अभी तक साथ मायूसी हो जैसे – बलबीर सिंह राठी

अभी तक साथ मायूसी1 हो जैसे,
कोई बाज़ी अभी हारी हो जैसे।
ख़रीदारी को आए ग़म के मारे,
ख़ुशी बाज़ार में बिकती हो जैसे।
हुआ मुश्किल क़दम आगे बढ़ाना,
कहीं पर जि़ंदगी उलझी हो जैसे।
फिसल जाती है हर शै हाथ आकर,
हमें ये जि़ंदगी ठगती हो जैसे।
लड़ी हमने लड़ाई दुश्मनों की,
मगर कुछ इस तरह अपनी हो जैसे।
फ़रेबी अब लगी सब उन की चालें,
हक़ीक़त हम ने अब समझी हो जैसे।
ये ग़म तो बे झिझक आते हैं लेकिन,
ख़ुशी कुछ हम से घबराती हो जैसे।
सियाही रात की लगता है मुझ को,
हमारे साथ ही चलती हो जैसे।
जलाते जा रहे हो बस्तियों को,
युँही बस रोशनी होती हो जैसे।
बड़ी शिद्दत से फैलाते हो नफ़रत,
यही अब राम की भक्ति हो जैसे।
सफ़र में इस क़दर ख़ुद ऐतमादी2?
तुम्हारा हमसफ़र ‘राठी’ हो जैसे।
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  1. उदासी 2. भरोसा

 
 

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