महेन्द्र प्रताप चांद – बीत चली है सावन रुत भी

बिरहा गीत


बीत चली है सावन रुत भी 

बीत चली है सावन रुत भी
आस नहीं उसके आने की।
धीरज मेरा टूट रहा है
मन में इक तूफ़ान मचा है
हिचकी पर, हिचकी पर, हिचकी
बीत चली है सावन रुत भी।
राह में नैन बिछे रहते हैं
पल्कों पर आंसू बहते हैं
जान मेरे अधरों पर आई
बीत चली है सावन रुत भी।
मोह लिया उसका मन किसने?
मेरी सुध बिसराई जिसने
कौन है जग में मुझ पापिन सी,
बीत चली है सावन रुत भी
आस नहीं उसके आने की।
1420, सैक्टर-9, अर्बन एस्टेट, अम्बाला शहर (हरियाणा),
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