पहले कोई ज़ुबाँ तलाश करूँ – बलबीर सिंह राठी

 ग़ज़ल

बलबीर सिंह राठी

पहले कोई ज़ुबाँ तलाश करूँ,
फिर नई शोखियाँ1 तलाश करूँ।
अपने ख्वाबों की वुसअतों2 के लिए,
मैं नये आसमां तलाश करूँ।
मंजि़लों की तलाश में निकलूँ,
मुस्तकिल3 इम्तिहाँ तलाश करूँ।
मेरी आवारगी ये माँग करे,
मैं नई दूरियाँ तलाश करूँ।
फिर मसल्सल फ़रेब खाने को,
तुझ सा फिर मेहरबां तलाश करूँ।
हर तरफ नफ़रतों के सहरा हैं,
प्यार मैं अब कहाँ तलाश करूँ।
ये उदासी तो झाड़ दूँ लेकिन,
फिर मसर्रत4 कहाँ तलाश करूँ।
किस्सा-ए-ग़म तुम्हें सुनाने को,
अब मैं कैसी ज़ुबां तलाश करूँ।
जो करे दिल में ज़लज़ले5 पैदा,
मैं वो आतिश फिशाँ6 तलाश करूँ।
गुमरही में गुज़ार दी इक उम्र,
अब कोई कारवाँ तलाश करूँ ।
दर्दे-दिल के बयान की ख़ातिर,
कैसी तर्जे-बयाँ तलाश करूँ ।
सिर्फ़परवाज़7 का इरादा है,
किस लिए आशियाँ तलाश करूँ।
गुम है ‘राठी’ जुनूँ के जंगल में,
उसको मैं अब कहाँ तलाश करूँ।
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  1. चुलबुलाहट 2. फैलाव 3. स्थायी 4. खुशी  5. भूचाल  6. ज्वालामुखी  7. उड़ान

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