बुरी संगत म्हं जो भी पड़ग्या – कर्मचंद केसर

हरियाणवी ग़ज़ल


बुरी संगत म्हं जो भी पड़ग्या।
उसका समझो डूंह्ड उजड़ग्या।
कतल केस म्हं सजा भुगत कै,
नेता बण संसद म्हं बड़ग्या।
जद कोयल की कूक सुणी तो,
न्यूँ लाग्या जणु साम्मण चढ़ग्या।
दीन-दुक्खी की सेवा करकै,
सच बोल्लण का ढाला पड़ग्या।
धरती बेच बणा ली कोठी,
छोरे कहैं इब लठ-सा गड़ग्या।
लग्या चैमासा बोद्दी छान,
गरीबू फेर फिकर म्हं पड़ग्या।
मरैं भूख तै देक्खो लोग,
नाज गदामां म्हं न्यूँ सड़ग्या।
छोरी नाट गई फेर्याँ तै,
बण्या-बणाया खेल बिगड़ग्या।
सुणकै उसकी कड़वी बाणी,
मेरै सह्म सांप-सा लड़ग्या।
बहू सास कै तान्ने मारै,
ठाल्ली का क्यूँ साँस लिकड़ग्या।
अजब खेल देख्या कुदरत का,
भरे जेठ म्हं पाला पड़ग्या।
टेम इलैक्शन का जिब आया,
लीडर आ पायाँ म्हं पड़ग्या।
तेरी बाट म्हं रह्यी जागदी,
दीवे का भी तेल सपड़ग्या।
‘केसर’ रह्या नादान उम्र भर,
ब्ेसक तै चै कितना पढ़ग्या।

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