हुआ जब आदमी ख़ुद इतना वहशी – बलबीर सिंह राठी

ग़ज़ल


हुआ जब आदमी ख़ुद इतना वहशी,
तो क्या बिगड़ी हुई दुनिया संवरती।
तबाही हर कदम पर घात में है,
कहाँ महफ़ूज1 है अब आदमी भी।
फ़ज़ा2 में घोल दी ख़ुद हम ने नफ़रत,
बना ली यूँ जहन्नम जि़न्दगी ही।
कोई कैसे किसी का हाल पूछे,
मची है हर तरफ़ इक खलबली-सी।
भंवर शायद इसी की ताक में है,
संभल कर अब चलाओ अपनी किश्ती।
जहां पर तीरगी ही तीरगी3 है,
वहाँ हम थे तभी तक रोशनी थी।
जुनूं वाले उसे अपनी समझ कर,
लड़ाई लड़ रहे हैं दूसरों की।
ख़ुद अपनों को समझता है जो दुश्मन,
हिफ़ाजत4 क्या करेगा वो किसी की।
तमाशा हो रहा था वहशियाना,
मगर चुप क्यूँ खड़े थे लोग ‘राठी’।
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  1. सुरक्षित 2. वातावरण 3. अंधेरा 4. रक्षा

 

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