कोई जब मेरे आगे से मुझे तकता हुआ निकला – बलबीर सिंह राठी

 ग़ज़ल


कोई जब मेरे आगे से मुझे तकता हुआ निकला,
मैं समझा तुम हो लेकिन वो तो कोई दूसरा निकला।
मुझे तो ये यकीं था तेरे दिल पर भी असर होगा,
मगर रूदाद1 का जो बोल निकला बे सुरा निकला।
मैं मंजि़ल साथ ही लेकर चला था राहे उलफ़त में,
मगर जिस की वफ़ा पर नाज़ था वो बेवफ़ा निकाला।
खड़े थे तब हमें मंजि़ल बहुत ही दूर लगती थी।
सफ़र पर चल पड़े तो दो क़दम का फ़ासिला निकला।
अंधेरे में तो हम मरऊब थे उसकी बुलंदी से,
उजाले में जो देखा तो वो परबत मोम का निकला।
अंधेरी बंद गलियों की कोई दीवार तो टूटी,
अंधेरों से निकलने का कोई तो रास्ता निकला।
तअल्लुक़ तोड़ना आसान होगा हम ये समझे थे,
मगर अपना ये रिश्ता तो बहुत उलझा हुआ निकला।
गया था आज वाइज़2 मैकदे में साथ ‘राठी’ के,
वहाँ से जब वो निकला तो नशे में झूमता निकला।
 
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  1. कहानी 2. धर्म-उपदेशक

 

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