न जाने वक़्त की कैसी हवा है – बलबीर सिंह राठी

 ग़ज़ल


 
न जाने वक़्त की कैसी हवा है,
कि अब हर शख़्स ख़ुद बिकने लगा है।
समन्दर बेच कर वो कह रहा है,
हमारे वास्ते सहरा1 बचा है।
निकल जाते हो तुम नज़रें बचाकर,
न जाने तुम को मुझ से क्या गिला है।
जहाँ सूरज छुपा रक्खा था तुम ने,
वहाँ गहरा अंधेरा छा गया है।
न जाने क्यूँ हर इक तेरे नगर में,
मुझे शक की नज़र से देखता है।
उड़ा ले जाएगी रिश्ते दिलों से,
ये तीखे वक़्त की तीखी हवा है।
मुझे तो एक मायूसी का अजगर,
न जाने क्यूँ निगलने पर तुला है।
हक़ीक़त को परखने के लिए भी,
हमारे पास टूटा आईना है।
किया महसूस जिस ने दर्द सब का,
कहीं कोई उसे भी पूछता है।
ख़फा हैं लोग क्यूँ ‘राठी’ से यारो,
भला उसने किसे क्या कह दिया है।
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  1. मरुस्थल

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