कत़आत़ – बलबीर राठी

 
हर क़दम पर टूटते जाते हैं लोग,
जि़न्दगी से ठीक घबराते हैं लोग,
कैसे पहचाने किसी के दर्द को,
अपने-अपने ज़ख़्म सहलाते हैं लोग।
***

क्या उजालों की अब तलाश करें,
घुप्प अंधेरों से डर गये हैं लोग,
चोटियों के लिए चले थे मगर,
घाटियों में उतर गये हैं लोग।
***
ख़्वाब ताबीर के लिए तरसें,
जि़न्दगी अपनी शर्त मनवाये,
ऐसी हालत में किस तरह कोई,
अपने ख़्वाबों को शक्ल दे पाये।
***
ये सफ़र भी कमाल है इसमें,
अपना रहबर ही रहज़नी भी करे,
हर क़दम पर करे वो हक़तलफ़ी,
फिर वही शख़्स मुन्सिफ़ी भी करे।
***

ये मुखौटे तो काम के निकले,
अपना हर झूठ सच लगा सब को,
काम आएंगे वक़्त पर फिर भी,
अब ये चेहरे उतार कर रख लो।
***
क़दम मिलाते रहो सवाल मत पूछो,
सफ़र में आज किसी का हाल मत पूछो,
उलझ गये हो जहाँ वहीं पे उलझे रहो,
कहाँ-कहाँ पे बिछे हैं जाल मत पूछो।
***
बुझे-बुझे से रहे मसर्रतों के दिये,
ज़मीं पे छाया रहा उदासियों का धुआँ,
बड़ी तमन्ना थी हसीन हो दुनिया,
हज़ार रंग भरे संवर सका न जहाँ।
***
रास्ते बन्द हैं हमारे लिए,
तुम ने ये बात किस तरह कह दी,
लाख भटकें मगर हमारे लिए,
राहे मंजि़ल तो मुन्तजि़र होगी।
***
बर्फ़ तो मेरे सीने की पिघली नहीं,
मैं युँही दिल में शोले दबाए फिरा,
घुप्प अंधेरा है चारों तरफ आज भी,
मैं तो नाहक ये सूरज उठाए फिरा।
***
बन्द हैं उन पे जो भी दरवाज़े,
लोग अब ठोकरों से खोलेंगे,
जिन को समझे हो बेज़ुबां वो भी,
ज़लज़लों की ज़ुबान बोलेंगे।
***
आसरा दूसरों का जो लेंगे,
वो किसी के भी साथ हो लेंगे,
जिन के लब सी गई हो खुदग़रज़ी,
वो भी कैसे ज़ुबान खोलेंगे।
***
प्यार के दिल फ़रेब लफ़्ज़ों में,
बोलियाँ नफ़रतों की बोलेंगे,
बात अमृत की कर रहे हैं वही,
इन फ़ज़ाओं में ज़हर घोलेंगे।
***
ऐन मुमकिन है कोई लुट जाए,
अब तो महफूज़ रास्तों पर भी,
रहज़नी की बदल गई रस्में,
लूट लेते हैं अब तो रहबर भी।
***
वो सूरज तो लिए फिरते हैं लेकिन,
अंधेरा हर तरफ क्यूँ बढ़ रहा है,
हुई क्या उनकी वो गुलशन परस्ती,
चमन काँटों से कैसे भर गया है।
***
अजगरों ने मचाई वो हलचल,
जैसे दुनिया बदलने वाले हैं,
बात क्या आदमी की करते हो,
वो ज़मी को निगलने वाले हैं।
***
लोग मिलते हैं सिर्फ़ मतलब से,
कौन दिल से किसी से मिलता है,
अब तो व्यापार हो गया जीना,
हर कोई बार-बार बिकता है।
***
मुझ को तूफ़ां के पास जाने दे,
हौसले अपने आज़माने दे,
गर अंदेशा है डूब जाने का,
फिर तो कश्ती को डूब जाने दे।
***
बढ़ाते हैं जकड़ ये बेडिय़ों की,
ये बन्धन काटने वाले नहीं हैं,
पिलाते हैं हलाहल हर किसी को,
ये अमृत बाँटने वाले नहीं हैं।
***
आदमी ने हर एक बस्ती में,
जाने कैसे उगा लिया जंगल,
अब दरिन्दों को कौन रोकेगा,
जब नगर में बसा लिया जंगल।
***
आ के लोगों में ग़म तो बाँट दिया,
