हरियाणा के 50 साल क्या खोया क्या पाया सेमीनार

हरियाणा के पचास साल:भविष्य के सवाल

‘देस हरियाणा’ ने 18 नवम्बर 2016 को कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र में ‘हरियाणा के पचास साल : भविष्य के सवाल’ विषय पर परिचर्चा का आयोजन किया। प्रो. नीरा वर्मा, कृषि वैज्ञानिक प्रो. कुलदीप ढींढसा, डा. अशोक चौहान, श्री आर.आर. फुलिया, वी.एन.राय, सामाजिक कार्यकर्ता सुरेन्द्रपाल सिंह, पत्रकार दीपकमल सहारन, सामाजिक कार्यकर्ता सुरेन्द्रपाल सिंह ने परिचर्चा में भाग लिया। प्रो. टी.आर. कुंडू  ने  इसकी अध्यक्षता  की।

एक नवम्बर 2016 को हरियाणा ने 50 साल का सफर पूरा किया। इस अवसर को सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं ने पूरे प्रदेश में बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया प्रदेश की साहित्यिक-सांस्कृतिक अभिव्यक्ति की प्रत्रिका ‘देस हरियाणा’ का 8वां-9वां संयुक्तांक ‘हरियाणा के 50 साल क्या खोया क्या पाया’ विशेषांक के तौर पर हरियाणा को समर्पित रहा। जिसके केंद्र में खेतीबाड़ी, साहित्य-संस्कृति, समाज, शिक्षा-सेहत, शहर-देहात, लोक गीत-संगीत, खेलकूद और सामाजिक न्याय आदि प्रमुख बिंदू रहे। ‘देस हरियाणा’ ने 18 नवम्बर 2016 को कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र में ‘हरियाणा के पचास साल : भविष्य के सवाल’ विषय पर परिचर्चा का आयोजन किया। प्रो. टी.आर. कुंडू  ने  इसकी अध्यक्षता  की।

परिचर्चा की शुरुआत में ‘देस हरियाणा’ के संपादक प्रो. सुभाष चंद्र ने कहा कि हरियाणा के पचास साल हमारे सामने बहुत सारे सवाल उठाते हैं। नम्बर वन हरियाणा की छवि जो मीडिया में दिखाई जाती है, क्या वास्तव में धरातल पर है?

परिचर्चा की प्रथम वक्ता प्रो. नीरा वर्मा ने परिचर्चा के केंद्र बिंदू को मद्देनजर रखते हुए कहा कि प्रदेश की सबसे बड़ी चुनौती असमानता है। असमानता की समस्या सबसे बड़ी चुनौती के तौर पर सामने खड़ी है। आज लगभग 15 प्रतिशत लोग इस नंबर वन हरियाणा में बीपीएल में आते हैं। यहां के कई प्रमुख काण्ड गैर बराबरी की दशा और दिशा को दर्शाते हैं। वंचित तबकों के आर्थिक और सामाजिक विकास की गति धीमी है। आर्थिक विकास और सामाजिक विकास विपरीत दिशा की ओर जा रहा है। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे मिशन का आगाज़ सिर्फ हरियाणा से ही क्यों होता है? यह अपने-आप में एक सोचनीय मुद्दा है।

कृषि वैज्ञानिक प्रो. कुलदीप ढींढसा ने अपने विचार रखते हुए कहा कि हरियाणा की पहचान जवान, किसान और विज्ञान से है। आर्य समाज की मुहिम ने हरियाणा के समाज को जागरूक किया, लेकिन कुछ कुरीतियां समाज में आई हैं। कामचोरी बढ़ी है। खेती से हरियाणा दूर हो रहा है। आज साहित्य और संस्कृति को संजोने की जरूरत है। आदर्श समाज ज्ञान, विज्ञान और साहित्य से बन सकता है।

सामाजिक कार्यकर्ता सुरेन्द्रपाल सिंह ने परिचर्चा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि हरियाणा के प्रमुख काण्ड संकुचित मानसिकता के प्रमाण हैं, जिन पर सवाल उठने चाहिए। व्यक्ति विशेष की वजह से पूरे समाज को सजा देना कहीं की मानसिकता नहीं है।

प्रो. कृष्ण कुमार ने कहा कि अगर चंद आदमी तरक्की कर जाएं तो उससे समाज तरक्की नहीं कर सकता। तरक्की तो सबके साथ होगी। जब तक समाज को बदलने का नक्शा हमारे पास नहीं है, तब तक समाज का विकास संभव नहीं, इसलिए वैज्ञानिक सोच बननी चाहिए। अंधविश्वासों से समाज आगे नहीं बढ़ता। शिक्षा और स्वास्थ्य के बजट में कटौती देश के लिए ठीक नहीं है। स्वर्ण जयंती के अवसर पर आत्म-मंथन करना जरूरी है।

पत्रकार दीपकमल सहारन ने  कहा कि आर्थिक जगत में तो हरियाणा ने जरूर तरक्की कर ली है। आज इसका बजट भी पंजाब से ज्यादा है, लेकिन कुपोषण, गरीबी और दूसरी मामूली चीजों पर कौन सोचेगा। स्वर्ण जयंती के पड़ाव पर हरियाणा को ठहर कर अपने बारे में सोचना चाहिए।

डा. अशोक चौहान ने परिचर्चा में हिस्सा लेते हुए कहा कि आपसी मेलजोल से ही सौहाद्र्र की स्थापना की जा सकती है। सरकारी तंत्र से ही बेहतरी हो सकती है। आज जैविक खेती की तरफ बढऩे की आवश्यकता है। प्राकृतिक स्रोतों का सदुपयोग करना चाहिए।

श्री आर.आर. फुलिया ने परिचर्चा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि जल, जंगल और जमीन के साथ-साथ पशुधन तथा प्रकृति की चिंता हम सबको करनी पड़ेगी।

वी.एन.राय ने कहा कि हरियाणा की छवि विकास की तेज गति से बनी है, लेकिन विकास की तेज गति में असमानता का सवाल सबसे बड़ा सवाल उभरकर हमारे सामने आता है। वैश्वीकरण और विकास के दौर में असमानता और प्रकृति को बचाने का हल नहीं मिल रहा।  लोकतंत्र को मजबूत करना जरूरी है।

प्रो. टी.आर. कुंडू ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि अभाव की संस्कृति हरियाणा की संस्कृति रही है। सबसे पहले तो हमें खोया पाया ही निर्धारित करना पड़ेगा। जब विकास होता है, तो विनाश भी होता है। जाति और लिंग इत्यादि की भेदभावमूलक श्रेणियों को छोड़कर मानवीय मूल्यों और सोच को विकसित  करना बहुत जरूरी है।  सामाजिक रिश्तों में कमी आने से आदमी पशु बन जाता है। इसलिए आज  संवेदनशील समाज  बनाने की जरूरत है।

इस परिचर्चा का मंच संचालन प्रो. सुभाष चंद्र ने किया। इसमें विभिन्न विभागों के विभागाध्यक्षों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों के अतिरिक्त समाज के जिम्मेवार व्यक्तियों और बुद्धिजीवियों ने भाग लिया।

प्रस्तुति – डा. विजय विद्यार्थी

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (मार्च-अप्रैल 2017, अंक-10), पेज -73-74

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