जब गुनहगार करने लगे मुन्सिफ़ी – बलबीर सिंह राठी

 ग़ज़ल


 
जब गुनहगार करने लगे मुन्सिफ़ी1,
फिर सज़ा बे गुनाहों को होनी ही थी।
जिनको अपना मुहाफ़िज2 समझते थे हम,
रहज़नों3 ही में शामिल थे वो लोग भी।
अपनी हालत पे अब तिलमिलाने लगे,
हाशिये पर धकेले हुए लोग भी।
अब तो लुटते रहेंगे युँही क़ाफ़िले,
रहबरों ने ही अब सीख ली रहज़नी।
हम को हर जख़्म जिन की बदौलत मिला,
अब वही करने आए हैं चारागरी।
देखिए तो लगें ख़्वाब सच की तरह,
सोचिए तो हक़ीक़त भी है ख़्वाब सी।
तेरा दावा था सूरज तिरे पास है,
फिर भी ऐ हमसफ़र! रात कैसे हुई!
जब समझते न थे उन की मक्कारियाँ,
उन की हर बात लगती थी इल्हाम सी।
मैं तो कब से सुनाने को बेताब हूं,
कोई सुनता भी हो दास्ताँ दर्द की।
जिंदगी में हक़ीक़त की गहराइयाँ,
जख़्म खाकर समझता है हर आदमी।
जिस का सुनना भी उसको गवारा न था,
अब तो ‘राठी’ ने वो बात भी मान ली।
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  1. न्याय करना 2. रक्षक 3. लुटेरा

 

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