ताक में तुम ने क्यूँ ख़ुशी रख दी,
चन्द लोगों को सौंप कर सूरज,
तीरगी क्यूँ गली-गली रख दी।
***
ख़ूब तुहफ़ा दिया है लोगों को,
पूरी बस्ती में तीरगी रख दी,
लोग पहले भी यूं तो बेबस थे,
तुम ने घर-घर में बेबसी रख दी।
***
हर चमन को बहार दे कोई,
मौसमों को निखार दे कोई,
फ़ासिले मंजि़लों के रहने दे,
अपनी राहें संवार दे कोई।
***
रुख़ हवाओं के मोड़ कर इक दिन,
मौसमों को निखार सकता था,
इतनी बिगड़ी हुई न थी दुनिया,
इस को इन्सां संवार सकता था।
***
अपनी राहें संवार सकता था,
हर ख़ुशी को पुकार सकता था,
शौक़ था कशमकश का वरना मैं,
उम्र यूँ भी गुज़ार सकता था।
***
बात क्या है कि अपनी बस्ती में,
कोई अपना नज़र नहीं आता,
दूर से हम सवाल क्या पूछें,
पास कोई मगर नहीं आता।
***
कैसे जाता कहीं कि लोगों ने,
मेरे दर पर ही बेबसी रख दी,
मैं तो मंजि़ल तलाश कर लेता,
मेरे कदमों में गुमरही रख दी।
***
जो ख़ज़ाओं  को लाने वाले हैं,
वो बहारों को क्यों पुकारेंगे,
जो डुबोते रहे सफ़ीनों को,
डूबतों को वो क्यूँ उभारेंगे।
***
मज़हबी नफ़रतों के सौदागर,
प्यार के घर उजाड़ आते हैं,
राहतें उन के वश की बात नहीं,
वो मुसीबत ज़रूर लाते हैं।
***
मुझ को दुनिया नई बसाने दे,
अपनी क़िस्मत को आज़माने दे,
गर खिलौना हूँ तेरे हाथों का,
मुझ को गिरने दे टूट जाने दे।
***
बात जो कर रहे हैं राहत की,
हम तो ये देखने ही आए हैं,
जो हमेशा ख़जां ही लाते रहे,
अब वो कैसी बहार लाए हैं।
***
दरिन्दें घूमते हैं गलियों-गलियों,
घरों में दुबके बैठे हैं, फ़रिश्ते,
फ़ज़ा में ख़ौफ़ की परछाईयाँ हैं,
कहाँ अब प्यार, कैसे दिल के रिश्ते।
***
बहुत मुमकिन है यूँ भी लोग पूछें,
कहाँ बिकती है अब मीठी सदाएँ।
दुकानें हैं किधर ताज़ा हवा की,
हैं किस बाज़ार में महकी फ़ज़ाएँ।
***
करोड़ों देवताओं के चहेते,
हमारी बात कैसे मान लेते,
वो नफ़रत बाँटने आए थे घर से,
भला फिर प्यार कैसे बाँट देते।
***
अपने अल्फ़ाज़ पर नज़र रक्खो,
इतनी बेबाक गुफ़्तगू न करो,
जिनकी क़ायम है झूठ पर अज़मत,
सच कभी उनके रूबरू न करो।
***
सब शिकारी हैं, ढूंढते हैं शिकार,
कौन महफ़ूज़ अब किसी से है,
वहशियों से किसी को ख़ौफ़ नहीं,
अब तो ख़तरा ही आदमी से है।
***
कोई कैसे किसी का हाल पूछे,
मची है हर तरफ़ इक खलबली सी,
फ़ज़ा में इतनी दहशत भर गई है,
कहाँ महफ़ूज़ है अब आदमी भी।
***
भला पत्थर-दिलों की पारसाई,
तबाही के सिवा किस काम आई,
उन्हीं लोगों ने ये जन्नत सी दुनिया,
न जाने किस लिए दोज़ख़ बनाई।
***
बुलन्दी से फिसल कर आने वालो,
अभी रोते हो क्या इन पस्तियों को,
दरिन्दें बन के आए हैं मुहाफ़िज़,
बना देंगे वो जंगल बस्तियों को।
***
जो नदियाँ राह में रोकी थी तुम ने,
वो सहरा की तरफ हम ने बहा दी,
हमें तुम बाँट कर तो मुत्मइन थे,
मगर हम ने वो दीवारें गिरा दीं।
