महेन्द्र प्रताप ‘चांद’ – एक मधुर सपना था, आख़िर टूट गया

गज़ल

महेन्द्र प्रताप ‘चांद’
एक मधुर सपना था, आख़िर टूट गया
तेरा दामन हाथ में आकर छूट गया!
कितने मंज़र ओझल हुए निगाहों से
बेटी से जब बाबुल का घर छूट गया!
इक आवारा भंवरा आया मधुबन में
कोमल कलियों का जोबन रस लूट गया!
ठेस लगी तो चीख़ उठी रूहें-एहसास
ख़ार चुभे तो आबला दिल का फूट गया!
तन्ज़ के पत्थर जब अपनों ने बरसाए
दिल का नाज़ुक शीशा यकसर टूट गया!
तुम भी अपने मधुर वचन को भूल गए
एक भरम था मुझको, वो भी टूट गया!
अपनी अपनी ज़िद पर दोनों अड़े रहे
और युंही बरसों का रिश्ता टूट गया!
‘चांद’! रफ़ीक-ए-राह बने कुछ लोग, मगर
ठक इक करके साथ सभी का छूट गया!
 

  1. मंज़र – दृश्य, 2. रूहे-एहसास – चेतना की आत्मा 3. ख़ार—कांटे 4. आबला – छाला 5. तन्ज़—कटाक्ष 6. यकसर—पूर्ण रूप से 7. रफ़ीक-ए-राह – रास्ते के साथी

(हिन्दी में भ्रम होता है, लेकिन उर्दू में भरम, यहां वज़्न भी ‘भरम’ का है।)
 
 

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