जिनकी नज़रों में थे रास्ते और भी- बलबीर सिंह राठी

 ग़ज़ल


जिनकी नज़रों में थे रास्ते और भी,
जाने क्यों वो भटकते गये और भी।
मैं ही वाक़िफ़ था राहों के हर मोड़ से,
मैं जिधर भी चला चल दिये और भी।
जो कहा तुम ने वो हर्फ़े आख़िर न था,
थे हक़ीक़त के कुछ सिलसिले और भी।
अक्स टेढ़े लगे उसमें तुम को मगर,
आइने के थे कुछ ज़ाविये1 और भी।
हम तो जब भी चले मंजि़लों की तरफ़,
जाने क्यूँ बढ़ गये, फ़ासले और भी।
हम ही वीरान सी राह पर हो लिए,
वरना मंजि़ल के थे रास्ते और भी।
राह से हम भटक भी गये हैं तो क्या,
हैं नज़र में अभी रास्ते और भी।
जो भी दुश्वारियों2 से उलझते रहे,
उन के बढ़ते गये हौंसले और भी।
बस्तियाँ कौन कहता है महफ़ूज़3 हैं,
ताक में हैं अभी ज़लज़ले और भी।
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  1. कोण 2. मुश्किलों 3. सुरक्षित

 

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