***
कुछ ऐसा ज़हर नफ़रत का पिलाया,
हमें सूझा न फिर अपना पराया,
बसाई थी कभी हम ने जो बस्ती,
उसी बस्ती को हमने ख़ुद जलाया।
***
तुम्हारा जागना काफ़ी नहीं है,
तुम अपने साथियों को भी जगा लो,
बहुत तीखे हैं तूफ़ानों के तेवर,
उठो अपने सफ़ीनों को संभालो।
***
वही कहते हैं लाएंगे उजाला,
जो फैलाते रहे अब तक अंधेरे,
ज़रा मुहतात रहना बस्ती वालो,
मुहाफ़िज़ बन के आए हैं लुटेरे।
***
मुझे हर दम मरोड़ा जा रहा है,
मिरे दम-ख़म को तोड़ा जा रहा है।
मिरे रिश्तों से मुझ को तोड़ कर अब,
अलग रिश्तों से जोड़ा जा रहा है।
***
इतने दुश्वार रास्तों का सफ़र,
कर न पाया कभी निढाल मुझे,
अब तो आसान रास्तों पर भी,
डगमगाता हूँ तू संभाल मुझे।
***
निकला तो था सफ़र पर ख़ुशियों के ख़्वाब लेकर,
लौटा हूं मैं सफ़र से ग़म बेहिसाब ले कर,
मुझ को तो ये अंधेरे कुछ रास आ गये हैं,
अब क्या करुँगा यारो मैं आफ़ताब ले कर।
***
कोई कुछ भी बना फिरता हो लेकिन काफ़िले वाले,
किसी को भी किसी मंजि़ल का दीवाना नहीं कहते,
बुरों को तो बुरा कहने की हिम्मत ख़ैर किस में है,
मगर क्यूँ लोग अब अच्छों को भी अच्छा नहीं कहते।
***
उजाले चाहने वाला इधर कोई नहीं आया,
किसे मालूम लोगों को अंधेरों की ज़रूरत हो,
यहाँ तो लूटने वालों की इज्जत ख़ूब होती है,
बहुत मुमकिन है बस्ती को लुटेरों की ज़रूरत हो।
***
मैं, उदासी के जंगल में मत पूछिए,
बोझ किस-किस का दिल पर उठाए फिरा,
ग़म किसी का मिटाना तो मुमकिन न था,
सब का दु:ख दिल में लेकिन बसाए फिरा।
***
बढ़ती ही जा रही हैं अब तल्ख़ियाँ दिलों में,
आएगी फिर बताओ मीट्ठी सदा कहाँ से,
कब से रुका हुआ है मौसम उदासियों का,
लाऊँ मसर्रतों की दिलकश हवा कहाँ से।
***
झूठ जो बोले वो सच्चा है सच बोले वो झूठा है,
लूट-खसोट की इस नगरी में, सारा खेल अनूठा है,
लुटने वाले लोग वही हैं सिर्फ़ लुटेरे बदले हैं,
और लुटेरे पूछ रहे हैं उन को किसने लूटा है।
***
मसल्सल तुम को पीछे ही धकेला जा रहा है,
मगर तुम ये समझते हो कि आगे बढ़ रहे हो,
वो फ़ित्नागर तुम्हें नीचे गिराते जा रहे हैं,
तुम्हें लेकिन ये ख़ुशफ़हमी है ऊपर चढ़ रहे हो।
***
कुछ ऐसा जाल फैलाया हमारे दुश्मनों ने,
हम अपनी मान कर उनकी लड़ाई लड़ रहे हैं,
ज़रूरत थी इकट्ठे हो के हम ज़ालिम से लड़ते,
मगर अब तो यहाँ भाई से भाई लड़ रहे हैं।
***
तुम्हारा क़द भी सचमुच बढ़ गया हो ये तो मुमकिन है,
मगर ढलता हुआ सूरज है साया देख लो अपना,
संवारा ख़ूब है लोगों को ठगने के लिए उसको,
ज़रा हर ज़ाविए से फिर भी चेहरा देख लो अपना।
***
ख़ुशफ़हमियों को छोड़ो-मतलब की बात छेड़ों,
किस वास्ते उठाएं हम को गिराने वाले,
मक़सद तो उनका ये है-फैला रहे अंधेरा,
लाएंगे क्यूँ उजाला सूरज चुराने वाले।
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