार बखत – कर्मचंद केसर

हरियाणवी ग़ज़ल


रहयी भारत माँ फटकार बखत।
क्यूँ बदले तनै आसार बखत।
मोटे माणस मोटे कर दिये,
क्यूँ गरीब करे लाचार बखत।
स्तपुरषां अर गुरुजनां का,
आज घट रह्या सै सत्कार बखत।
भूचाल बिमारी उग्रबाद म्हं,
कई जाड़ दिये परिवार बखत।
भाई-भाई दुसमन बण रह्ये,
या खींच्ची इसी दीवार बखत।
ठग्गी चोरी अर रिसवत खोरी,
इब हो रह्यी सरे बजार बखत।
बेशर्म टटोलैं जेब लाश की,
कती देई आत्मा मार बखत।
फैल्या जहर जल-थल वायु म्हं,
होर्ये सैं लोग बिमार बखत।
देशभगत रहये पाच्छै ‘केसर’,
तनैं आग्गै करे गद्दार बखत।

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