सरबजीत की याद में -तारा पांचाल

कविता


बहुत उजालों में लिए तुम
अपने आसपास नन्हें-नन्हें जुगनुओं जैसे सूरजों के बीच
इसलिए दूरी बनी रही तुम्हारे, और
तुम्हारी कविताओं के अंधेरे के बीच।
पर तुमने बनाए रखा अंधेरों को
अपनी कल्पना का हिस्सा।
तुम उत्साहित थे कि तुम कराओगे
अंधेरों की पहचान अलग ढंग से
पर यूं सोचते हुए
फंस जाओगे गुफा में-
यह हमें मालूम नहीं था।
आंखें खोलो साथी और देखो
बाहर कितना अंधेरा है
तुम्हारी कल्पना के अंधेरों से ज्यादा
गहरे कोहरे ने गुम कर दिया है सूरज को
सभी साथी सी-सी करते
अपनी ही हथेलियों की रगड़ से गर्मी पाते
सिंकोड़ते जा रहे हैं हाथ-पांव
और सरक रहे हैं तुम्हारे करीब
तुम्हारी आंखों में तलाशते
गुम सूरज को
उठो और बताओ गुफाओं के अपने सफर के बारे में
अंधेरे की सही-सही पहचान करवाना
अपने साथियों को
शुभ होता है उजालों के लिए
जिनके लिए तुम और जीना चाहते थे
अपने आस-पास नन्हें-नन्हें
असली सूरजों की कल्पना में।

– तारा पांचाल

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